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नज़रिया: सही-ग़लत के विवाद से नहीं उबर पाया तस्लीमुद्दीन का नाम और काम
- Author, मणिकांत ठाकुर
- पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार
बिहार की सियासत में मोहम्मद तस्लीमुद्दीन का नाम और काम, ग़लत और सही के विवादों से कभी उबर नहीं पाया.
एक तरफ़ उन्हें आपराधिक छवि वाले दबंग नेताओं में शुमार किया जाता रहा, वहीं दूसरी तरफ़ कमज़ोर तबक़ों के बीच उनकी एक असरदार और मददगार जनप्रतिनिधि वाली छवि भी बनी.
74 वर्षों के जीवन-काल में कोई व्यक्ति अगर आठ बार विधानसभा के चुनाव और पाँच बार लोकसभा के चुनाव जीत चुका हो, तो उसकी सियासी हैसियत का अंदाज़ा लगाया जा सकता है.
उस दौरान कई आपराधिक मामलों में उन्हें अभियुक्त बनाया गया. लेकिन कुछ मामलों में चार्जशीटेड हो कर भी तस्लीमुद्दीन पर सज़ायाफ़्ता होने का दाग़ नहीं लगा.
हालांकि बिहार में राजनीति के अपराधीकरण से जुड़े सियासी बाहुबलियों में इनकी भी गिनती होती रही, फिर भी शहाबुद्दीन और तस्लीमुद्दीन का फ़र्क़ यहाँ सब को पता है.
सीमांचल का सियासी समीकरण
बिहार के सीमांचल यानी अररिया, पूर्णिया, कटिहार और किशनगंज ज़िलों में न सिर्फ़ मुस्लिम समाज को, बल्कि दलित और पिछड़े समुदाय को गोलबंद करने में तस्लीमुद्दीन की अहम भूमिका मानी गई.
इतना ही नहीं, जात-जमात की चुनावी ताक़त में इनके बाहुबल ने ऐसा ज़ोर लगाया कि सीमांचल का सियासी समीकरण बदलने लगा.
यही कारण है कि शिक्षा के नाम पर मात्र मौलवी डिग्रीधारी तस्लीमुद्दीन केवल विधायक और सांसद ही नहीं, दो-दो बार केंद्र सरकार के राज्यमंत्री पद पर भी आसीन हुए.
इन्होंने सोशलिस्ट पार्टी के वर्कर के रूप में राजनीति में प्रवेश किया था. फिर कांग्रेस, जनता पार्टी और लोकदल होते हुए राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) में आकर टिक गए.
केंद्र में गृहराज्यमंत्री तक
आरजेडी प्रमुख लालू प्रसाद यादव जिस वर्ष (1996) चारा घोटाले में घिरे थे, उसी साल मोहम्मद तस्लीमुद्दीन को लालू ने ही केंद्र सरकार में गृह राज्यमंत्री बनवाया था. उसके बाद वर्ष 2004 में इन्हें कृषि राज्यमंत्री का ओहदा मिला.
जब इन्हें केंद्र में गृह राज्यमंत्री बनाया गया था, तब तत्कालीन केंद्र सरकार की ख़ूब आलोचना हुई थी. कहा गया कि एक आपराधिक छवि के व्यक्ति को यह पद सौंपना शर्मनाक है.
लेकिन ऐसी आलोचनाओं से वह कितने बेपरवाह थे, इसका अंदाज़ा मुझे तब हुआ, जब उनसे इंटरव्यू के लिए मैं उनके पटना आवास पर गया था.
पहले ही स्पष्ट कर दूँ कि तैश में तस्लीमुद्दीन का प्राय: हरेक वाक्य किसी-न-किसी गाली से शुरू या ख़त्म होता था. और यह टॉपिक भी ऐसा था कि पहले ही सवाल पर उन्होंने अपने आलोचकों पर गालियों की बौछार कर दी.
वह शायद भूल गए कि देश के वह गृह राज्यमंत्री हैं. नतीजा हुआ कि वह भेंटवार्ता प्रसारण के योग्य ही नहीं रही.
हिंदू समर्थकों की तादाद
उन्होंने ख़ुद भी इस बातचीत को मिटा देने का आग्रह करते हुए कहा, ''क्या करें, वाहियात बातों पर ग़ुस्सा कैसे रोकें?''
किसी को भी मुँह पर खरी-खरी सुना देना या जो मन को ठीक जँचा, उसे बिना किसी डर-भय के बोल देना, उन्हें अक्सर विवादों में डालता रहा.
ख़ासकर बिहार के मुस्लिम बहुल सीमांचल में उनकी गतिविधियों को उनके विरोधियों ने सांप्रदायिक दबंगई क़रार दिया था. प्रतिक्रिया में हुए टकराव को राजनीतिक रंग दिया जाने लगा.
जबकि वहाँ की ज़मीनी जानकारी रखने वाले अभी भी मानते हैं कि तस्लीमुद्दीन के हिन्दू समर्थकों की भी तादाद कम नहीं थी.
वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में कथित मोदी लहर को धता बताते हुए अररिया से जीते आरजेडी उम्मीदवार तस्लीमुद्दीन अपनी मर्ज़ी के मालिक थे.
पिछले चुनाव में तो उन्होंने अपने ही दल को नुक़सान पहुँचाने वाली टिप्पणी कर दी थी.
मर्ज़ी के मालिक थे तस्लीमुद्दीन
कह दिया कि हो सकता है सीमांचल में कहीं-कहीं मुस्लिम मतदाता बीजेपी को वोट दे दें.
कुछ महीने पहले उन्होंने यहाँ की महागठबंधन सरकार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पर तीखा बयान दे दिया था.
उन्होंने कहा था, "नीतीश प्रधानमंत्री बनने का ख़ाब देखता है, पर सच्चाई ये है कि वह किसी गाँव का मुखिया बनने के लायक भी नहीं है."
इस पर बवाल मचा और आरजेडी ने भी उनसे बयान वापस लेने को कहा. लेकिन वह अपनी टिप्पणी पर अड़े रहे.
कई ऐसे प्रसंग हैं, जो तस्लीमुद्दीन के स्याह-सफ़ेद, अच्छे-बुरे, खरे-खोटे और तीखे-मीठे विरोधाभासी चित्र समेटे हुए हैं.
सीमांचल के कई इलाक़ों में शैक्षणिक संस्थान खुलवाने और किसानों के हित में सहकारिता मुहिम चलाने वाला आदमी असली तस्लीमुद्दीन था या वह, जो अपनी आपराधिक छवि लिए हुए चला गया?
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