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तीन तलाक़ के फ़ैसले पर क्या है पाकिस्तानियों का कहना?
भारतीय सुप्रीम कोर्ट की पांच सदस्यीय बेंच ने फ़ैसला सुनाते हुए मुसलमानों में शादी ख़त्म करने की एक साथ तीन तलाक़ की प्रथा को असंवैधानिक क़रार दिया है.
कोर्ट ने तीन तलाक़ (इंस्टेंट) पर फिलहाल छह महीने के लिए रोक लगा दी है और केंद्र सरकार से इस पर संसद में क़ानून लाने के लिए कहा है.
सुप्रीम कोर्ट के इस फ़ैसले पर भारत में मिली-जुली प्रतिक्रियाएं हैं. लेकिन एक बड़ा वर्ग इसे महिलाओं के हित में बता रहा है.
आपको बता दें कि पाकिस्तान और सऊदी अरब जैसे इस्लामी देशों में तीन तलाक़ पर पाबंदी है. ज़बानी तीन तलाक़ का चलन दुनिया में भारतीय मुसलमानों के बीच ही है और वो भी हनफ़ी विचारधारा को मानने वालों के बीच.
भारत में जहां इसे महिलाओं की आज़ादी से जोड़कर देखा जा रहा है वहीं पाकिस्तान में भी इसे लेकर काफ़ी हलचल है. बीबीसी उर्दू के फ़ेसबुक पेज पर बहुत से लोगों ने अपनी प्रतिक्रिया दी है.
इस्लामाबाद में रहने वाली सबूही ज़ैदी का कहना है कि जब इंसान गुस्से में होता है तो उसे अंदाज़ा भी नहीं होता है कि वो क्या कह रहा है और क्या कर रहा है.
हालांकि सरगोधा में रहने वाले उस्मान अहमद का कहना है कि मुस्लिमों को किन नियम-कानून का पालन करना है, वह क़ुरान में लिखा हुआ है. किसी भी दूसरे यह बताने की ज़रूरत नहीं है कि क्या सही है और क्या ग़लत.
नदीम रहमान ने सुप्रीम कोर्ट के इस फ़ैसले का स्वागत किया है. वहीं नासिर शेख़ कहते हैं कि एक वक्त में तीन तलाक़ इस्लामिक लॉ नहीं है.
उस्मान जफ़र ने भी भारतीय सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले को सही बताया है. वो लिखते हैं कि वैसे भी इस्लाम में एक साथ तीन तलाक़ का कॉन्सेप्ट है ही नहीं. देर आए दुरुस्त आए.
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