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मणिपुर में क्यों गुस्से में हैं प्रदर्शनकारी?
- Author, ज़ुबैर अहमद
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता दिल्ली
मणिपुर की राजधानी इंफाल में जारी हिंसा एक गंभीर घटना है जिसमे केंद्र सरकार को बीच-बचाव करने की ज़रूरत पड़ सकती है. ताज़ा हिंसा ऐसी पहली वारदात नहीं है. इसे राजनीतिक और ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में देखा जाना चाहिए.
मणिपुर भारत का हिस्सा 1949 में बना और इसे राज्य का दर्जा 1972 में हासिल हुआ. पूर्वोत्तर भारत का ये छोटा सा राज्य भौगोलिक दृष्टि से, जातीय और सांस्कृतिक रूप से दो भागों में बटा है. पहाड़ों पर नागा रहते हैं जो कैथोलिक धर्म को मानते हैं.
नागा जनजाति समुदाय की 32 जनजातियां हैं जिनमे सबसे शक्तिशाली तांगखुल नागा हैं.
पहाड़ पांच ज़िलों में बंटा है जो मणिपुर की कुल ज़मीन का 90 प्रतिशत है. पहाड़ों पर रहने वालों के प्रशासन के लिए स्वायत्त जिला परिषद (एडीसी) हैं. राज्य सरकार एडीसी के अनुमोदन के बग़ैर कोई क़ानून नहीं पास कर सकती.
मणिपुर का दूसरा हिस्सा है घाटी का जो नागा आबादी वाले पहाड़ों से घिरा है. ये राज्य की भूमि का केवल 10 प्रतिशत है, लेकिन इसकी आबादी पहाड़ों पर रहने वाली जनजाति से थोड़ी अधिक है. घाटी चार ज़िलों में विभाजित है.
पहाड़ों पर रहने वाले अगर कैथोलिक धर्म के अनुयायी हैं तो घाटी की बड़ी आबादी हिंदू है, जिनमें वैष्णव हिंदू अधिक है, इन्हें मेतेई समुदाय के नाम से जाना जाता है. राज्य सरकार, पुलिस और नौकरशाही में घाटी के हिंदुओं का बहुमत है.
ताज़ा हिंसा की जड़ लंबे समय से जारी घाटी और पहाड़ के बीच प्रतिद्वंद्विता और एक दूसरे के प्रति अविश्वास है, जो कभी-कभार हिंसा का रूप ले लेता है.
लेकिन गंभीर हिंसा उस समय होती है जब पहाड़ों पर रहने वाले नागा और दूसरी जनजातियां ये महसूस करती हैं कि राज्य सरकार उनकी ज़मीन पर क़ब्ज़ा करना चाहती है या ऐसा क़ानून लाना चाहती है जिससे सदियों पुरानी उनकी सभ्यता ख़त्म हो सकती है.
पिछले साल पहाड़ के चूड़ाचंदपुर शहर में 1 सितंबर को हिंसा उस समय शुरू हुई जब एक दिन पहले मणिपुर विधानसभा में तीन विवादास्पद बिल पारित किए गए. पहाड़ पर रहने वाले नागा समुदाय को लगा कि ये बिल उनकी ज़मीन और उनके रहन-सहन के अंदाज़ को भस्म करने की मेतेई समुदाय की बहुमत वाली सरकार की एक कोशिश है. हिंसा में पुलिस की गोलियों से कुछ नागा प्रदर्शनकारियों की मौत भी हुई.
अंग्रेजों के ज़माने में ट्राइबल या आदिवासी आबादी को मुख्यधारा में लाने के बजाय उन्हें और उनकी संस्कृति के साथ छेड़-छाड़ नहीं की गई. भारत की 1947 में आज़ादी के समय मणिपुर एक प्रिंसली स्टेट या रियासत थी. इसके बाद 1949 मणिपुर भारत का एक अटूट अंग बन गया.
इससे संबंधित हुए समझौते में केंद्र सरकार ने आश्वासन दिया था कि ट्राइबल संस्कृति को मुख्यधारा में ज़बरदस्ती लाने की कोशिश नहीं की जाएगी. इसके बाद केंद्र सरकार और चरमपंथी नागा नेता टी मुइवा के बीच 1997 में हुए समझौते में भी ऐसे ही वादे किए गए थे.
लेकिन इसके बाद से नागा नेताओं और कार्यकर्ताओं का हमेशा से ये आरोप रहा है कि राज्य सरकार किसी न किसी बहाने से पहाड़ों पर सेंध मारना चाहती है और उनकी ज़मीनों पर क़ब्ज़ा करना चाहती है. दूसरी तरफ घाटी में रहने वालों का तर्क है कि घाटी राज्य के पहाड़ी इलाक़ों से काफी छोटी है, लेकिन आबादी पहाड़ों से अधिक है. तो एक ही राज्य का भाग होकर भी वो पहाड़ों पर आबाद क्यों नहीं हो सकते?
ताज़ा हिंसा के पीछे पहाड़ और घाटी की कशमकश है. मणिपुर में राज्य सरकार ने सात नए ज़िलों की घोषणा की थी जिसके विरोध में नागा संगठनों ने आर्थिक नाकेबंदी का आह्वान किया था. एक नवंबर से मणिपुर के दो राष्ट्रीय राजमार्गों पर यूनाइटेड नागा काउंसिल की ओर से अनिश्चितकालीन आर्थिक नाकेबंदी चल रही है. उसके बाद से मणिपुर में रोज़मर्रा की ज़रूरी चीज़ों की आपूर्ति प्रभावित हुई है.
ताज़ा हिंसा में वो लोग फंसे हैं जो पहाड़ों से आकर घाटी में काम-काज के लिए आबाद हुए हैं. ज़ाहिर है इन में अधिकतर नागा हैं.
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