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नज़रिया: जाने कहां गए बिहार कांग्रेस के 'महागठबंधन' वाले अच्छे दिन!
- Author, मणिकांत ठाकुर
- पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए
बिहार में सत्ता-साझेदारी से हाल ही वंचित हुई कांग्रेस के कई विधायक सत्ताधारी जनता दल यूनाइटेड (जेडीयू) से जुड़ने को बेताब हैं.
वजह साफ़ है कि इनमें मंत्री या मंत्री-स्तर के अन्य पद का लोभ या तो जगा है या जगाया गया है.
ऐसा निष्कर्ष किसी अनुमान या आरोप के आधार पर नहीं निकाला जा रहा, बल्कि पार्टी के अंदर से उभरकर सतह पर आईं कुछ गतिविधियों ने इसके स्पष्ट संकेत दिए हैं.
इस तरह दल छोड़ने या बदलने की आशंका जब बलवती होकर आम चर्चा में आ गई, तब एक्टिव मोड में आए पार्टी आलाकमान की हड़बड़ी से बात और खुल गई.
नीतीश और लालू
प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष अशोक चौधरी और राज्य विधानसभा में विधायक दल के नेता सदानंद सिंह दिल्ली बुलाए गए.
दोनों नेताओं ने सोनिया गाँधी और राहुल गाँधी से मुलाक़ात के बाद एकजुटता वाले औपचारिक बयान ज़रूर दिए, लेकिन हाव-भाव ऐसा था कि सत्ता-सूत्र में बँधने की गुंजाइश बनी रहे.
थोड़ा और स्पष्ट कर दें कि बिहार में कांग्रेसी विधायकों के रुख़ या रुझान इन दिनों नीतीश कुमार और लालू यादव के बीच बँटे हुए हैं.
कारण है कि मुस्लिम-यादव बहुल विधानसभा क्षेत्रों वाले कांग्रेसी विधायक लालू प्रसाद के ख़िलाफ़ जाकर अपना चुनावी भविष्य बिगाड़ना नहीं चाहते.
जेडीयू का मजबूत होना
उसी तरह सवर्ण और ग़ैर यादव-मुस्लिम समाज की बहुलता वाले क्षेत्रों से जुड़े कांग्रेसी विधायक जेडीयू-बीजेपी गठबंधन के साथ रहने में अपना फ़ायदा समझते हैं.
इनके अलावा जो तात्कालिक लाभ के चक्कर में हैं, ज़ाहिर है कि उन्हें मुख्यमंत्री नीतीश ही पसंद आएंगे.
मतलब साफ़ है कि बिहार के 27 सदस्यों वाले कांग्रेस विधायक दल का जो गुट दो तिहाई (18) सदस्य अपने साथ जुटा लेगा, वह जेडीयू में शामिल हो कर सत्ताधारी कहलाना क्यों नहीं चाहेगा!
हालांकि इस संभावना में एक बाधा तब आ सकती है, जब 18 विधायकों के साथ आ जाने पर 70 विधायकों वाले जेडीयू का मज़बूत होना बीजेपी को नागवार गुज़रे.
केंद्र की सरकार
लालू प्रसाद ने इसी बात को आधार बनाते हुए कहा है कि कांग्रेस में तोड़फोड़ से अपनी ताक़त बढ़ाना चाह रहे नीतीश कुमार को बीजेपी ने केंद्र की सरकार में घुसने नहीं दिया.
एक अनुमान यह भी है कि नीतीश कुमार से सहमति या अंदरूनी इशारा पाकर ही केंद्रीय मंत्रिमंडल से सहयोगी दलों को फ़िलहाल दूर रखा गया होगा.
यानी इससे कई तरह के झंझट टल गये. जो भी हो, बिहार में 'महागठबंधन' का बेमौत मर जाना कांग्रेस के लिए बहुत नुक़सानदेह साबित हो रहा है.
लंबी प्रतीक्षा के बाद बिहार में कांग्रेस के लिए सुविधा वाले शुभदिन लौटे थे. अब दुविधा वाले दुर्दिन शुरू हो गए हैं.
पार्टी संगठन
यहाँ सत्ता में इसकी भागीदारी के बीस महीने गुज़र गए, लेकिन उस दौरान भी पार्टी संगठन में मज़बूती नहीं लाई जा सकी.
प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष पद पर अनिश्चितता और सांगठनिक अव्यवस्था काफ़ी लम्बे समय से बनी हुई है.
पार्टी के प्रदेश कार्यकर्ताओं की तो छोड़िए, नेताओं को भी यह समझने में मुश्किल होती रही है कि लालू और नीतीश के मामले में शीर्ष नेतृत्व की कोई निश्चित राय है भी या नहीं.
इनकी यह चिंता स्वाभाविक है कि इनके लिए 'महागठबंधन' जैसा सुनहरा मौक़ा अब लौट के नहीं आने वाला.
कांग्रेस विधायक दल
मौजूदा संकट के सिलसिले में कांग्रेस के केंद्रीय नेताओं का बिहार दौरा जारी है. उनका आरोप है कि नीतीश कुमार यहाँ कांग्रेस विधायक दल में तोड़फोड़ की साजिश रच रहे हैं.
हाल ही यह ख़बर मीडिया तक पहुँचाई गयी कि नीतीश समर्थक चौदह कांग्रेसी विधायक इस मुहिम के साथ आ गये हैं. बस चार की कमी है.
वैसे, मुझे नहीं लगता कि बीजेपी के साथ गठबंधन वाली नीतीश सरकार कांग्रेसी आगंतुकों का बेरोकटोक स्वागत कर सकेगी.
ख़ासकर तब और भी नहीं, जब दल बदल कर आने वाले, अपने साथ शर्तें ले कर आएँगे.
फिर भी, कांग्रेस के सामने यह मसला एक संकट बन कर और इस क़दर तन कर खड़ा है कि छिपाये छिप नहीं पा रहा.
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