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नज़रियाः बिहार की सियासत में किसने दी लालू को संजीवनी
- Author, मणिकांत ठाकुर
- पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए
राज्य के सत्ता-शीर्ष पर रह चुके लालू परिवार को जब परिस्थितियों ने गुमनामी के गर्त में ढकेलना शुरू कर दिया था, तब सहारा कहाँ से मिला?
किस 'दुश्मन' के साथ दोस्ती करके लालू यादव के सियासी सितारे फिर चमक उठे?
लालू परिवार का सबसे छोटा सदस्य कैसे एक ही झटके में राज्य का उपमुख्यमंत्री बन बैठा?
ऐसे और भी कई सवाल हैं जिनके जवाब बिहार में लालू प्रसाद की खोई हुई सियासी ज़मीन वापस दिलाने के क़िस्से बयान करते हैं.
इन दिनों लालू-पुत्र तेजस्वी यादव के कथित राजनीतिक उदय पर अपने सिर के बाल नोचने वालों को पता है कि ऐसा मौक़ा आया कैसे.
जेडीयू से रिश्ता नहीं जुड़ता तो क्या होता?
नीतीश सरकार में बतौर उपमुख्यमंत्री 20 महीनों तक सरकार चलाने के तौर तरीक़े देखते-समझते रहे तेजस्वी यादव काफ़ी कुछ सीख चुके हैं.
अब तो रियासती एसेम्बली में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को खरी-खोटी सुना देने में भी उन्हें कोई हिचक नहीं होती. भाषा और तेवर में तब से ज़्यादा तल्ख़ी दिखने लगी है जब से सत्ता छिन गई और विरोधी दल का नेता पद मिला.
अब ज़रा इन सवालों पर भी ग़ौर करिए.
बिहार में जनता दल यूनाइटेड (जेडीयू) का रिश्ता भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) से टूट कर राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) से नहीं जुड़ा होता तो यहाँ की सियासी तस्वीर कैसी होती?
क्या लालू प्रसाद अपने दोनों पुत्रों में से एक को मंत्री और दूसरे को उपमुख्यमंत्री बनवाकर वर्षों बाद परिवार समेत सत्तासुख फिर से हासिल कर पाते?
नीतीश ने लालू की मुराद पूरी की?
तब क्या तेजस्वी और तेजप्रताप इतनी कम उम्र में हँसते-खेलते 'माननीय मंत्रीजी' बने होते?
ज़ाहिर है कि तब, न होता महागठबंधन और न होती उसकी सरकार, लेकिन यह सब इसलिए संभव हुआ क्योंकि ख़ुद मुख्यमंत्री बने रहने की चाहत में नीतीश कुमार ने लालू यादव की मनचाही मुराद पूरी होने दी.
तब लालू परिवार नीतीश कुमार का इतना शुक्रगुज़ार था कि उनके ख़िलाफ़ कुछ भी सुनना उसे क़तई गँवारा नहीं था.
फिर चाहे नीयत बदली हो या हालात बदले हों, लालू और नीतीश दोनों के इरादे बदल गए. बीच में कूद पड़ी बीजेपी और लगभग मर चुका पुराना स्वार्थी समीकरण फिर से ज़िंदा हो उठा.
नतीजतन लालू परिवार सत्ता के मामले में भले ही हाशिये पर जा लगा, लेकिन इस बार सियासत के मामले में उसे तेजस्वी समर्थक बिरादरी जैसा बल मिल गया.
तेजस्वी ने ले ली लालू की जगह?
पटना में आरजेडी की हालिया रैली के कई सियासी पहलू उभर कर सामने आये हैं.
इनमें सबसे ग़ौरतलब है लालू यादव के उत्तराधिकारी के रूप में उनके पुत्र तेजस्वी यादव को इस रैली से मिली मान्यता.
गाँधी मैदान में लालू समर्थकों की उमड़ती भीड़ का अधिकांश, यानी यादव समाज, तेजस्वी को अपना नेता मान लेने जैसा उद्घोष बार-बार कर रहा था.
अपनी इसी चाहत को पूरी करने में पिछले कई वर्षों से जी-जान लगाए हुए थे लालू.
नीतीश कुमार द्वारा आरजेडी को सत्ता से बाहर किए जाने के बाद तेजस्वी ने यादव-मुस्लिम-दलित समाज की सहानुभूति बटोरने के लिए मुहिम छेड़ी. रैली की सफलता में इसका भी योगदान दिखा.
बेनामी संपत्ति संबंधी हज़ारों करोड़ रुपये के घोटाले वाले आरोप जातीय राजनीति की तूफ़ानी रैली में हवा हो गए.
...तो आखिर घाटे में कौन रहा?
'भाजपा भगाओ, देश बचाओ' का नारा दे कर बुलाई गई इस रैली पर 'नीतीश भगाओ, तेजस्वी बुलाओ' का आह्वान हावी हो गया.
भ्रष्टाचार के नए-पुराने मामलों में उलझने और सत्ता से बेदख़ल किए जाने संबंधी तमाम मुश्किलों से घिरे लालू परिवार को यह रैली ताक़त दे गई.
बिहार की सियासत में आरजेडी अध्यक्ष लालू यादव की बनती-बिगड़ती हैसियत पिछले 25 वर्षों से चर्चा में रही है.
चारा घोटाले में सज़ायाफ़्ता लालू प्रसाद अपने जातीय जनाधार के बूते परिवारवाद के आरोप को धता बताते रहे हैं.
इनकी कृपा से शुरुआती दौर में ही इनके दो साले सांसद/विधायक बने और इनकी पत्नी मुख्यमंत्री बनीं.
इसी क्रम में लगभग दो साल पहले लालू प्रसाद अपने दो बेटों में से एक को मंत्री और दूसरे को उपमुख्यमंत्री बनवा लेने में कामयाब हो गए. साथ ही बड़ी बेटी को सांसद बना दिया.
अब इस पूरे प्रकरण पर नज़र डालिए और सोचिये कि घाटे में कौन रहा! लालू परिवार, नीतीश कुमार या बिहार?
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