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'फर्जी मुठभेड़ों' से कब तक लड़ता रहेगा मणिपुर
- Author, सौतिक बिस्वास
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
पूर्वोत्तर के राज्य मणिपुर में साल 1979 से 2012 के बीच उग्रवाद और हिंसा के चलते क़रीब 1500 लोग मारे गए थे. इनमें से कई लोगों के बारे में कहा जाता है कि सुरक्षा बलों ने उन्हें फ़र्ज़ी मुठभेड़ों में कथित रूप से मौत के घाट उतार दिया था.
पिछले साल सुप्रीम कोर्ट ने मारे गए लोगों के परिजनों से कहा था कि वो उनकी मौत से जुड़े सबूत तय करें.
अब भारत की सबसे बड़ी अदालत ये तय करेगी कि क्या इन मामलों की नए सिरे से जांच का आदेश दिया जाए? अगर जांच होगी तो ज़ाहिर है कुछ लोगों को सज़ा होनी तय है.
बीबीसी संवाददाताने मणिपुर का दौरा किया और फ़र्ज़ी एनकाउंटर के आरोपों का सच जानने की कोशिश की. इस दौरान मैंने कई पीड़ितों से मुलाक़ात की और सुरक्षा बलों के नुमाइंदों का भी पक्ष जानना चाहा.
बात साल 2008 की है. नवंबर का महीना था. दिन के क़रीब सवा तीन बजे थे. नीना नॉन्गमाइथेम अपने घर के काम निपटाने में व्यस्त थीं और उनके दोनों बेटे दोपहर के वक़्त सोए हुए थे. तभी उनके फ़ोन की घंटी बजी.
ट्रिन ट्रिन... हैलो.... हैलो नीना मैं बोल रहा हूं....माइकल... मुझे घर आते समय पुलिस ने पकड़ लिया है. तुम जल्दी से हमारी पहचान वाले पुलिस अफ़सर के पास जाओ ताकि उसकी गवाही पर ये लोग मुझे छोड़ दें.
ये फोन नॉन्गमाइथेम के पति ने किया था जिन्हें पुलिस ने गिरफ़्तार कर लिया था. इससे पहले कि नीना कुछ कह पाती फ़ोन अचानक ही कट गया. अपने शौहर से बात करने के लिए उन्होंने कई बार फ़ोन मिलाया. लेकिन, नंबर लगा ही नहीं.
करीब दो घंटे बाद नंबर लगा तो किसी और शख़्स ने बात करते हुए कहा कि उनका पति अभी शौच के लिए बाहर गया है और फ़ोन फिर से काट दिया. इसके बाद फोन लगा ही नहीं.
हैरान-परेशान नीना को कुछ समझ नहीं आ रहा था कि क्या करे. उनकी ननद उस पुलिस वाले की तलाश में निकल गई, जिसके बारे में नीना के पति ने उसे बताया था.
बेचैनी की हालत में नीना ने टीवी ऑन किया और न्यूज़ देखने लगी कि आखिर माज़रा क्या है.
रात नौ बजे की खबरों में एंकर अपना पूरा ज़ोर लगाकर ब्रेकिंग न्यूज़ दे रहा था.
इस वक्त की बड़ी खबर... पुलिस ने एक और आतंकी को मार गिराया... पुलिस को इसके पास से एक चाइनीज़ ग्रेनेड भी मिला है.
नीना ने जैसे ही टीवी पर खून से लथपथ उस आतंकी की तस्वीर देखी, वो तो जैसे खड़े खड़े जम सी गई और बेसाख्ता चीखने लगी.
जिसे न्यूज़ एंकर आतंकी बता रहा था वो नीना के पति माइकल थे, जो उसी दिन अपने दोस्त से मिलने इंफाल गए थे. सुबह ही पुलिस ने उसे एनकाउंटर में मार गिराया था.
इसके बाद पुलिस ने दावा किया था कि माइकल और उनका साथी तेज़ रफ़्तार बाइक पर जा रहे थे और जब उन्हें रोकने की कोशिश की गई तो माइकल ने पुलिस पर ग्रेनेड फेंके, उसके साथी ने गोलियां चलाईं.
और पुलिस ने आत्मरक्षा में उन पर गोलियां चलाईं जबकि पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट के मुताबिक़ माइकल की मौत फेफड़ों और लीवर में गंभीर ज़ख़्मों की वजह से हुई थी. पुलिस के मुताबिक माइकल एक लुटेरा और आतंकी था.
नीना का कहना है कि माइकल रोज़ी-रोटी के लिए तरह-तरह के काम कर रहा था. उसे नशे की लत ज़रूर थी. लेकिन वो उसे छोड़ने की कोशिश कर रहा था. वो लुटेरा या आतंकी बिल्कुल नहीं था. माइकल की मौत के बाद उसके पड़ोसियों ने जांच की मांग को लेकर प्रदर्शन शुरू कर दिया.
नीना के पास इतिहास विषय में मास्टर्स डिग्री है. लेकिन उन्हें एक ड्राइविंग स्कूल में काम मिला, जिसके पैसे से उन्होंने अपने बच्चों को सहारा दिया और अपने पति की मौत के लिए अकेले दम पर कानूनी लड़ाई लड़नी शुरू की. उन्होंने पुलिस के ख़िलाफ़ अपनी शिकायत दर्ज कराई. कोर्ट में अर्ज़ियां दीं. सरकार से गुहार लगाई.
एक बुज़ुर्ग दुकानदार इस एनकाउंटर का इकलौता गवाह था. उसे गवाही के लिए राज़ी कराना आसान नहीं था. नीना अपनी स्कूटी से हर रोज़ करीब एक महीने तक 15 किलोमीटर चलकर उस बुज़ुर्ग के पास जाती थीं और एनकाउंटर की सारी जानकारी लेने के साथ ही उसे गवाही देने को मनाती थीं.
नीना कहती हैं बहुत मुश्किल से वो बुज़ुर्ग गवाही के लिए राज़ी हुआ था. मणिपुर में थोड़ा बहुत इंसाफ़ इसी तरह से मिलता है. सरकार या प्रशासन की तरफ़ से कोई मदद नहीं मिलती.
'पुलिस को बेलगाम छूट'
चार साल बाद साल 2012 में सबूतों की बुनियाद पर ज़िला अदालत ने माना कि माइकल की मौत मणिपुर पुलिस की गोली से हुई थी.
दूसरे पक्ष की तरफ़ से गोली चली ही नहीं थी. हाई कोर्ट ने भी इस रिपोर्ट को सही माना और मुआवज़े के तौर पर नीना को पांच लाख रूपए देने का आदेश दिया.
माइकल का फ़र्ज़ी एनकाउंटर कोई अकेला ऐसा केस नहीं है.
मानवाधिकार संगठनों का दावा है कि साल 1979 से लेकर 2012 तक क़रीब 1,528 लोग मणिपुर में फ़र्ज़ी एनकाउंटर में मारे जा चुके हैं.
इसमें 98 नाबालिग़ और 31 औरतें भी शामिल हैं. जिन लोगों को ऐसी फ़र्ज़ी मुठभेड़ों में मारा गया, उनमें से ज़्यादातर ग़रीब या बेरोज़गार थे.
अब तक जो लोग मारे गए हैं, उनमें सबसे बुज़ुर्ग 82 साल की महिला और सबसे कम उम्र वाली 14 साल की लड़की शामिल थी.
साल 2004 का थंगजाम मनोरमा देवी का केस तो आपको याद ही होगा. अर्धसैनिक बलों के जवानों ने 32 साल की मनोरमा देवी से कथित गैंग रेप के बाद उन्हें मार डाला था.
इसके विरोध में मणिपुर की महिलाओं ने नंगे होकर होकर प्रदर्शन किया था. सारी दुनिया में इसकी चर्चा हुई थी.
मणिपुर में ऐसी हत्याएं और फ़र्ज़ी एनकाउंटर बड़े पैमाने पर हुए हैं. लेकिन इनमें से कुछ में ही मानवाधिकार आयोग की तरफ़ से जांच की गई.
न्यायिक जांच हुई और कुछ केस में चंद हज़ार रूपये का मुआवज़ा भी दिया गया. लेकिन अभी तक एक भी केस में किसी पुलिसकर्मी या सिपाही पर केस दर्ज होकर कार्रवाई शुरू नहीं हुई है.
मणिपुर के जाने माने मानव अधिकार कार्यकर्ता बबलू लॉईथांगबाम का कहना है कि किसी को भी उग्रवादी बता कर उठा लेना और बाद में उसे मार देना मणिपुर में आम बात है.
पुलिस ऐसे मामलों में केस तक दर्ज नहीं करती है. आपको ख़ुद ही इंसाफ़ के लिए लड़ाई लड़नी होती है.
साल 2009 में इस तरह के माहौल के ख़िलाफ़ इम्फाल में पीड़ित परिवारों के लोग जमा हुए और उन्होंने मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के साथ अपनी आप-बीती साझा की. इसके बाद 'एक्स्ट्रा जुडिशियल विक्टिम फैमिली एसोसिएशन' का गठन हुआ.
डर के साये में मणिपुर
पिछले साल जुलाई महीने में सुप्रीम कोर्ट ने पीड़ित परिवारों से कहा कि वो मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के साथ मिलकर इस तरह की हत्याओं की पूरी जानकारी जमा करें.
अब इनकी बुनियाद पर ही सुप्रीम कोर्ट इस महीने तय करेगा कि किस केस में जांच को आगे बढ़ाकर अपराधियों को सज़ा दिलाई जाए. अब तक जिन हत्याओं की रिपोर्ट तक दर्ज नहीं हुई है, उनकी जांच कराई जाए.
पिछले साल सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद जांचकर्ताओं ने लोकल मीडिया के माध्यम से लोगों तक जानकारी पहुंचाई और मुठभेड़ में मारे गए लोगों के परिवार वालों से सबूत मांगे.
अप्रैल 2017 तक करीब 900 ऐसे पीड़ित परिवार सामने आ चुके हैं, जिनके पास पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट भी थी, अंतिम संस्कार के सारे काग़ज़ात थे. पुलिस रिपोर्ट की कॉपी थी और कोर्ट के आदेश की कॉपी थी.
इन 900 लगों में से 748 वो परिवार थे, जिनके परिवार के सदस्यों को विद्रोही बताकर मार दिया गया था. इन मामलों की सारी जानकारियां कोर्ट में जमा कराई जा चुकी हैं.
इस काम में छात्रों ने भी अहम रोल निभाया. साथ ही स्थानीय वक़ील भी कानूनी लड़ाई लड़ने में लोगों की मदद कर रहे हैं.
एक महिला कार्यकर्ता का कहना है कि पूरा मणिपुर एक डर के साए में जीता है. अक्सर ऐसा होता है कि मर्द घर से काम के लिए निकलते हैं. फिर खबर आती है मुठभेड़ में उनके मारे जाने की.
किसी को बस स्टॉप पर गोली मार दी जाती है तो किसी को दुकानदारी करते हुए मार दिया जाता है. एक महिला को तो उस समय गोली मार दी गई जब वो अपने एक महीने के बच्चे को दूध पिला रही थी.
लोगों का कहना है कि कभी-कभी तो सुरक्षा बल बिना बताए घरों में घुस आते हैं. उनके परिवार के सदस्यों को शक की बुनियाद पर खींचकर ले जाते हैं. बिना कोई केस दर्ज किए ही उनके परिवार वालों के सामने गोली मार दी जाती है.
साल 2009 में कुछ ऐसा ही हुआ था नांगबन नोउबा सिंह के साथ. वो उस रात अपनी बहन और मां के साथ किसी शादी समारोह से लौटा था. फिर वो देर रात तक फिल्म देख रहा था.
रात को सुरक्षा बल ही घर में आ सकते हैं...
तभी रात के अंधेरे में किसी ने धड़ाधड़ दरवाज़ा पीटना शुरू कर दिया. नोउबा गहरी नींद में था इसलिए आंख नहीं खुली.
लेकिन मां की आंख खुली गई और वो घबराई हुई बेटे के कमरे गई और उसे जगा कर पीछे के दरवाज़े से उसे भगाने लगी.
क्योंकि मां जानती थी कि इतनी रात को सुरक्षा बल ही घर में आ सकते हैं. रात का गहरा सन्नाटा और अंधेरा चारों ओर फैला हुआ था. सिर्फ चांद की मद्धम रोशनी थी.
इसी रोशनी में मां को कुछ परछाइयां नज़र आईं, जिनमें से एक ने नोउबा की मां को घर के अंदर धकेल कर कुंडी लगा दी. उन्होंने नोउबा को वहीं रोक लिया.
कुछ देर तक कुछ आवाज़ें सुनाई दीं और फिर गोली चलने की आवाज़ आई.
मां को लगा कि शायद उनका बेटा भागने में कामयाब रहा इसीलिए उसके पीछे गोली चलाई गई है.
लेकिन सुबह होने पर पता चला की नोउबा को सीने में गोली मार कर घर के पिछवाड़े फेंक दिया था.
संदिग्ध मौतें और फ़र्ज़ी एनकाउंटर
उस दिन को याद करते हुए नोउबा की मां की आंखें आज भी भर आती हैं. वो कहती हैं कि नोउबा उनका सबसे लाडला बेटा था. बाक़ी दो बेटे मणिपुर से बाहर रहते हैं.
उस रात के बारे में पुलिस ने दावा किया था कि नोउबा की तलाश में उसके पूरे घर की घेराबंदी कर ली थी. पुलिस को उसकी तलाश थी क्योंकि वो बाग़ी गुट का सदस्य था और जबरन वसूली भी करता था.
हालांकि तीन साल बाद न्यायिक जांच में पुलिस के ये दोनों ही दावे ग़लत साबित हुए. जज ने भी कहा कि पुलिस ने नोउबा को गिरफ्तार करने की कोशिश नहीं की.
अब सुप्रीम कोर्ट इस केस की सुनवाई कर रहा है जिसके बाद पीड़ित परिवार के लिए मुआवज़ा तय किया जाएगा.
मणिपुर के लोगों का कहना है कि उनके बच्चों की परवरिश इसी डर के साए में हो रही है कि ना जाने कब बड़े होने पर उनके बच्चों को उग्रवादी या लुटेरा बताकर मार दिया जाएगा.
वो अब अपने बच्चों को मुर्दाखानों में नहीं देखना चाहते. वो हालात बदलना चाहते हैं.
मणिपुर के लोगों में डर घर कर गया है. कोई ख़ुद को महफ़ूज़ नहीं महसूस करता है. इसकी वजह ऐसी ही संदिग्ध मौतें और फ़र्ज़ी एनकाउंटर हैं.
साल 1996 में ओइनम अमीना देवी अपने एक महीने के बच्चे को दूध पिलाते हुए सुरक्षा बलों की गोलियों का शिकार हो गई थी. दरअसल सिपाही किसी संदिग्ध का पीछा कर रहे थे जो ओइनम के घर की छत पर भागता हुआ उसके कमरे में घुस आया था और पलंग के नीचे छिप गया था.
अपने घर की ओर सुरक्षा बलों को आता देख ओइनम घबरा गई और दौड़कर घर के अंदर जाने लगीं. तभी एक गोली उसे आकर लगी जो उसके सीने से होते हुए उसके बच्चे को जा लगी. ओइनम की मौक़े पर ही मौत हो गई जबकि उसके बच्चे को तुरंत अस्पताल ले जाया गया, जहां उसकी गोली निकाल दी गई.
इस घटना के बाद ख़ूब हंगामा हुआ. ओइनम के परिवार वालों ने पोस्टमॉर्टम के बाद शव लेने से ही इनकार कर दिया. बाद में दबाव में आकर सरकार ने जांच के आदेश दिए.
जांच में पाया गया कि फ़ायरिंग नाजायज़ थी और अंधा-धुंध की गई थी. सरकार ने अपनी रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट को सौंपी तब जाकर पीड़ित के परिवार को महज़ 50 हज़ार रूपये का मुआवज़ा मिल पाया.
आज अमीना देवी की बेटी 20 बरस की है. मां को याद करके उसकी आंखें गीली हो जाती हैं. वो कहती है कि बदक़िस्मती से वो आज भी ज़िंदा है, जबकि उसकी मां चल बसी. उसके पिता ने दूसरी शादी कर ली है.
सरकार का दावा
पुलिसवालों का तर्क है कि वो जितने भी एनकाउंटर करते हैं वो सभी उचित होते हैं और ज़्यादातर पीड़ित पक्ष किसी ना किसी विद्रोही गतिविधि में शामिल होता है.
पिछले साल सुप्रीम कोर्ट में अपनी रिपोर्ट दाखिल करते हुए मणिपुर की सरकार ने दावा किया था कि साल 2000 से लेकर 2012 तक करीब 120 पुलिसकर्मी और अर्धसैनिक बलों के जवान विद्रोहियों के हाथों मारे जा चुके हैं.
सरकार का दावा है कि राज्य में करीब पांच हज़ार आतंकियों ने मणिपुर की क़रीब 23 लाख से ज़्यादा आबादी को फिरौती के नाम पर अपने कब्ज़े में कर रखा है. राज्य की इतनी बड़ी आबादी डर के साए में जी रही है.
आप पुलिस का पक्ष सुनेंगे तो हैरान रह जाएंगे. बीते साल कमांडो हेरोजित सिंह ने एक पत्रकार को दिए इंटरव्यू में ख़ुद इस बात को माना था कि साल 2009 में उसने इम्फाल के भरे बाज़ार में एक संदिग्ध निहत्थे पर गोलियां चलाई थीं. अब तक वो क़रीब 100 लोगों को इसी तरह मार चुके हैं और बाक़ायदा इसका रिकॉर्ड भी रखते हैं.
हेरोजित का कहना है कि वो सिर्फ़ अपने आला अफ़सरों के हुक्म की तामील करते हुए लोगों को मार रहा था. अपने बर्ताव की वजह से हेरोजित को कई बार निलंबित किया जा चुका है लेकिन कुछ दिन बाद फिर से बहाली हो जाती है. जब तक वो निलंबित रहता है, वो अपने परिवार के साथ वक़्त बिताता है.
इन दिनों उसके ख़िलाफ़ एनकाउंटर के एक मामले की जांच चल रही है, सीबीआई ने उससे कई बार पूछताछ की है. हेरोजित आज डिप्रेशन का शिकार है. वो पिछले दो साल से सोया नहीं है. उसे अंधेरे से डर लगता है. हेरोजित कहता है कि काश उसका अपना सूरज होता, जिससे दुनिया में कभी अंधेरा नहीं होता.
वो इस क़दर डिप्रेशन का शिकार है कि एक बार उसकी मुर्गियां बीमार हो गईं, तो, वो पागल हो गया. वो मुर्गियों को लेकर डॉक्टर की तरफ़ भागा.
मणिपुर में उग्रवादी हिंसा
हालांकि मणिपुर पुलिस के पूर्व प्रमुख और मौजूदा सरकार के उप-मुख्यमंत्री युमनाम जॉयकुमार का कहना है कि हेरोजीत फ़र्ज़ी एनकाउंटर की बात को कुछ ज़्यादा ही बढ़ा चढ़ाकर बता रहा है. वो सिर्फ 10 से 15 एनकाउंटर में ही शामिल रहा है.
साथ ही वो फ़र्ज़ी एनकाउंटर के आंकड़ों को भी सही नहीं मानते. उनके मुताबिक़ अगर 1500 लोगों का एनकाउंटर हुआ होता तो अब तक पूरा राज्य प्रदर्शनों की आग में जल रहा होता.
जॉयकुमार ने अपने कार्यकाल में मणिपुर में पुलिस फ़ोर्स की तादाद बीस हज़ार से बढ़ाकर 34 हज़ार कर दी थी.
उनका कहना है कि एक वक़्त में मणिपुर में आतंक का राज था. खुलेआम लूटपाट होती थी. जिससे निपटना पुलिस के लिए भी आसान नहीं था.
जॉयकुमार ने अपनी फोर्स से कहा था कि आपके पास हथियार हैं तो आप पलटकर वार कीजिए. जॉयकुमार के मुताबिक़ उन्होंने इसी रणनीति से मणिपुर में उग्रवादी हिंसा पर क़ाबू पाया.
फ़र्ज़ी एनकाउंटर मामलों में सुप्रीम कोर्ट के दख़ल के बाद मणिपुर के बहुत से पीड़ितों का हौसला बढ़ा है. हालांकि अब फर्जी मुठभेड़ों का सिलसिला थम चुका है.
लेकिन गुनहगारों को सज़ा दिलाने के लिए जद्दोजहद अभी भी जारी है. ये लड़ाई सिर्फ़ गुनहगारों को सज़ा दिलाने के लिए नहीं है, बल्कि देशद्रोही, गद्दार, आतंकी जैसे दाग़ को धोने के लिए भी है.
पीड़ित नीना कहती हैं कि वो इस लड़ाई को लड़कर गुज़र चुके अपने पति को तो वापस नहीं ला सकतीं. लेकिन वो चाहती हैं कि उनके बच्चों को समाज में आतंकी की औलाद के तौर पर ना देखा जाए और ये तभी मुमकिन हो पाएगा जब कोर्ट उनके पति को क्लीन चिट देगा.
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