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झूठ और नफ़रत का डिजिटल चक्रव्यूह तोड़ने की कोशिश
- Author, राजेश प्रियदर्शी
- पदनाम, डिजिटल एडिटर, बीबीसी हिंदी
मशीनें झूठ नहीं बोलतीं, लोग झूठ बोलते हैं, हत्यारे लोग होते हैं, गोलियाँ नहीं.
व्हॉट्सऐप और फ़ेसबुक को कठघरे में खड़ा कर देने भर से ये मुसीबत टलने वाली नहीं है, हमें इस चक्रव्यूह से निकलने के रास्ते खोजने होंगे.
बहुत से पढ़े-लिखे लोग सोशल मीडिया का शातिर और ख़तरनाक इस्तेमाल कर रहे हैं, वहीं अशिक्षित-अर्धशिक्षित जनता अफ़वाह और अर्धसत्य को परमसत्य मानकर ख़ून बहा रही है.
सहारनपुर, झारखंड या फिर मुज़फ़्फ़रनगर हर जगह नफ़रत में लिथड़े मैसेज दर्दनाक कहानियों के केंद्र में थे.
'वायरल' झूठ
ख़ून से रंगे हाथ सिर्फ़ उनके नहीं हैं जिन्होंने जुनैद, पहलू ख़ान और अयूब पंडित जैसे बेकसूरों को मारा, उन ऊँगलियों पर भी ख़ून लगा है जिन्होंने जान-बूझकर नफ़रत सुलगाने वाले मैसेज भेजे.
समस्या न तो लोगों का अर्धशिक्षित होना है, न ट्विटर है, न व्हॉट्सऐप.
समस्या है वो मक्कारी जिसने नफ़रत फैलाने के प्रोजेक्ट में टेक्नॉलॉजी को साध लिया है, मक्कारी का मुक़ाबला साझा समझदारी से ही हो पाएगा.
'वायरल' झूठ संक्रामक रोग की तरह फैल रहा है, ज्यादातर मरीज़ों को पता नहीं कि वे बीमार हैं और बीमारी फैला भी रहे हैं, ऐसे भी लोग हैं जिनके दिलों में नफ़रत भर चुकी है, उनके लिए ये सब एक मिशन बन गया है.
मोबाइल इंटरनेट
'फ़ेक न्यूज़' कोई नई चीज़ नहीं है, अर्धसत्य से पूर्ण असत्य तक, सदियों से हर रंग-रूप के झूठ चलते रहते हैं, लेकिन ये सब इतना संगठित पहले कभी नहीं रहा.
मोबाइल इंटरनेट पर लोग सिर्फ़ पित्ज़ा नहीं, दंगा भी ऑर्डर कर रहे हैं.
नफ़रत, हिंसा, भ्रामक जानकारियाँ, आधा-सच, आधा झूठ ये सब इंडस्ट्रियल स्केल पर पैदा किया जा रहा है, और बाँटा जा रहा है.
क्या सच है और क्या झूठ, ये जानना-समझना अब सचमुच जीने-मरने का सवाल बन गया है. कैसे पता लगे कि क्या सच है और क्या झूठ, यह बहुत ज़रूरी सवाल है.
सोशल मीडिया
दुनिया के सबसे आसान और सस्ते कामों में एक है सोशल मीडिया के लिए कंटेट बनाना.
फर्ज़ी साइटों के ज़रिए झूठ फैलाने वालों की एक ही मंशा है--आपकी दिमाग़ी आज़ादी पर नियंत्रण, आपको एक ख़ास ढंग से सोचने के लिए बाध्य करना.
सुबह से शाम तक जाने-अनजाने आप बीसियों बार झूठ और नफ़रत के इस खेल का शिकार बनते हैं और खेल को आगे बढ़ाने के लिए आप इस्तेमाल भी होते हैं, यह आप पर हमला है.
जैसे एक मासूम बच्चे को बताना होता है कि अनजान आदमी से चॉकलेट नहीं लेना चाहिए, वैसे ही वयस्कों को बताना पड़ रहा है कि आँख मूँदकर हर कंटेंट पर विश्वास मत करो, यह दुखद स्थिति है, लेकिन ये काम ज़रूरी है.
क्या करना चाहिए?
झूठ फैलाना अगर आसान है तो टेक्नॉलॉजी की मदद से उसकी पोल खोलना भी बहुत मुश्किल नहीं है.
हमारे न्यूज़रूम में हर पत्रकार आदतन 'फैक्ट चेक' करता है, सिर्फ़ पत्रकारों को ही नहीं, आपको भी इसकी आदत डालनी चाहिए.
'फ़ेक न्यूज़' की पहचान बहुत आसान है, आपको देखना चाहिए कि ख़बर जेनरेट कहाँ से हुई है, उसकी ज़िम्मेदारी लेने वाली मुहर किसकी है.
क्या ये जाना-माना और पेशेवर संस्थान है या फिर अंटशंट डॉट कॉम.
पेशेवर मीडिया संस्थानों के काम करने का एक ढंग होता है, उसकी भाषा, तस्वीरों के इस्तेमाल और उनमें ज़िम्मेदार लोगों के हवाले से कही गई बातों से आप अंदाज़ा लगा सकते हैं, फेक़ न्यू़ज़ अक्सर बचकाने ढंग से लिखे जाते हैं.
हमारी साझीदारी
फ़र्ज़ी ख़बरें और नफ़रत भरे कंटेंट पूरी दुनिया के लिए, और ख़ास तौर पर भारत के लोकतंत्र के लिए ख़तरा हैं जिनसे लड़ने के लिए मीडिया और पाठकों को एकजुट होना चाहिए.
बीबीसी हिंदी और द क्विंट ने मिलकर इसी सोच के साथ 'स्वच्छ डिजिटल इंडिया' की शुरुआत की है, इसका उद्देश्य लोगों को जागरूक करना है कि वे झूठ की पहचान कर सकें, उसके पंख कतर सकें, ताकि भारत का डिजिटल-सोशल-मोबाइल माहौल साफ़ और भरोसेमंद रहे.
इसमें हमें आपका साथ चाहिए. आपके सुझावों, टिप्पणियों और आलोचनाओं का भी स्वागत रहेगा, हमेशा की तरह.
(ये लेख बीबीसी हिंदी और द क्विंट की साझा पहल 'स्वच्छ डिजिटल इंडिया' का हिस्सा है. इसी मुद्दे पर द क्विंट की ऋतु कपूर का अंग्रेज़ी लेख यहाँ पढ़िए. )
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