नज़रिया: मोदी कश्मीर मामले में वाजपेयी के रास्ते पर चलेंगे?

    • Author, शुजात बुखारी
    • पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मंगलवार को 71वें स्वतंत्रता दिवस पर लाल किले की प्राचीर से देश को संबोधित करते हुए कश्मीर मुद्दे का ज़िक्र किया और कहा कि कश्मीर समस्या न गाली और न गोली से बल्कि गले लगाने से सुलझेगी.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जो कहा उसका स्वागत तो करना चाहिए. लोगों को गले लगाने से मसला हल होगा ये अच्छी बात है और नई बात है. लेकिन साथ-साथ यह देखने की ज़रूरत है कि प्रधानमंत्री अपनी बात पर कितना अमल करेंगे.

पिछले तीन सालों में जब से प्रधानमंत्री मोदी भारत की सत्ता पर काबिज़ हुए हैं, तब से उन्होंने कहा है कि वह पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के रोडमैप 'कश्मीरियत, जम्हूरियत और इंसानियत' पर चलने की कोशिश करेंगे.

कश्मीर की गुत्थी

मगर तीन साल में मोदी वाजपेयी के बताए इस रोडमैप पर आगे बढ़ते हुए नहीं दिखते हैं. कश्मीर की गुत्थी का मसला राजनीतिक तरीके से ही हल किया जा सकता है, न कि सैन्य तरीके से.

मोदी ने अलगाववादियों के ख़िलाफ़ भी अपने भाषण में बोला, लेकिन अलगाववादियों के ख़िलाफ़ पहले भी बोला जाता रहा है.

कश्मीर के नेतृत्व की भी ग़लतियां रही हैं, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि आप कश्मीर के सारे नेतृत्व को अवैध घोषित करने की कोशिश करें.

कश्मीर के हालात पर बयानों से ज़्यादा फर्क़ नहीं पड़ा है. ज़्यादातर कश्मीरी राजनीतिक रूप से इस समस्या का हल चाहते हैं. इसमें कोई शक नहीं है कि हुर्रियत कॉन्फ़्रेंस उनका प्रतिनिधित्व करती है और उनको खारिज नहीं कर सकते हैं.

अलगाववादियों पर कार्रवाई कोई पहली बार नहीं

एनआईए की छापेमारी और अलगाववादियों के ख़िलाफ़ कार्रवाई को देखा जाए तो वह क़ानून का एक हिस्सा है. ऐसा पहली बार नहीं हुआ है कि प्रवर्तन निदेशालय या दूसरी एजेंसियों ने अलगाववादियों पर ऐसी कार्रवाई की है. ऐसे सिलसिले पहले से जारी हैं.

मगर इस किस्म की जो कार्रवाइयां हो रही हैं, उससे ये संदेश नहीं जाने देना चाहिए कि सरकार जान-बूझकर कश्मीरी नेतृत्व को अवैध घोषित करने की कोशश कर रही है.

वहीं, अनुच्छेद 35ए को लेकर काफ़ी चर्चाएं हैं, लेकिन प्रधानमंत्री के भाषण में कहीं भी इसका ज़िक्र नहीं था. हालांकि केंद्र सरकार ने इस पर अभी तक कुछ साफ़-साफ़ स्टैंड नहीं लिया है जबकि उन्हें इस पर अपना रुख़ स्पष्ट करना चाहिए क्योंकि केंद्र में मौजूद बीजेपी की गठबंधन सरकार जम्मू और कश्मीर में भी चल रही है.

कश्मीर में केंद्र के ख़िलाफ़ बनता माहौल

बीजेपी एक ऐसी पार्टी के साथ सरकार चला रही है जो कश्मीरियों के लिए प्रतिबद्ध है. उस एतबार से देखा जाए तो केंद्र सरकार को राज्य सरकार की तरह न्यायालय में इसका बचाव करना चाहिए था, लेकिन ऐसा नहीं किया गया.

इसके कारण कश्मीर में ऐसा माहौल बन रहा है कि केंद्र यहां की स्वायत्तता को ख़त्म करना चाह रही है.

आज की तारीख़ में इस बात पर ध्यान देने की ज़रूरत है कि जम्मू-कश्मीर का भारत में विलय एक ख़ास स्थिति में और बाकी रियासतों से इतर एक ख़ास समझौते के तहत हुआ था.

(बीबीसी संवाददाता मोहम्मद शाहिद से बातचीत पर आधारित)

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