You’re viewing a text-only version of this website that uses less data. View the main version of the website including all images and videos.
क्या तिब्बत पर भारत ने बड़ी भूल की थी?
- Author, रजनीश कुमार
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
ऐसे वक्त में जब सीमा पर भारत और चीन के बीच भारी तनाव है तो देश के भीतर चीन के साथ भारत की नीतियों पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं.
बुधवार को लोकसभा में मुलायम सिंह ने कहा कि भारत ने तिब्बत को चीन का हिस्सा मानकर बड़ी भूल की थी.
मुलायम सिंह ने यहां तक कह दिया कि चीन ने भारत पर हमले की तैयारी कर ली है. क्या भारत ने तिब्बत को चीन का हिस्सा मानकर वाकई भूल की थी?
आरसएस की पत्रिका ऑर्गेनाइजर के पूर्व संपादक शेषाद्री चारी भी मुलायम सिंह की बातों से सहमत हैं कि भारत ने तिब्बत को चीन का हिस्सा मानकर बड़ी भूल की थी. उन्होंने कहा कि पहली बार 2003 में अटल बिहारी वाजपेयी सरकार ने तिब्बत को चीन का हिस्सा माना और चीन ने सिक्किम को भारत का हिस्सा.
तिब्बत पर भारत का स्टैंड
हालांकि शेषाद्री चारी कहते हैं कि यह भारत का दूरदर्शी भरा क़दम नहीं था. प्रधानमंत्री बनने से पहले वाजपेयी तिब्बत को स्वतंत्र देश के रूप में रेखांकित करते थे.
ऐसे में प्रधानमंत्री बनने के बाद वाजपेयी का यह क़दम सबको हैरान करने वाला था. शेषाद्री चारी भी वाजपेयी के क़दम से हैरान हुए थे.
आख़िर वाजपेयी के सामने ऐसी क्या मजबूरी थी कि उन्होंने प्रधानमंत्री बनने के बाद तिब्बत पर अपना रुख बदल लिया.
शेषाद्री चारी कहते हैं, "हमारी वो रणनीतिक भूल थी और हमने बहुत जल्दीबाजी में ऐसा किया था. हमें तिब्बत को हाथ से जाने नहीं देना चाहिए था. शुरू से हमें एक स्टैंड पर कायम रहना चाहिए था. हमें बिल्कुल साफ़ कहना चाहिए था कि चीन ने तिब्बत पर अवैध कब्ज़ा कर रखा है और यह स्वीकार नहीं है."
दलाई लामा से मंजूरी
चारी ने कहा, "वाजेपयी सरकार को रणनीतिक तौर पर इसे टालना चाहिए था. उस वक़्त हमने तिब्बत के बदले सिक्किम को सेट किया था. चीन ने सिक्किम को मान्यता नहीं दी थी लेकिन जब हमने तिब्बत को उसका हिस्सा माना तो उसने भी सिक्किम को भारत का हिस्सा मान लिया."
उनका कहना है कि "इसके बाद ही नाथुला में सरहद पर ट्रेड को मंजूरी दी गई. नाथुला से इतना बड़ा व्यापार नहीं होता है कि इतनी बड़ी क़ीमत चुकानी चाहिए थी. तब ऐसा लगता था कि यह एक अस्थाई फ़ैसला है और बाद में स्थिति बदलेगी. उस वक़्त भारत ने दलाई लामा से भी बात की थी और उन्होंने इसकी मंज़ूरी भी दी थी."
1914 का शिमला समझौता
शेषाद्री चारी ने कहा कि "जब भी कोई रणनीतिक फ़ैसला होता है तो आने वाले वक़्त में ग़लत साबित होने की आशंका बनी रहती है. ऐसा पंडित नेहरू के साथ भी हुआ था. चीन की जैसी आक्रामकता है उसे देख ऐसा लगता है कि वह भूटान को दूसरा तिब्बत बना देगा."
जेएनयू में सेंटर फोर चाइनिज़ एंड साउथ ईस्ट एशिया स्टडीज के प्रोफ़ेसर बीआर दीपक का मानना है कि "तिब्बत के मामले में भारत की बड़ी लचर नीति रही है. साल 1914 में शिमला समझौते के तहत मैकमोहन रेखा को अंतरराष्ट्रीय सीमा माना गया लेकिन 1954 में नेहरू तिब्बत को एक समझौते के तहत चीन का हिस्सा मान लिए."
वाजपेयी और नेहरू
प्रोफ़ेसर बीआर दीपक ने कहा कि "वाजपेयी और नेहरू में फ़र्क था. नेहरू ने आठ साल के लिए तिब्बत को चीन का हिस्सा माना था लेकिन वाजपेयी ने कोई समय सीमा तय नहीं की थी."
वे आगे कहते हैं, "मार्च 1962 में नेहरू का चीन के साथ तिब्बत पर क़रार ख़त्म हो गया था और यह 2003 तक यथास्थिति रही. 2003 में जब वाजपेयी चीन के दौरे पर गए तो उन्होंने तिब्बत पर समझौता कर कर लिया."
प्रोफ़ेसर दीपक का मानना है कि भारत की नीति चीन और तिब्बत पर विरोधाभासों से भरी रही है. उनके मुताबिक एक तरफ़ भारत मैकमोहन रेखा को अंतरराष्ट्रीय सीमा मानता है और तिब्बत को चीन का हिस्सा.
वे कहते हैं कि दोनों बातें एक साथ कैसे हो सकती हैं. दीपक ने कहा कि भारत का तिब्बत पर रुख एक जैसा होता तो वह ज़्यादा अच्छा होता.
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)