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नज़रिया: 'ऐसे भिड़ेंगे कि बिहार में बहार की बात हवा हो जाएगी'
- Author, मणिकांत ठाकुर
- पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार
बिहार की सत्ता में जो फेरबदल की सनसनी बुधवार शाम शुरू हुई, वह रात भर जारी रही. लगा कि सारा कुछ पूर्व नियोजित था.
आनन-फानन इस्तीफ़ा और शपथ ग्रहण की पटकथा का मंचन हो गया.
यह भी पता चला कि इस पूरे प्रकरण की सूत्रधार भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) ही थी. भले ही नीतीश कुमार इसके मुख्य किरदार नज़र आते रहे.
देखते ही देखते कांग्रेस समेत लालू यादव की राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) सरकार से बाहर हो गई और बीजेपी अंदर आ गई.
'विश्वसनीयता की ऐसी-तैसी'
जनता दल यूनाइटेड (जेडीयू) के मुखिया फिर से मुख्यमंत्री पद पर बरक़रार रह गए. यह सियासत भी ग़ज़ब का खेल है!
जिसे गले से लगाया, उसे चुटकी में चलता कर दिया. विश्वसनीयता की ऐसी-तैसी हो, तो हो जाए.
लालू-नीतीश की सत्तावादी सियासत बीस महीने में ही चल बसी. अटूट महागठबंधन की रट लगाने वाले घटक एक झटके में टूट-फूट के पात्र बन गये.
ज़ाहिर है कि नीतीश कुमार ने यहां लालू परिवार को सत्ता से बेदखल करने में बेनामी सम्पत्ति संबंधी मामले को हथियार बनाया.
उन्हें लगा कि अब लालू के साथ लगे रहने से उनकी भ्रष्टाचार विरोधी प्रचारित छवि नहीं बचेगी. इसलिए तय कर लिया कि फिर से बीजेपी के सहारे सत्ता में बने रहने का यही अच्छा मौक़ा है.
चौबे ने छब्बे बनने की महत्वाकांक्षा फ़िलहाल छोड़ दी, क्योंकि दूबे बन जाने की आशंका होने लगी थी.
'संघ मुक्त' भारत के वादे का क्या?
नीतीश समय आने पर फिर पलटी मार लेंगे. क्या फ़र्क़ पड़ता है?
वो तो सार्वजनिक सभा में हाथ उठा कर प्रतिज्ञा कर चुके थे कि मिट्टी में मिल जाएंगे लेकिन बीजेपी से फिर कभी हाथ नहीं मिलाएंगे. वादा किया था कि 'संघ मुक्त' भारत बना कर दम लेंगे.
वही आज कह रहे हैं कि पुरानी दोस्त बीजेपी के बूते ही बिहार में बहार ला सकेंगे.
वैसे, सोच कर देखें तो इस बात में दम है. केंद्र चाहे तो इस उपेक्षाग्रस्त राज्य के हालात बदल सकते हैं. लालू परिवार की छवि से चिढ़ते आ रहे अधिकांश लोगों का यही ख़याल है.
लेकिन फिर वही बात. लुभावने जुमलों से लोगों को ठगने के सबूत भी तो सामने आते ही रहे हैं.
अब 'लालू मुक्त बिहार' के नारे लगाने वाले और 'मौक़ापरस्त नीतीश' के आरोप उछालने वाले एक-दूसरे के ख़िलाफ़ ऐसे भिड़ेंगे कि बिहार में बहार की बात हवा हो जाएगी.
याद रहे कि लालू वो नाम है, जो मुश्किलों में फंसने और फिर उनसे उबरने की मिसाल क़ायम कर चुका है.
अब लालू का क्या होगा?
लालू का जेलों में या सत्ता में आने-जाने का सिलसिला कब थमेगा, कहा नहीं जा सकता.
हालांकि हस्तिनापुर में जड़ जमा चुकी सियासी जमात इस बार बिहार में अपने विरोधियों की उखाड़-पछाड़ में पूरी ताक़त लगाती हुई दिख रही है.
सुशील कुमार मोदी की मेहनत काम आई. उन्हें उपमुख्यमंत्री का खोया दर्जा मिल गया.
अब यह बात किसी से छिपी नहीं रही कि लालू परिवार की बेनामी संपत्ति पर हमले के हथियार उन्हें किसने थमाए.
अब लगता यही है कि लालू प्रसाद आगामी चुनाव में नीतीश-मोदी गठबंधन से बदला लेने में जुटेंगे और केंद्र सरकार लालू परिवार को क़ानून की गिरफ़्त में ही तोड़ देने जैसे हालात पैदा करने में लगी रहेगी.
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