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बदहाल अस्पताल: 40 सेकंड में ही मरीज़ को 'निबटा' देते हैं डॉक्टर
- Author, दिलनवाज़ पाशा
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, फ़र्रुख़ाबाद से लौटकर
उत्तर प्रदेश की बदहाल स्वास्थ्य सेवाओं पर बीबीसी की ख़ास सिरीज़ की पहली कड़ी में आपने पढ़ा कि किस तरह आगरा में अस्पतालों का बाज़ार सा लगा है और वहां ठेके पर इलाज हो रहा है. दूसरी कड़ी में पढ़िए फ़र्रुख़ाबाद के बदहाल सरकारी अस्पताल का आंखों देखा हाल.
फ़र्रुख़ाबाद के राम मनोहर लोहिया अस्पताल के इमरजेंसी वॉर्ड में एकमात्र डॉक्टर दुर्घटना में घायल युवकों को देखने में व्यस्त हैं.
इसी बीच शराब के नशे में धुत्त एक वॉर्ड ब्वॉय हंगामा शुरू कर देता है. डॉक्टर का ध्यान गंभीर रूप से घायल युवक से हटकर वॉर्ड ब्वॉय की ओर चला जाता है.
ये दृश्य ज़िले के इस सबसे बड़े सरकारी अस्पताल की बदहाली को बताने के लिए काफ़ी है.
सिरीज़ की पहली कड़ीःआगरा का अस्पताल बाज़ार, जहां ठेके पर होती है डिलीवरी
क़रीब बीस लाख की आबादी वाले फ़र्रुख़ाबाद का राम मनोहर लोहिया अस्पताल हाल ही में ऑक्सीजन की कथित कमी की वजह से नवजात बच्चों की मौत के बाद सुर्खियों में आया था.
जिस रात मैंने अस्पताल का दौरा किया उसी दिन ज़िले की डीएम अस्पताल में सुविधाओं का जायज़ा लेकर गईं थीं.
लेकिन डीएम का दौरा भी शायद औपचारिकता ही था. अस्पताल में बार-बार बिजली जा रही थी. मरीज़ गर्मी से बेहाल थे, लेकिन जेनरेटर नहीं चल रहा था.
बिजली गायब, मरीज़ बेहाल
महिला अस्पताल में प्रसूता वॉर्ड में 8 दिनों से भर्ती संगीता अवस्थी ने अपने लिए बैटरी चालित निजी पंखा लगवाया हुआ था.
संगीता कहती हैं, "गर्मी लगती है, टांके लगे हुए हैं, पसीना आने से दिक्कत होती है इसलिए अपना पंखा लगवा लिया है. बिजली रात भर आती-जाती रहती है लेकिन जेनरेटर नहीं चलता."
संगीता अपने निजी पंखे की हवा ले रही हैं, लेकिन बगल के बिस्तर पर लेटी गर्भवती महिला इतनी सक्षम नहीं है कि अपने लिए पंखा लगा सके.
अपने हाथ दिखाते हुए वो कहती हैं, "पंखा हिलाते-हिलाते हाथ सूज गए हैं. अगर मेरे पास इतना पैसा होता तो मैं निजी अस्पताल ही न चली जाती, यहां इतनी परेशानी क्यों उठाती."
मरीज़ जहां बिजली न होने की वजह से गर्मी से बेहाल थे वहीं नर्स रूम का पंखा चल रहा था और नर्स आराम से बैठी थीं.
मैं ये समझ नहीं पाया कि अगर नर्स रूम के पंखे चलने का इंतज़ाम किया जा सकता है तो मरीज़ों के वॉर्डों के पंखों क्यों नहीं चल सकते.
तमाम तरह की परेशानियों के बावजूद ग़रीब मरीज़ सरकारी अस्पताल में मुफ़्त इलाज़ मिलने की उम्मीद में पहुंचते हैं. लेकिन क्या यहां उन्हें इलाज बिल्कुल मुफ़्त मिल पाता है?
रिश्वत के आरोप
अपनी गर्भवती भाभी के साथ यहां पहुंचे रामशंकर अस्पताल प्रशासन पर गंभीर आरोप लगाते हैं. वह कहते हैं, "मुझसे नर्स ने दो हज़ार रुपए मांगे लेकिन मैं पांच सौ रुपए ही दे सका तो उन्होंने डिलीवरी में दिक़्क़त कर दी."
रामशंकर का कहना था कि उन्होंने रिश्वत मांगे जाने के बारे में दिन में दौरे पर आईं डीएम को भी बताया लेकिन किसी तरह की कोई कार्रवाई होने के बजाए डीएम के जाने के बाद अस्पताल प्रशासन ने उन्हें धमकियां दीं.
रामशंकर सवाल करते हैं, "ग़रीब अगर सरकारी अस्पताल में न जाएं तो कहां जाएं?"
अतुल कुमार भी रामशंकर की तरह ही परेशान हैं. उनकी गर्भवती बहन को ऑपरेशन के लिए एबी पॉज़ीटिव ब्लड की ज़रूरत थी लेकिन ब्लड नहीं मिल सका.
अतुल की बहन का सिज़ेरियन तो हुआ लेकिन बच्चा नहीं बच सका. अतुल कहते हैं कि अगर ब्लड मिल गया होता तो शायद सब कुछ ठीक रहता.
इस अस्पताल की ओपीडी में रोज़ाना क़रीब दो हज़ार मरीज़ आते हैं. लेकिन क्या उन्हें इलाज मिल पाता है?
मरीज़ों को निबटा रहे ट्रेनी
फ़िजीशियन के कमरे के बाहर लंबी लाइन लगी है. लेकिन डॉक्टर अपनी सीट पर नहीं हैं. दो ट्रेनी डॉक्टर किसी तरह मरीज़ों को 'निबटाने' की कोशिश कर रहे हैं.
मरीज़ एक दूसरे से कुश्ती सी लड़ते हुए अपना पर्चा किसी तरह ट्रेनी डॉक्टर के पास पहुंचाने की कोशिश कर रहे हैं. माहौल किसी रेलवे टिकट काउंटर जैसा है.
ट्रेनी डॉक्टर को रजिस्टर में मरीज़ का नाम भी दर्ज करना है, उससे बात भी करनी है और बीमारी को भी समझना है और इसके लिए उनके पास बमुश्किल एक मिनट का वक़्त है.
सरकारी मानकों के अनुसार डॉक्टर को एक मरीज़ को औसतन छह मिनट देने चाहिए, लेकिन यहां छह मिनट की जगह बमुश्किल 40 सेकंड ही मरीज़ के हिस्से आते हैं.
अस्पताल के कमरा नंबर 29 में हड्डी रोग विशेषज्ञ बैठते हैं जो साढ़े 11 बजे तक नहीं आए हैं. मरीज़ बार-बार पूछ रहे हैं कि डॉक्टर कब आएंगे. लेकिन डॉक्टर हों तो आएं.
डॉक्टरों और नर्सों की भारी कमी
इस अस्पताल में रोज़ाना 60-70 इमरजेंसी मामले आते हैं, इनमें अधिकतर सड़क हादसों के मामले होते हैं. लेकिन अस्पताल में एक भी सर्जन नहीं हैं. जो हैं उनका तबादला हो गया है और जिन्हें ज़िम्मेदारी संभालनी थी उन्होंने अभी पद नहीं संभाला है.
यानी तकनीकी रूप से पूरे फ़र्रुख़ाबाद में एक भी सर्जन नहीं हैं जो सर्जरी कर सके या आपात स्थिति में घायलों को देख सके.
अस्पताल के अधीक्षक डॉक्टर बीबी पुष्कर कहते हैं, "अस्पताल में 29 डॉक्टरों के पद स्वीकृत हैं लेकिन हमारे पास सिर्फ़ चौदह डॉक्टर हैं. हमारे विशेषज्ञ डॉक्टर इधर-उधर के कामों में भी व्यस्त रहते हैं. उन्हें इमरजेंसी ड्यूटी भी देनी होती है, वीआईपी ड्यूटी भी करनी होती है और पोस्टमॉर्टम भी करने होते हैं. ऐसे में कहने को तो हमारे पास चौदह डॉक्टर हैं लेकिन असल में चार-पांच डॉक्टर ही आम मरीज़ों के लिए उपलब्ध रह पाते हैं."
डॉ पुष्कर कहते हैं, "यही हाल स्टाफ़ नर्सों का है. अस्पताल में 29 स्टाफ़ नर्सों के पद हैं लेकिन सिर्फ़ 13 स्टाफ़ नर्स ही तैनात हैं."
तो क्या सरकार अस्पताल की इस स्थिति से वाकिफ़ नहीं है?
डॉक्टर पुष्कर कहते हैं, "हम हर स्तर पर डॉक्टरों की कमी का मुद्दा उठाते हैं. सांसदों, विधायकों और ज़िले और मंडल के अधिकारियों को बार-बार इससे अवगत कराया जाता है. सरकार को भी पता है कि अस्पताल में डॉक्टर नहीं हैं."
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