एक महीने बाद गोरखपुर अस्पताल का हाल!

    • Author, कुमार हर्ष
    • पदनाम, गोरखपुर से बीबीसी हिंदी के लिए

गोरखपुर के बाबा राघवदास मेडिकल कॉलेज में बीती 10 अगस्त को हुई 36 बच्चों की मौत की घटना को एक महीना पूरा होने जा रहा है. इस बीच यहां बहुत कुछ घटित हो चुका है.

उस वक्त मेडिकल कॉलेज के प्राचार्य रहे डॉ. राजीव मिश्रा, उनकी डॉक्टर पत्नी पूर्णिमा शुक्ला और इंसेफ़ेलाइटिस वॉर्ड के प्रभारी रहे डॉ. कफ़ील ख़ान समेत मेडिकल कॉलेज के चार लोग गिरफ्तार कर जेल भेजे जा चुके हैं और पांच अन्य आरोपियों की धरपकड़ के लिए पुलिस लगातार छापेमारी कर रही है.

एक महीने पहले हुई घटना के बाद अब बाबा राघवदास मेडिकल कॉलेज में क्या-क्या तब्दीली आई है, डालते हैं उस पर एक नज़र...

•बीआरडी मेडिकल कॉलेज में अब पहले जैसी अफ़रा-तफ़री नहीं दिखती है. शायद इसकी सबसे बड़ी वजह यहां होने वाले प्रशासन के दौरे हैं. हर दिन ज़िलाधिकारी द्वारा गठित चार सदस्यीय एक टीम यहां आकर जायज़ा लेती है.

•मेडिकल कॉलेज के लंबे-चौड़े गलियारों और इंसेफ़ेलाइटिस वॉर्ड तक जाने वाली 66 सीढ़ियों पर भी लगातार साफ़-सफ़ाई होती है.

•7 डॉक्टर और एक मेडिकल कॉलेज के प्रोफ़ेसर के अलावा विभिन्न मेडिकल कॉलेजों के 11 रेज़िडेंट डॉक्टर्स अब तक यहां आ चुके हैं और अपनी सेवाएं दे रहे हैं. हालांकि, कुछ को छोड़कर इनमें से ज़्यादातर के लिए इंसेफ़ेलाइटिस का अनुभव नया है.

•आधारभूत ढांचे में बदलाव आया है. पहले यहां कुल 16 वार्मर हुआ करते थे जिनमें से पांच ख़राब थे. अब यह संख्या 52 हो गई है जिससे यहां ड्यूटी करने वाले डॉक्टर कुछ सहूलियत महसूस कर रहे हैं.

•लगभग हर तीसरे दिन लिक्विड ऑक्सीजन के टैंकर यहां पहुंच रहे हैं.

•यहां हर दिन औसतन 1400 मिलीलीटर लिक्विड ऑक्सीजन की ज़रूरत पड़ती है और इसके लिए 9000 मिलीलीटर का बड़ा ऑक्सीजन टैंक मौजूद है.

•नए बंदोबस्त के मुताबिक अब 3000 मिलीलीटर ऑक्सीजन शेष रहते ही टैंक को फिर से भर दिया जाता है.

•इसके अलावा जंबो सिलेंडर की शक्ल में भी ऑक्सीजन का वैकल्पिक प्रबंध पर्याप्त है.

डॉ. कफील ने दिखाई तेज़ी?

10 अगस्त को 36 मौतों के बाद आमतौर पर यह माना गया था की यह मौतें ऑक्सीजन की कमी से हुई थीं. हालांकि मेडिकल कॉलेज प्रशासन से लेकर ज़िला प्रशासन, यहां तक कि प्रदेश सरकार के ज़िम्मेदारों ने भी बार-बार इस आरोप का खंडन किया था और अभी भी मेडिकल कॉलेज के ज़िम्मेदार लोग अपने इस रुख़ पर कायम हैं.

नाम न उल्लेख करने की शर्त पर एक डॉक्टर कहते हैं कि यदि मीडिया के सामने सुर्खरू बनने के लिए डॉ. कफ़ील खान ने ऑक्सीजन सिलेंडर के इंतजाम में अति सक्रिय होने की कोशिशें न दिखाई होती तो शायद ही किसी को ऑक्सीजन की कमी की वजह समझ में आती.

वह जोर देकर देकर कहते हैं कि मेडिकल कॉलेज में इस तरह से मौतों का सिलसिला वर्षों पुराना है, लेकिन इस बार जिस तरह की सनसनी फैली वह अभूतपूर्व थी .

अभी भी मौतें जारी

वर्ष 2014 में एनआईसीयू में 356 नवजातों की मौत हुई थी. 2015 में यह आंकड़ा आंकड़ा 644 तक पहुंच गया. अगले साल यानी 2016 में 870 मासूमों की मौत हुई और इस साल केवल अगस्त महीने तक एक हज़ार से ज़्यादा नवजात यहां अपनी अंतिम सांस ले चुके हैं.

इसकी वजह कई हैं. डॉक्टर्स का मानना है कि इस जगह पर क्षमता से अधिक भीड़ है और ऐसे मासूम मरीज़ों की तादाद ज़्यादा है जो यहां आने से पहले काल के क्रूर पंजे पर अपनी पकड़ गहरी कर चुके होते हैं.

बदकिस्मती से इन सारी कोशिशों के बावजूद मौतों का सिलसिला रुक नहीं रहा. पिछले एक महीने में भी लगभग 400 मासूम अपनी जान गंवा चुके हैं.

चार तरीकों से पा सकते हैं काबू

एक वरिष्ठ प्रोफ़ेसर के मुताबिक इंसेफ़ेलाइटिस या एनआईसीयू में होने वाली मौतों को रोकने के लिए चार विभिन्न स्तरों पर एक साथ काम करना होगा.

उनके मुताबिक सबसे पहले जो बीमार या भर्ती हैं उन्हें बेहतर इलाज मुहैया कराना होगा. इसके अलावा इंसेफ़ेलाइटिस के हमले से बच जाने, लेकिन शारीरिक या मानसिक विकलांगता का शिकार हो जाने वाले बच्चों के पुनर्वास और इलाज पर भी उतना ही ध्यान देना होगा.

तीसरा मोर्चा जन जागरुकता का है. लोगों को बेहतर ढंग से यह बताने की ज़रूरत है कि वह किस प्रकार इन बीमारियों से बच सकते हैं और चौथा मोर्चा उन अनुसंधानों या ज़रूरी अध्ययनों का है जिसके आधार पर हम यह अनुमान लगा सके कि आगे बीमारी का हमला कितना व्यापक हो सकता है.

ज़ीशान करते हैं मदद

उधर मेडिकल कॉलेज के गेट से बाहर निकलने पर सड़क के बाईं तरफ़ ज़ीशान अपने ऑटो में बैठे खास सवारियों का इंतज़ार कर रहे हैं. वे ज़्यादातर ऐसे लोगों को सेवाएं देते हैं जो अपने परिजनों को खोकर रोते-बिलखते अपने घर जाने के लिए साधन खोजने बाहर आते हैं.

बीते कुछ दिनों में ज़ीशान ने अधिकतर नन्हीं बेजान देहों को उनके घर तक पहुंचाया है. वह कहते हैं, काम तो है, मगर बहुत तकलीफ़ होती है अब ये कहर थम ही जाना चाहिए.

देखना यह है कि अब प्रशासन कितना चौकन्ना रहता है और हर साल कहर बरपाने वाले इस दिमाग़ी बुख़ार पर कितना काबू कर पाता है.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)