आगरा का अस्पताल बाज़ार, जहां ठेके पर होती है डिलीवरी

    • Author, दिलनवाज़ पाशा
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, आगरा से लौटकर

उत्तर प्रदेश में गोरखपुर और फ़र्रूख़ाबाद के सरकारी अस्पतालों में बच्चों की मौत के बाद उत्तर प्रदेश की स्वास्थ्य व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े हुए हैं. इन घटनाओं के बाद राज्य सरकार ने दावा किया कि सब कुछ ठीक करने की कोशिश की जा रही है.

लेकिन इन घटनाओं के इतने दिनों बाद भी हालात जस के तस नज़र आ रहे हैं. आगरा के बाहरी इलाक़े में जैसे अस्पतालों का बज़ार लगा है, हताश-परेशान मरीज़ और उनके रिश्तेदार एक अस्पताल से दूसरे अस्तपाल भागते नज़र आते हैं.

सब पैसों का खेल है. कहीं ठेके पर डिलीवरी कराई जा रही है, तो कुछ अस्पतालों के पास सही दस्तावेज़ तक नहीं. बिना डॉक्टरी पढ़े लोग गंभीर बीमारियों का इलाज कर रहे हैं.

आगरा के ट्रांस यमुना इलाक़े में स्थित चैतन्य 'अस्पताल' के बाहर चबूतरे पर बैठ पतली प्लास्टिक के कप में चाय पी रहे रामसा को देखकर ये अंदाज़ा लगाना मुश्किल था कि उन्हें अपने घर में एक नए मेहमान के आने की ख़ुशी है या ज़मीन जाने का ग़म.

रामसा की बहू दुर्गेश ने 10 दिन पहले आगरा के प्रार्थना अस्पताल में सिज़ेरियन के जरिए बेटे को जन्म दिया था और ये तीसरा अस्पताल है जिसके 'आईसीयू' में उन्हें भर्ती होना पड़ा था.

दुर्गेश की मां मीरा देवी बताती हैं, "हम अपनी बेटी को खंदौली के सरकारी अस्पताल में ले जाना चाहते थे लेकिन आशा कार्यकर्ता (ग्रामीण क्षेत्र में गर्भवती महिलाओं के स्वास्थ्य का ध्यान रखने के लिए नियुक्त स्वास्थ्य कार्यकर्ता) हमें आगरा ले आई और प्रार्थना अस्पताल में 14 हज़ार रुपए में डिलीवरी का ठेका करा दिया."

मीरा को बताया गया था कि उनकी बेटी की ऑपरेशन से डिलीवरी में कुल ख़र्च 14 हज़ार रुपये होंगे और जच्चा और बच्चा दोनों की जानें बच जाएंगी.

चाहे घर बिके या ज़मीन

पांच दिन बीत गए लेकिन दुर्गेश की तबीयत ठीक नहीं हुई. परिवार उन्हें आगरा के ही अमरदीप अस्पताल में ले गया जहां एक दिन के इलाज में उनके क़रीब 20 हज़ार रुपए ख़र्च हो गए.

दुर्गेश के पिता कालीचरण का आरोप है कि हरदीप अस्पताल में उन्हें ख़ून की बोतल साढ़े चार हज़ार रुपए में बेची गई. तीन अलग-अलग अस्पतालों में 10 दिन तक चले इलाज का ख़र्च 75 हज़ार रुपए पार कर गया. पैसों का जुगाड़ करने के लिए रामसा को अपनी ज़मीन गिरवी रखनी पड़ी.

उन्हें ज़मीन जाने का अफ़सोस तो नहीं है, इस सवाल पर उन्होंने कहा, "जान और ज़मीन में से किसी एक को बचाना हो तो क्या बचाओगे? ज़मीन बिक जाए या आप बिक जाएं, इलाज तो कराना पड़ेगा." रामसा अपनी बात पूरी कर ही रहे थे कि दुर्गेश के पिता कालीचरण बोल पड़े, "डॉक्टर पैसे मांग रहे हैं तो देने पड़ेंगे. फिर चाहे घर बिके या ज़मीन बिके."

दुर्गेश का इलाज जिस चैतन्य 'अस्पताल' में चल रहा था वो एक बेसमेंट में था. इमारत अभी पूरी नहीं बनी थी. इस संवाददाता ने जब आगरा के मुख्य चिकित्सा अधिकारी मुकेश कुमार वत्स को दुर्गेश के बारे में जानकारी दी तो उन्होंने अपनी टीम के साथ अस्पतालों पर छापा मार दिया.

सबूत भी नहीं रखते अस्पताल

सीएमओ की जांच में पता चला कि अस्पताल को एक बीएएसी (गणित) पास युवक चला रहा है और जिन डॉक्टरों के नाम अस्पताल के लिए पंजीकरण हासिल करने के दौरान सीएमओ कार्यालय में दिए गए थे उनमें से कोई भी मौक़े पर मौजूद नहीं था.

फ़ोन करने पर भी इनमें से कोई भी डॉक्टर अस्पताल में नहीं पहुंचा. सीएमओ ने अस्पताल में नए मरीज़ भर्ती करने पर रोक लगा दी और प्रबंधन को दोबारा पंजीकरण के लिए आवेदन करने का नोटिस थमा दिया.

चिकित्सा विभाग की टीम जब प्रार्थना अस्पताल पहुंची (जहां दुर्गेश का ऑपरेशन हुआ था), तो वहां सिर्फ़ एक डॉक्टर मौके पर मिले. हालांकि दुर्गेश के ऑपरेशन से संबंधी कोई भी दस्तावेज़ अस्पताल नहीं दिखा सका.

चिकित्सा विभाग ने प्रार्थना अस्पताल में नए मरीज़ों को भर्ती करने से प्रतिबंधित कर दिया. यहां रामसा और अस्पताल के प्रबंधन के बीच ठेका लेकर इलाज पूरा न करने को लेकर नोकझोंक भी हुई.

कर्ज़ लेकर इलाज

ट्रांस यमुना स्थित कृष्णा अस्पताल के बाहर बैठी चंद्रवती अपने पोते की सेहत की कामना कर रहीं थी. फिरोज़ाबाद से आई चंद्रवती के पोते का जन्म एक सरकारी अस्पताल में हुआ था जिसे तबीयत ख़राब होने पर निजी अस्पताल भेज दिया गया.

निजी अस्पताल के इलाज पर परिवार के लगभग एक लाख 40 हज़ार रुपए ख़र्च हो गए. बच्चे के पिता दिल्ली में एक प्राइवेट नौकरी करते हैं.

नवजात के चाचा संजय कुमार कहते हैं, "हमारे पास जो भी जमापूंजी थी ख़र्च हो गई. हमें रिश्तेदारों के अलावा साहूकार से भी ब्याज़ पर कर्ज़ लेना पड़ा है."

परिवार के पास जितना पैसा था वो ख़र्च हो चुका था और अब वो नवजात की छुट्टी कराकर उसे घर ले जा रहे थे. परिवार को इस बात की ख़ुशी ज़रूर थी कि सरकारी अस्पताल में जिन बच्चों की जान बचनी मुश्किल हो रही थी निजी अस्पताल के महंगे इलाज ने उसे सांसें लौटा दी थीं.

दो किमी में 75 अस्पताल

मैनपुरी ज़िले से आकर यहीं के सदाशिव अस्पताल में अपने भाई का इलाज करा रहे बबलू बताते हैं कि उनके भाई को बुखार हुआ था. लोकल डॉक्टर से दवा ली पर आराम नहीं हुआ तो एटा के एक निजी अस्पताल ले गए. वहां भी हालत नहीं बदली.

बबलू अपने भाई को लेकर दिल्ली को लोकनायक जयप्रकाश अस्पताल ले गए जहां इलाज नहीं मिल सका.

आख़िरकार वो अपने भाई को लेकर ट्रांस यमुना के सदाशिव अस्पताल आए. यहां नौ दिन चले इलाज पर करीब 90 हज़ार रुपए खर्च हो गए. बबलू बताते हैं कि उन्हें इसके लिए उन्हें अपने बकरे बेचने पड़े और रिश्तेदारों से उधार लेना पड़ा.

आगरा के जिस ट्रांस यमुना इलाक़े में ये दोनों अस्पताल स्थित हैं वहां करीब दो किलोमीटर के इलाक़े में 75 निजी अस्पताल हैं. यहां पहुंचकर ऐसा लगता है मानों आप अस्पतालों के किसी बाज़ार में पहुंच गए हों.

इतने छोटे इलाक़े में इतने अस्पताल क्यों हैं इसका जवाब देते हुए यहीं चल रहे वंदना अस्पताल के संचालक और आगरा के स्वास्थ्य अधिकारी डॉक्टर वीके सिंघल कहते हैं, "ये शहर का बाहरी इलाक़ा है जो कई ग्रामीण क्षेत्रों को आगरा से जोड़ता है. यहां ज़मीन भी सस्ती है और डॉक्टरों को एक दूसरे के आसपास होकर सुरक्षा का अहसास भी होता है."

एक डॉक्टर बीस बीस अस्पताल में दर्ज़

वहीं स्वास्थ्य संबंधी मुद्दों पर काम करने वाले और अस्पतालों को लेकर कई याचिकाएं दायर कर चुके कार्यकर्ता शबी जाफ़री कहते हैं, "आगरा में कुल 2603 अस्पताल पंजीकृत हैं. ट्रांस यमुना इलाक़े में चल रहे कई अस्पताल खुलेआम नियमों का उल्लंघन करते हैं लेकिन चिकित्सा विभाग इन पर कोई कार्रवाई नहीं करता. बेसमेंट में आईसीयू चल रहे हैं, अस्पतालों में डॉक्टर नहीं हैं लेकिन फिर भी कोई ठोस कार्रवाई नहीं की जा सकी."

जाफ़री कहते हैं, "पिछले कुछ सालों में ये इलाक़ा स्वास्थ्य बाज़ार सा बन गया है. यहां इलाज कराने वाले अधिकतर लोग ग़रीब होते हैं जिन्हें अपने अधिकारों की जानकारी नहीं होती है. यहां एक-एक डॉक्टर के नाम 20-20 अस्पतालों के दस्तावेज़ों में लगे हैं."

जाफ़री कहते हैं, "यहां मरीज़ों की दलाली होती है. एक बार मरीज़ इस मंडी में आ जाए तो उसका लुटना तय है. यहां जो भी हो रहा है उससे प्रशासन पूरी तरह अवगत है."

आगरा के सीएमओ मुकेश वत्स कहते हैं, "हमने छापा मारकर दो अस्पतालों को नोटिस दिए हैं. बाकी अस्पतालों पर भी समय-समय पर छापेमारी की जाएगी."

उन्होंने कहा, "अगर इन अस्पतालों में बिना मेडिकल डिग्री वाले लोग इलाज कर रहे हैं तो ये ग़लत हो रहा है हम इसे रोकने का हर संभव प्रयास करेंगे."

सरकारी अस्पताल में सर्जन नहीं

दुर्गेश को खंदौली स्वास्थ्य केंद्र के बजाए निजी अस्पताल पहुंचा दिया गया था. जब मैंने खंदौली के सरकारी अस्पताल का दौरा किया तो पता चला कि अस्पताल में एक भी सर्जन मौजूद नहीं है.

खंदौली स्वास्थ्य केंद्र आम सरकारी अस्पतालों की तुलना में काफ़ी साफ़-सुथरा था. यहां ऑपरेशन थिएटर भी है लेकिन सर्जन न होने की वजह से यहां ऑपरेशन नहीं किए जाते हैं.

अस्पताल के अधीक्षक डॉ. उपेंद्र के मुताबिक अस्पताल में करीब 200 डिलीवरी प्रतिमाह होती हैं लेकिन अगर कोई जटिल मामला होता है तो सर्जन न होने की वजह से वो उसे ज़िला अस्पताल रेफ़र कर देते हैं.

अस्पताल में मरीजों को भर्ती करने की सुविधा है लेकिन तीन गर्भवती महिलाओं के अलावा एक भी मरीज़ अस्पताल में भर्ती नहीं था.

सरकारी अस्पताल में जहां बिस्तर ख़ाली थे वहीं ग़रीब लोग इलाज कराने आगरा के निजी अस्पतालों में पहुंच गए थे.

लोग सरकारी अस्पताल में मुफ़्त इलाज के बजाए कर्ज़ लेकर भी निजी अस्पतालों में इलाज क्यों करा रहे हैं, इसका जवाब स्वास्थ्य विभाग को तलाशना चाहिए.

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