'हम बंगाली हैं, हमें बांग्लादेशी क्यों कहते हैं'

- Author, विनीत खरे
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, दिल्ली
दिल्ली से सटे उत्तर प्रदेश के नोएडा सेक्टर 76 में लंबी और महंगी इमारतों के जंगल के बीच सोनाली का घर है.
घर क्या कहें, जंग लगी और सस्ते पेंट से पुती एल्युमीनियम की चादरों को घेर कर बनाई गई 1500 रुपए मासिक किराए की कोठरी.
सोनाली पास के एक फ़्लैट में खाना बनाती हैं. पानी तेज़ बरस रहा था. कोठरियों की ये बस्ती कीचड़ से पटी पड़ी थी.
आसपास जमा इकट्ठे कूड़े से सड़न की तेज़ बदबू भी आ रही थी. पास ही कुछ बच्चे कीचड़ और बारिश में खेल रहे थे.
सोनाली माल्दा की रहने वाली हैं. पास ही महागुन मॉडर्न रेज़िडेंशियल सोसाइटी है.
13 जुलाई को घर में काम करने वाली महिलाओं और उनके परिवारवालों ने इसी सोसाइटी में घुस कर तोड़फोड़ की.
आरोप

इमेज स्रोत, Vineet Khare
उनका आरोप था कि उनकी एक साथी के साथ दुर्वव्यवहार किया है. सोसाइटी के कुछ लोगों ने महिला पर चोरी का आरोप लगाया था.
तोड़फोड़ के बाद पुलिस ने कई लोगों को गिरफ़्तार किया है. सोसाइटी के बाहर पुलिस तैनात है.
लोग अदालतों और थानों के चक्कर काट रहे हैं. कोठरियों के बाहर ताले लगे हैं. बचे-खुचे लोग सामान ठेले, छोटी गाड़ियों में रखकर भाग रहे हैं.
पांच दिनों से सोनाली के घर और आसपास की बस्तियों का बिजली-पानी काट दिया गया है.
सोमवार को बरसात से थोड़ी राहत थी, नहीं तो गर्मी में एल्युमीनियम की चादर भट्ठी हो जाती है.
मुश्किलें

सोनाली की पड़ोसी सोफ़िया बताती हैं, "गर्मी और पीने के पानी की कमी के कारण रहना मुश्किल हो गया है. पानी की कमी के कारण लोग नहा नहीं पा रहे हैं. घरों में गंदे कपड़ों का अंबार लग गया है."
किसी अंजान घर में झाड़ू पोंछे या खाना बनाने का काम शुरू करना आसान नहीं. आपको उस अंजान परिवार के एक रिश्ता बनाना होता है क्योंकि उस परिवार के लिए भी आप अंजान होते हैं.
पानी पीजिए तो पूछ कर पीजिए. कूड़ा यहां फेंकिए. घर से शौच करके आओ. अगर आपको कोई कुछ कहे तो पलटकर जवाब मत दीजिए, और पगार बढ़ाने की बात तो बिल्कुल नहीं. हालांकि सभी परिवार ऐसा व्यवहार नहीं करते.

समझौता
सोनाली बताती हैं, "हमें हर तरीक़े से समझौता करना पड़ता है. कभी हमें टॉयलेट का इस्तेमाल करने से मना कर दिया जाता है. मुझे ऐसा करने से मना नहीं किया गया लेकिन ये समस्या आम है."
घरों में काम करने वाली महिलाओं को टॉयलेट के इस्तेमाल से मना कर देना आम है.
नतीजा ये कि उन्हें काम छोड़कर या काम ख़त्म करके घर वापस आना पड़ता है.
सोनाली के दिन की शुरुआत सुबह साढ़े पांच बजे होती है क्योंकि छह बजे उन्हें काम पर पहुंचना होता है. यानी सुबह खाना बनाने का वक्त नहीं होता है.
कभी किसी ने चाय के लिए पूछ लिया तो अच्छा नहीं तो ख़ाली पेट.
10 या 11 बजे तक काम के बाद वो घर वापस आकर खाना बनाती हैं, और तब जाकर पहला निवाला पेट में जाता है.
थोड़ा आराम करके शाम का काम शुरू होता है और फिर अगला निवाला रात नौ या 10 बजे जाता है.

नाराज़गी
महीनों, सालों पहले इन इमारतों को बनाने में सोनाली जैसे लोग ही थी. जब इन इमारतों में लोग रहने लगे, तो मज़दूरों ने अपना काम भी बदल लिया.
पुरुषों ने मज़दूरी पकड़ ली जबकि महिलाओं ने घरों का काम करना शुरू कर दिया.
उन्हें रहने के लिए कोठरी मिल गई थी. काम भी मिल गया था. ज़िंदगी ठीक चल रही थी.
लेकिन सोनाली जैसी महिलाओं के लिए समस्या यहां ख़त्म नहीं हुई. अगर आप बांग्ला बोलते हैं तो आपको बांग्लादेशी होने के आरोपों से भी निपटना होगा.
सोनाली कहती हैं, "हम लोग बंगाली हैं, बांग्लादेशी नहीं हैं. आप हमारी छानबनी कर सकते हैं."
काम करने वाले कई लोगों ने कहा कि वो खुद को बांग्लादेशी बुलाए जाने से बेहद नाराज़ हैं. एक ने अपना वोटर आईडी कार्ड दिखाया. दूसने ने आधार कार्ड.
पास ही की एक अन्य मलिन बस्ती में रहने वाले व्यक्ति ने कहा, "हम कूचबिहार से यहां आए हैं, बांग्लादेश से नहीं. कल को अगर हम दिल्ली वालों को कूचबिहार में घुसने न दें तो आप क्या कहेंगे?"
उन्होने कहा, "कुछ भी होता है तो पुलिस पूछताछ करने यहां पहुंच जाती है. 13 जुलाई की घटना के बाद लोग डरे हुए हैं."












