नीतीश देश का नेतृत्व कर सकते थे लेकिन...

बुधवार को बिहार के मुख्यमंत्री पद से इस्तीफ़ा दे चुके नीतीश कुमार गुरुवार सुबह 10 बजे प्रदेश के नए मुख्यमंत्री बन गए.

इन महज़ कुछ घंटों में नीतीश ने आरजेडी-कांग्रेस-जदयू गठबंधन से नाता तोड़ा और अपने पूर्व साथी भाजपा से हाथ मिलाकर राज्यपाल से मुलाकात कर सरकार बनाने का दावा पेश कर दिया.

इसके साथ ही तेजस्वी यादव की डिप्टी-सीएम की कुर्सी पर बीजेपी के सुशील कुमार यादव विराजमान हुए.

जदयू में नीतीश के कई साथी उनके साथ रहे, लेकिन कइयों ने उनका साथ न देने का फ़ैसला किया.

जदयू सांसद अली अनवर अंसारी ने उनका विरोध किया और कहा कि मेरा ज़मीर मुझे भाजपा से हाथ मिलाने की इजाज़त नहीं देता.

नीतीश के इस्तीफ़े और बिहार की राजनीति पर अली अनवर अंसारी से बात की बीबीसी संवाददाता सलमान रावी ने.

ये बिहार का ही मसला नहीं है, मैं मानता हूं कि ये पूरे मुल्क के लिए राष्ट्रीय दुर्घटना की तरह है. पूरे देश के लोग नीतीश की तरफ हसरत भरी नज़र से देख रहे थे.

देश के भीतर बेचैनी है, खौफ़ का माहौल है, फ़िरकापरस्ती का उफान है. नीतीश की क्षमता थी कि वो बिहार में आगे बढ़कर मुल्क को इन हालात से निकालने की अगुआई कर सकते थे, बदकिस्मती से ऐसा नहीं हो सका.

बीते विधानसभा चुनावों में उन्होंने इन शक्तियों को हराया था.

जब मैं 2006 में राज्यसभा का सदस्य बना था, यह स्थिति थी कि बीजेपी का नेतृत्व मोदी का नेतृत्व नहीं था.

जब गोधरा, गुजरात से निकल कर मोदी नेतृत्व में आए थे तब नीतीश ने पार्टी के लोगों से कहा था कि ये लोग बहुत संकीर्ण मानसिकता के लोग हैं. उन्होंने कहा था कि इनके नेतृत्व में देश में उत्तेजना फैलेगी इसलिए ये स्वीकार्य नहीं है. हम लोगों ने वो गठबंधन उसी आधार पर तोड़ दिया था.

कहा जाता है गठबंधन सुविधा की राजनीति है जहां ज़रूरत के अनुसार गठजोड़ बनाए जाते हैं, ना तो कोई परमनेंट दोस्त होता है ना ही परमनेंट दुश्मन. तो एक गठबंधन के टूटकर दूसरा बनने से क्या फर्क पड़ता है?

ये उसूल की बात है, एक लक्ष्मण रेखा होती है.

नीतीश कुमार ने अपनी अंतरात्मा की आवाज़ सुनी, मुझे भी लगा कि मेरा ज़मीर गवारा नहीं करता कि मैं उनके इस कदम का समर्थन करूं.

लेकिन क्या वाकई जैसा कि नीतीश ने कहा प्रदेश में माहौल ख़राब हो गया था और आरजेडी के रुख़ के कारण नीतीश को बतौर मुख्यमंत्री सरकार चलाने में दिक्कत हो रही थी?

नीतीश जैसा कह रहे हैं ये वजह हो सकती है. लेकिन इसके लिए कोई ज़रूरी नहीं था कि वो बीजेपी के साथ जाएं.

दुनिया में बहुत सारे ऐसे लोग हैं जो सत्ता में नहीं हैं लेकिन वो कई तरह की बुरी शक्तियों या कहें बुराइयों के ख़िलाफ़ लड़ते रहते हैं. उस तरीके से भी लड़ा जा सकता था.

भ्रष्टाचार और सांप्रदयिक ताकतों के ख़िलाफ़ एक साथ लड़ाई हो सकती थी.

नीतीश कुमार जैसी शख़्सियत इसके लिए खड़ी होती तो पार्टी राजनीति से हट कर देश के कई नेता नीतीश का समर्थन करते. वो पहले से ही उन्हें खुलेआम अपना समर्थन दे भी रहे थे और वो नीतीश के साथ आ जाते.

अली अनवर ने साफ़ तौर पर ये तो नहीं कहा कि नीतीश ने इस कदम से राष्ट्रीय नेता बनने मौक़ा अब गंवा दिया है, लेकिन उन्होंने माना कि ये दुर्घटना है और दुर्घटना हुई तो उससे कई चीज़ों का नुक़सान तो होता ही है.

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