नज़रिया: गुजरात में इस बार मोदी पर भारी पड़ सकते हैं राहुल?

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- Author, आर के मिश्र
- पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिंदी के लिए
कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी सोमवार से तीन दिन के गुजरात दौरे पर हैं. राहुल गांधी सबसे पहले द्वारका में श्री कृष्ण मंदिर गए.
द्वारकाधीश के दर्शन के बाद पुरोहित ने उन्हें दादी इंदिरा गांधी और पिता राजीव गांधी के हस्ताक्षरयुक्त संदेश दिखाए.
इन संदेशों के साथ कांग्रेस की ओर से ट्वीट किया गया कि राहुल गांधी ने उसी परंपरा को आगे बढ़ाया है.
राहुल पार्टी के चुनाव प्रचार के तहत सड़क के रास्ते सौराष्ट्र का दौरा करेंगे. इस दौरान राहुल गांधी कई रोड शो, जनसभाएं करेंगे. यहां राहुल किसानों से भी मिलेंगे.

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राहुल गांधी 26 सितंबर को राजकोट में व्यवसायियों और उद्योगपतियों से मिलेंगे. गुजरात में इस साल के अंत में होनेवाले विधानसभा चुनाव के मद्देनज़र राहुल गांधी का ये दौरा बेहद अहम माना जा रहा है.
राहुल के इस दौरे की सियासी अहमियत पर बीबीसी हिंदी के रेडियो एडिटर राजेश जोशी ने वरिष्ठ पत्रकार आरके मिश्र से बात की. पढ़ें उनका नज़रियाउन्हीं के शब्दों में-
राहुल गांधी के चुनावी मुहिम की शुरुआत द्वारकाधीश से करने के पीछे की वजह को गुजरात की धार्मिक परंपरा से जोड़कर देखा जा सकता है. गुजरात के संदर्भ में ये परंपरा ये रही है कि यहां किसी अच्छी चीज़ की शुरुआत धार्मिक स्थान से की जाती है.
जिस तरीके से उत्तर भारत में जयश्रीराम कहने की परंपरा है, वैसे ही गुजरात में जयश्रीकृष्ण. गुजरात में जबसे भाजपा सियासत में आगे आई है, तभी से उसने इसे धर्म के साथ आगे बढ़ाया है.

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अपना-अपना वोट बैंक
विश्व हिंदू परिषद ने शहरों से लेकर गांवों तक एक नेटवर्क फैला दिया था जिसे 'पगपाड़ा संघ' यानी पैदल चलकर जाना कहा जाता था. किसी धार्मिक कार्यक्रम में लोग पैदल ही निकल पड़ते हैं.
लेकिन ये कहना कि राहुल गांधी विश्व हिंदू परिषद या भाजपा के इस मॉडल की नकल कर उन्हें इस तरह सियासी टक्कर दे पाएंगे, ये कहना ग़लत होगा.
दरअसल, कांग्रेस ये संदेश देने की कोशिश कर रही है कि वो भी धार्मिक महत्व को स्वीकार करती है. जिस तरह से गुजरात के सामाजिक ताने-बाने में धर्म शामिल है, उसे कोई भी राजनीतिक दल नज़रअंदाज़ नहीं कर सकता. यही वजह है कि राहुल गांधी सौराष्ट्र के तीन दिनों के दौरे पर कई मंदिरों में जाएंगे.
मंदिरों में जाने का कांग्रेस के परंपरागत मुसलमान वोटर्स में कैसा राजनीतिक संदेश जाएगा, इस पर अभी अटकलें नहीं लगाई जानी चाहिए.
अभी तो राहुल गांधी ने अपनी यात्रा की शुरुआत की है. अपनी यात्रा के दौरान कांग्रेस मुसलमानों को भी ये संदेश ज़रूर देगी कि उन्हें भुलाया नहीं गया है. गुजरात में मुसलमान सशक्त वोट बैंक हैं और बेशक उनकी काफ़ी अहमियत है.
सौराष्ट्र निशाने पर
चुनावी बिसात की बात करें तो कांग्रेस के लिए इससे बेहतर स्थिति तो पिछले 20 सालों में कभी नहीं थी. आने वाले चुनावों में भाजपा के ख़िलाफ़ एंटी इनकम्बेंसी समेत कई फ़ैक्टर हैं. लोगों में निराशा का वातावरण है और जिस तरह से भाजपा सरकार क़दम उठा रही है, उससे साफ़ ज़ाहिर है कि भाजपा बैकफ़ुट पर है.

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सौराष्ट्र वैसे भी गुजरात की राजनीति में बेहद अहम रहा है. गुजरात की कुल 182 में से 58 सीटें इस क्षेत्र से हैं. 2015 में नरेंद्र मोदी के गुजरात से दिल्ली चले जाने के बाद 11 में से 8 ज़िला पंचायतों में कांग्रेस विजयी रही थी, हालांकि ये भी सही है कि ये वो दौर था जब गुजरात में पाटीदारों का आंदोलन चल रहा था.
सौराष्ट्र का इलाक़ा किसानों का है. पूर्व मुख्यमंत्री केशुभाई पटेल ने बड़ी मेहनत से इस इलाक़े में भाजपा को मज़बूत बनाया है. लेकिन आज इन क्षेत्रों में असंतोष का माहौल है.
किसान, दलित और पाटीदारों में असंतोष दिखता है. राहुल की यात्रा से बीजेपी में कितना हड़कंप है इसका अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि राहुल गांधी की यात्रा से ठीक एक दिन पहले गुजरात सरकार ने मूंगफली की ख़रीद कीमत 600 रुपये से बढ़ाकर 900 रुपये प्रति क्विंटल कर दी. तो कहीं न कहीं भाजपा किसानों के असंतोष से डरी हुई है.
सोशल मीडिया चुनौती?
अब सोशल मीडिया का ही हाल ले लें. जिस टूल का इस्तेमाल कर भाजपा ने 2012 का गुजरात और 2014 का आमसभा चुनाव जीता था, उसी टूल से अब भाजपा पर हमले हो रहे हैं. यही वजह है कि अरुण जेटली को गुजरात का दो बार दौरा करना पड़ा और कार्यकर्ताओं को सोशल मीडिया पर सतर्क और तैयार रहने को कहना पड़ा.

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पटेल आरक्षण की मांग को लेकर आंदोलन कर रहे हार्दिक पटेल ने भी ट्वीट करके राहुल गांधी का स्वागत किया है. हार्दिक पटेल ने लिखा है कि 'कांग्रेस के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष राहुल जी का गुजरात में हार्दिक स्वागत है. जय श्री कृष्णा.'
पाटीदार और हार्दिक पटेल को लेकर भी भाजपा के अंदर घबराहट या अफ़रातफरी का माहौल है. अभी 15 दिन पहले तक हार्दिक पटेल के ख़िलाफ़ केस किए जा रहे थे, अब स्थिति ये है कि सरकार पाटीदारों से हर हाल में समझौता करना चाह रही है.
मंगलवार को पाटीदारों के संगठनों की बैठक बुलाई गई है जिसमें सरदार पटेल ग्रुप और पाटीदार अनामत आंदोलन समिति के लोगों को भी बुलाने का भी दबाव बनाया जा रहा है.
कुल मिलाकर भाजपा की रणनीति अब मतदाताओं को बांटने की है. भाजपा कुल मिलाकर मोदीजी और ओबीसी पर दांव लगा रही है.
(ये लेखक के निजी विचार हैं)
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