You’re viewing a text-only version of this website that uses less data. View the main version of the website including all images and videos.
ब्लॉग: ‘नरेंद्र मोदी भूलने नहीं देते कि वो दरअसल कौन हैं'
- Author, राजेश जोशी
- पदनाम, रेडियो एडिटर, बीबीसी हिंदी
पिछले दो दिन से हामिद अंसारी के चाहने वालों ने व्हाट्सऐप को भर दिया है. लोग अपना पावन कर्तव्य समझ कर अपने-अपने तरीक़े से उप राष्ट्रपति हामिद अंसारी को देशभक्ति का अर्थ सिखा रहे हैं. उनसे सवाल किया जा रहा है कि तुम इतने नाशुक्रा इंसान कैसे हो सकते हो:
"ओ हामिद अंसारी बोलो, ये जुमला क्या बोल गए
जाते जाते सद्भावों में ज़हर बता क्यों घोल गए?"
उप-राष्ट्रपति पद छोड़ते हुए हामिद अंसारी ने कहा कि देश में अल्पसंख्यकों में असुरक्षा की भावना फैल रही है. इस पर अगर किसी को मौलिक विचार या मौलिक सवाल नहीं सूझ रहा है तो वो दूसरे ग्रुपों से बीन-बीन कर विचार मणियां अपने मित्रों, रिश्तेदारों, स्कूल-कॉलेज के दोस्तों को भेज रहा है.
एक मैसेज आया, "हामिद साहब - कांग्रेस का आपने जो नमक खाया था उसका हक़ तो अदा कर दिया… काश आपने जो देश का नमक खाया है उसका भी हक़ अदा करें."
पांच मिनट बाद एक और ज्ञानमणि आकर गिरी, "तसलीमा नसरीन तारिक फ़तह, अदनान सामी दूसरे देश से आकर भारत में चैन से रह रहे हैं और हामिद अंसारी को डर लगता है."
आरएसएस के वरिष्ठ नेता इंद्रेश कुमार ने तो हामिद अंसारी को सलाह दे दी कि उन्हें भारत में तकलीफ़ में रहने की बजाय किसी ऐसे मुल्क में चले जाना चाहिए जहां वह ज़्यादा सुरक्षित महसूस करते हों.
सोशल मीडिया के योद्धा
एक कवि ने ये फ़ैसला सुनाया:
"उपराष्ट्रपति बनाए गए थे लाचारी में
अंतर नहीं समझे देशभक्ति और ग़द्दारी में
कांच और हीरे को एक सा समझने वालों
बहुत फ़र्क़ होता है कलाम और अंसारी में."
हामिद अंसारी ने रिटायरमेंट से पहले मीडिया को दिए इंटरव्यू में कहा कि देश के मुसलमानों में बेचैनी और असुरक्षा का भाव आ गया है. ये एक ऐसा वाक्य था जिसने सोशल मीडिया योद्धाओं को इतनी बुरी तरह व्यथित कर दिया कि वो अपने अपने नेज़े-फरसे लेकर सोशल मीडिया पर उतर आए.
हामिद अंसारी का बयान सोशल मीडिया योद्धाओं को ही नहीं, ऐसा लगता है प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भी बहुत पसंद नहीं आया. राज्यसभा में विदाई भाषण के दौरान प्रधानमंत्री मोदी ने लगभग साफ़ शब्दों में कह दिया कि उनकी नज़र में हामिद अंसारी की ज़िंदगी का पूरा अनुभव "एक ख़ास दायरे" में सिमटा रहा.
मोदी का तंज
मोदी ने कहा, "बतौर राजनयिक आपने पश्चिम एशियाई देशों में एक लंबा समय बिताया और उसी दायरे में ज़िंदगी के बहुत वर्ष आपके गए. उसी माहौल में, उसी सोच में, उसी डिबेट में, ऐसे लोगों के बीच में रहे. वहां से रिटायर होने के बाद ज़्यादातर काम वहीं रहा आपका. माइनॉरिटी कमीशन हो या अलीगढ़ यूनिवर्सिटी हो, दायरा आपका वही रहा."
क्या था ये दायरा? क्या थी ये सोच और डिबेट? और "ऐसे लोगों के बीच रहे" यानी कैसे लोगों के बीच? और फिर माइनॉरिटी कमीशन, अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी.
"दायरा आपका वही रहा" यानी सिर्फ़ मुसलमान और इस्लामी माहौल में रहे आदमी ने अगर पिछले दस बरस से उप-राष्ट्रपति के तौर पर संविधान के तहत काम किया तो उनके अंदर "छटपटाहट" रही होगी. प्रधानमंत्री मोदी ने हलके फ़ुलके अंदाज़ में ही सही मगर अपनी बात कह डाली.
उन्होंने कहा, "पिछले दस वर्षों में ये संविधान संबंधित काम आपके ज़िम्मे आया और आपने उसे बख़ूबी निभाया. हो सकता है शायद कोई छटपटाहट रही होगी भीतर आपके अंदर भी, लेकिन आज के बाद शायद वो संकट आपको नहीं रहेगा. मुक्ति का आनंद भी रहेगा और अपनी मूलभूत प्रवृत्ति के अनुसार कार्य करने का, सोचने का और बात बताने का अवसर भी मिलेगा."
मोदी की राजनीति
नरेंद्र मोदी ने ये स्पष्ट नहीं किया कि उनकी नज़र में हामिद अंसारी की "मूलभूत प्रवृत्ति" क्या है. मगर मोदी के पहले वाक्य की रोशनी में अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि ये मूलभूत प्रवृत्ति मुसलमानों और अल्पसंख्यकों की चिंता के सिवाय और क्या हो सकती है.
एक राजनेता के तौर पर मोदी में कई विशेषताएं हैं मगर उनकी सबसे बड़ी ख़ासियत शायद ये है कि वो आपको कभी भूलने नहीं देते कि दरअसल में वो कौन हैं. गुजरात दंगों के बाद भयंकर आलोचना, कोर्ट केस, सांप्रदायिक दंगों में पीड़ित मुसलमानों को नज़रअंदाज़ करने के आरोपों और मीडिया ट्रायल के बावजूद उन्होंने ख़ुद को बार-बार नए कलेवर में पेश करना बंद नहीं किया.
अभिधा, लक्षणा और व्यंजना का बख़ूबी इस्तेमाल करके "हम दो हमारे पांच", "सड़क पर पंचर लगाने वालों" के बारे में चिंता जताने से लेकर एक सांस में "जेम्स माइकल लिंगदोह", "अहमद मियां पटेल" और "मियां मुशर्रफ़" को चुनौती देना, खुले मंच पर एक मुसलमान से टोपी लेकर पहनने से साफ़ इंकार कर देना मोदी की राजनीति का अहम हिस्सा रहा है.
साथ ही विकास का गुजरात मॉडल खड़ा करके पुराने तमाम दाग़ धब्बे मिटाने की कोशिश की, एक के बाद एक चुनाव जीतते रहे, प्रधानमंत्री बनने के बाद अंतरराष्ट्रीय मंच पर अपनी धाक जमाई, बराक ओबामा से लेकर डोनल्ड ट्रंप तक सभी को साधा, नोटबंदी जैसे कड़े फ़ैसले लिए और उस पर अडिग रहे. पर जब गौरक्षक इस क़दर बेक़ाबू होने लगे कि मोदी की अंतरराष्ट्रीय छवि को बट्टा लग जाए तो उन्हें अपराधियों का गिरोह तक कह दिया.
देशभक्ति का पाठ
हामिद अंसारी ने जो कहा लगभग वैसी ही बात पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने भी एक से ज़्यादा बार कही. उन्होंने देश में बढ़ती असहिष्णुता की बात कही, बहुलतावादी समाज के महत्व को बार-बार रेखांकित किया. दादरी के अख़लाक़ को जब पीट-पीटकर मार डाला तो राष्ट्रपति ने उस पर अपनी असहमति जताई.
पर तब व्हाट्सऐप पर मुझे उन्हें देशभक्ति का पाठ सिखाने वाले कोई संदेश नहीं मिले. जब उन्होंने अपना कार्यकाल समाप्त किया तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उनकी तारीफ़ करते हुए कहा कि प्रणब दा ने उन्हें पिता जैसा स्नेह दिया और व्यक्तिगत रूप से मेरा ख़्याल रखा.
ग़ौर से देखें तो प्रणब मुखर्जी और हामिद अंसारी ने बहुत अलग-अलग बातें नहीं कहीं थीं. दोनों ने देश में घट रही घटनाओं पर अपनी-अपनी तरह से चिंता और असहमति जताई.
पर दोनों की बातों पर प्रधानमंत्री से लेकर सोशल मीडिया योद्धाओं की प्रतिक्रिया इतनी अलग अलग क्यों?
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)