ट्रिपल तलाक़ पर 'बैन' से मुस्लिम महिलाएं अधर में?

    • Author, मोहम्मद शाहिद
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक बेंच ने मंगलवार को तीन तलाक़ पर दिए अपने ऐतिहासिक फ़ैसले में एक बार में तीन तलाक़ अर्थात तलाक़-ए-बिद्दत को असंवैधानिक क़रार दिया है.

पांच सदस्यीय बेंच में से तीन जजों ने इसको असंवैधानिक बताया है यानी कि 3-2 से यह फैसला तीन तलाक़ के ख़िलाफ़ गया है.

'फ़ैसले में उलझाव है'

इस फ़ैसले की रोशनी में आगे तलाक़ कैसे होगा, इस सवाल पर सुप्रीम कोर्ट में ट्रिपल तलाक़ पर एक पक्षकार रही जमीयत उलेमा-ए-हिंद के जनरल सेक्रेटरी और ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के सदस्य महमूद मदनी कहते हैं कि वह भी अंधेरे में हैं.

वह कहते हैं, "इस फ़ैसले में बहुत उलझाव हैं. भारत का संविधान कह रहा है कि एक बार में तीन तलाक़ होता ही नहीं है. अगर कोई मर्द तीन तलाक़ एक साथ दे देता है और औरत मान लेती है कि उसका तलाक़ हो गया है तो वह तो अधर में पड़ गई."

वह आगे कहते हैं कि अगर कोई औरत कोर्ट के फ़ैसले के हिसाब से इस तलाक़ को नहीं मानती है तो बात अलग है. उन्होंने कहा कि इस तरह की कई दिक्कतें हैं और इस फ़ैसले के क्या-क्या पहलू हैं, यह अभी पूरी तरह साफ़ नहीं हो पाएगा.

वहीं, जमीयत उलेमा ए हिंद के सदस्य मौलाना नियाज़ अहमद फ़ारूक़ी ने बीबीसी संवाददाता दिलनवाज़ पाशा को बताया कि यह फ़ैसला औरतों को बीच में फंसाता है.

वह कहते हैं, "सुप्रीम कोर्ट ने कह दिया है कि यह असंवैधानिक है जबकि महिलाएं तलाक़ को मानती होंगी और उनको लगता होगा कि उनका निकाह ख़त्म हो गया है. ऐसे में वह शादी नहीं कर पाएंगी और उन पर केस भी हो सकता है. जैसा और देशों में भी हुआ है."

तो फ़िर तलाक़ कैसे होगा?

तलाक़ के लिए क्या तरीका अपनाया जाएगा. इस पर ट्रिपल तलाक़ मामले में एक पक्ष की वकील रहीं इंदिरा जयसिंह कहती हैं कि मुस्लिम महिलाओं को कोर्ट से तलाक़ पाने का हक़ है, उस कानून को पुरुषों के लिए भी लागू होना चाहिए और एक कानून मुस्लिम पर्सन्स राइट्स ऑफ डिवॉर्स एक्ट बना देना चाहिए.

वहीं, मदनी इसके लिए शादी के शुरुआत में ही एक एग्रीमेंट करने की बात कहते हैं. हालांकि, मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने भी एक मॉडल निकाहनामा बनाया था जिसमें शादी से पहले एक एग्रीमेंट की बात कही गई थी.

लेकिन मदनी कहते हैं कि इस एग्रीमेंट को लेकर जागरुकता भी होनी चाहिए क्योंकि शादी के समय दोनों घरों में खुशी का माहौल होता है जिस समय ऐसे किसी एग्रीमेंट पर चर्चा नहीं होगी.

'औरतों को मिलेगी आज़ादी'

नियाज़ कहते हैं कि सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक बेंच ने न केवल तीन तलाक़ को समाप्त किया है बल्कि उसे असंवैधानिक क़रार दिया है और इसे मौलिक अधिकारों के ख़िलाफ़ भी बताया है.

वह आगे कहते हैं, "औरतें अगर मानकर बैठी हैं कि तीन बार तलाक़ कहने से उनका तलाक़ हो गया है तो इस वजह से आगे औरतों को और दिक्कतें होने वाली हैं. हम तीन तलाक़ का सपोर्ट नहीं करते हैं और न ही इस्लाम इसकी वक़ालत करता है. लेकिन औरतों की आज़ादी का मसला क्लियर होना चाहिए."

नियाज़ कहते हैं कि इससे औरतों की आज़ादी पर तो रोक लग जाएगी लेकिन पुरुष वैसे ही रहेंगे क्योंकि उनके बहुविवाह पर कोई प्रतिबंध नहीं है.

इंदिरा इसे अलहदा कहती हैं और मुस्लिम महिलाओं के लिए एक आज़ादी बताती हैं. वह कहती हैं कि इस फ़ैसले के बाद उस हर महिला का तलाक़ रद्द हो गया है जिन्हें ट्रिपल तलाक़ दिया गया था.

वह कहती हैं कि मुस्लिम विमंस प्रॉटेक्शन ऑफ राइट्स ऑन डिवॉर्स एक्ट, 1986 के तहत महिलाएं कोर्ट जा सकती हैं और अपना मुआवज़ा पा सकती हैं लेकिन सबसे अच्छा तभी होगा जब मुस्लिम महिला और पुरुषों के लिए एक ही तलाक़ का कानून बने जो दोनों पर लागू हो.

मदनी कहते हैं कि सुप्रीम कोर्ट को इस मामले में दख़ल नहीं देना चाहिए था. वह कहते हैं कि ख़ुद आगे आकर उलेमाओं को एक ऐसा सिस्टम लाना चाहिए जिसे सभी मुसलमान मिलकर स्वीकार करें.

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