एक भाषण से बीजेपी में उभरी थीं निर्मला सीतारमण

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- Author, शेखर अय्यर
- पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिंदी के लिए
नरेंद्र मोदी सरकार में हुए बड़े फ़ेरबदल में निर्मला सीतारमण को रक्षा मंत्री बनाया गया है. इससे पहले वह वाणिज्य राज्यमंत्री के रूप में स्वतंत्र प्रभार संभाल रही थीं.
निर्मला इंदिरा गांधी के बाद देश की दूसरी महिला रक्षा मंत्री हैं. जानते हैं, उन्होंने कहां से शुरुआत की थी और कैसे वह इस ओहदे तक पहुंचीं:-
जेएनयू में फ़्री थिंकर थीं निर्मला
जब निर्मला सीतारमण जेएनयू में पढ़ती थीं, तब वह फ्री थिंकर ग्रुप के साथ थीं और काफ़ी सक्रिय थीं. उस समय फ्री थिंकर हुआ करते थे जो न वामपंथियों के साथ होते थे और कांग्रेस के संगठन के साथ.
जेएनयू में पढ़ाई करने बाद वह आगे की पढ़ाई के लिए लंदन गई थीं. वापस आईं तो हैदराबाद में बीजेपी के थिंक टैंक में शामिल हुईं. जब अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री थे, वह राष्ट्रीय महिला आयोग की सदस्य बनीं.

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भाषण से खींचा बीजेपी का ध्यान
उन्होंने उस वक्त महिलाओं को लेकर काम किया. उस वक्त उनका काम आरएसएस की नज़र में भी आ चुका था. 2008 में इनका बीजेपी में प्रवेश हुआ, जब नेशनल एग्ज़िक्यूटिव में इन्हें बुलाया गया था और इन्होंने भाषण दिया था. उनके भाषण का विषय सुरक्षा और आर्थिक मामलों पर था. तब वरिष्ठ नेताओं का ध्यान इनपर गया.
जब राजनाथ अध्यक्ष बने, उन्हें फिर नेशनल एग्ज़िक्यूटिव में फिर भाषण देने का मौका मिला. उस समय अरुण जेटली मंच पर थे. उन्होंने राजनाथ सिंह से कहा कि भाषण सुनिए, इनमें बहुत संभावनाएं हैं.
नितिन गडकरी जब अध्यक्ष बने तब उन्हें प्रवक्ता बनाया गया. खास बात यह है कि निर्मला तमिलनाडु से हैं मगर आंध्र से भी इनका रिश्ता रहा है. वह गैर-हिंदी भाषी क्षेत्र से थीं और हिंदी में बोलने में उन्हें कठिनाई होती थी. मगर पार्टी में तय हुआ कि यह हिंदी ठीक न भी बोलें, वह प्रभावी रहती हैं. इनकी इंग्लिश में भी ताज़ापन था.

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रिसर्च में रुचि से हुआ फ़ायदा
दूसरी ख़ासियत यह है कि निर्मला न सिर्फ अच्छी पढ़ी-लिखी हैं बल्कि लगातार पढ़ती रहती हैं. राजनेताओं को इसके लिए भले समय न मिलता वह मगर पार्टी के लिए विभिन्न मामलों पर रिसर्च करती रहीं. पॉलिसी के मामले में भी पार्टी ने इन्हें रिसर्च करने के लिए कहा. इस तरह धीरे-धीरे इनके काम ने शीर्ष नेतृत्व को प्रभावित किया.
पार्टी के सम्मेलनों में जब इन्होंने भाषण से प्रभावित किया, तब गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने इन्हें अपने राज्य में बुलाया. वहां उन्होंने महिला समूहों, खासकर स्वंय सहायता समूहों में बीजेपी के लिए प्रचार किया. मोदी भी इनके काम से प्रभावित हुए. पिछले गुजरात चुनाव में भी निर्मला वहां सक्रिय रही थीं, जबकि न तो गुजराती उन्हें आती थी न हिंदी अच्छे से आती थी.
खास बात यह है कि आज जब दक्षिण भारत में हिंदी को लेकर विवाद चल रहा है, उस समय में वह राजनीतिक हस्ती होकर भी अपनी टूटी-फूटी हिंदी से प्रभावित करती हैं. क्योंकि इनकी बातों और तर्कों में दम होता है.

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2014 में जब इन्हें मंत्रिमंडल में लिया गया, वह मोदी का फ़ैसला था.
ट्रेड के विषय में इन्होंने काम किया है, लंदन की मशहूर कंसल्टेंसी फर्म प्राइस वॉटरहाउस में भी काम किया है. इसीलिए इन्हें कॉमर्स मिनिस्टर बनाया गया. उस नाते उन्होंने डब्ल्यूटीओ के कई कार्यक्रमों और बैठकों में हिस्सा लिया.
इसके अलावा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को जब किसी मुद्दे पर स्टडी या रिसर्च की जरूर होती थी, वह निर्मला को ज़िम्मेदारी देते थे. काम बढ़ा था मगर मेहनत जारी रखी उन्होंने. वह विभिन्न जगहों पर जाकर फीडबैक भी लाती थीं.
जैसा कि जानकारी आ रही है कि पहले प्रधानमंत्री चाहते थे कि गडकरी रक्षा मंत्रालय संभालें. मगर वह इच्छुक नहीं थे. डिफेंस भारी पोर्टफ़ोलियो है, उसे अरुण जेटली को वित्त मंत्रालय के साथ लंबे समय तक नहीं दिया जा सकता.

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तीन बातों का मिला लाभ
दूसरी बात यह है कि प्रधानमंत्री चाहते हैं कि जो पहले नहीं हुआ है, हमें करना है. 2014 में वह रक्षा मंत्री के लिए किसी को तलाश रह थे. तब वह चाह रहे थे कि विदेश मंत्री सुषमा स्वराज हों और रक्षा मंत्री वसुंधरा राजे.
लेकिन वसुंधरा ने चुनाव जीते ही थे तब. वह राजस्थान नहीं छोड़ना चाहती थीं. बीच में ललित मोदी विवाद भी हो गया था तो वह राजस्थान नहीं छोड़ सकीं.
प्रधानमंत्री मोदी के मन में रहा है कि कोई चीज़ इतिहास में होनी चाहिए कि यह काम हमने किया है. इस बात को और निर्मला सीतारमण की मेहनत को ध्यान रखें तो यह मौका प्रधानमंत्री को मुफ़ीद लगा.

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रक्षा मंत्रालय में बड़ा काम हो चुका है. मनोहर पर्रिकर रिफॉर्म शुरू कर दिए थे. वेतन आयोग का मसला भी हल हो गया है. डिफेंस की प्रॉडक्शन पॉलिसी भी अनाउंस हो चुकी है. डिपेंस में बड़ी पॉलिसीज़ के पैमाने तय हो चुके हैं. उन्हें लागू करने के लिए पीएम मोदी को लगा कि निर्मला सीतारमण सही होंगी.
बीजेपी पहली बार महिला रक्षा मंत्री दे रही है, इसका श्रेय लेने की बात हो, मंत्रालय की आज की स्थिति और निर्मला सीतारमण की क्षमता...तीनों को मिलाकर यह उन्हें रक्षा मंत्री बनाने फ़ैसला लिया गया.
(बीबीसी संवाददाता आदर्श राठौर बातचीत पर आधारित)
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