#PehlaPeriod :'मुझे लगा मैं किसी बड़ी बीमारी का शिकार हो गई हूं'

झारखंड के पश्चिम सिंहभूम ज़िले के चक्रधरपुर प्रखंड के कारमेल स्कूल की लड़कियां

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इमेज कैप्शन, झारखंड के पश्चिम सिंहभूम ज़िले के चक्रधरपुर प्रखंड के कारमेल स्कूल की लड़कियां

कैसा लगता है जब 10-12 साल की एक बच्ची को अपनी फ्रॉक पर ख़ून के धब्बे दिखाई देते हैं? कितना समझते हैं आप इसके बारे में?

यही समझने के लिए हमने औरतों से उनकी पहली माहवारी यानी #pehlaperiod के अनुभव साझा करने को कहा था.

आज की किस्त में अपने अनुभव साझा कर रही हैं झारखंड के दूर-दराज इलाकों की लड़कियां.

प्रियंका शर्मा

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बड़ी बीमारी का शिकार

प्रियंका शर्मा, गांव -मोहितपुर, प्रखंड -सरायकेला, जिला -सरायकेला-खरसांवा, झारखंड

बारह साल की उम्र में मेरा मासिक शुरू हुआ. खून देखकर मेरे हेाश उड़ गए. मुझे लगा कि मैं किसी बड़ी बीमारी का शिकार हो गई हूं.

माँ से पूछने पर उन्होंने इसकी जानकारी देते हुए कपड़ा इस्तेमाल करने को कहा.

कपड़े को धोकर बाहर सुखाने कि मनाही थी क्योंकि ऐसा बताया गया था कि सूखते हुए कपड़े पर यदि चिड़ियों की नज़र पड़ गई तो बांझ हो जाने का डर है.

इसी डर से मैं कपड़े को कमरे छुपा का रख देती थी. दिन में दो ही बार कपड़े बदलती थी.

सुरजो मार्टी सोय

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बड़ी हो गई हो...

सुरजो मार्टी सोय, गांव-जानुमबेड़ा, प्रखंड -खरसांवा, जिला -सरायकेला-खरसांवा, झारखंड.

मैंने माहवारी के बारे में दोस्तों से सुन रखा था लेकिन सही जानकारी नहीं थी. शाम के समय कपड़ा गंदा हुआ तो घर पर मेरी भाभी ने कहा कि तुम अब बड़ी हो गई हो.

उन्होंने मुझे उन दिनों में कैसे रहना है इसकी जानकारी दी.

पश्चिम सिंहभूम

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इमेज कैप्शन, पश्चिम सिंहभूम के आनंदपुर गांव में किशोर लड़कियों की मीटिंग

बागान जना मना...

सलोमी बोईपाई, गांव- मुरहातु बाईसाई, प्रखंड -चक्रधरपुर, जिला -पश्चिम सिंहभूम.

11 वर्ष की उम्र में पहली बार जब माहवारी हुई तब सही जानकारी देने वाला कोई नहीं था. ना ही मेरे माता-मिता हैं और मैं स्कूल भी नहीं जाती थी.

मैंने अपनी चाची से पूछकर कपड़े का इस्तेमाल करने लगी. इस्तेमाल किए हुए कपड़ों को घर कोने-कोने में छुपा कर रख देती थी.

माहवारी के दिनों में बगान जाना भी मना था.

पश्चिम सिंहभूम

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इमेज कैप्शन, पश्चिम सिंहभूम के गोंगारडीह गांव में सिस्टर जिंसी लड़कियों को माहवारी से जुड़ी स्वच्छता के बारे में समझाते हुए

माहवारी शुरू हुई...

रूतु हेस्सा, गांव-उटुटुआ, जिला -पश्चिम सिंहभूम, झारखंड.

बारह साल के उम्र माहवारी शुरू हुई. मेरे दोस्तों ने ही इसके बारे में पूरी जानकारी दी.

साथ ही ये भी बताया गया कि इसके बारे में किसी से भी चर्चा नहीं करनी है, माँ से भी नहीं.

उन दिनों में एक-दूसरे से बात करने की मनाही थी. धीरे-धीरे दोस्तें से ही घर में जानकारी मिली.

दर्शना
इमेज कैप्शन, दर्शना समेकित जन विकास केंद्र, जमशेदपुर के लिए काम करती हैं

कपड़े सुखाने का डर...

दर्शना, समेकित जन विकास केंद्र, जमशेदपुर

सुदूर ग्रमीण इलाको में देखा गया है कि लड़कियां माहवारी के दौरान सप्ताह भर नहाती नहीं हैं. उन्हें बताया गया है कि नहाने से ज्यादा ख़ून बहता है.

वे कभी भी कपड़ों को धोकर धूप में नहीं सुखाती हैं. उन्हें लगता है कि बाहर कपड़े सुखाने पर घर के सदस्यों को इसके बारे में पता चल जाएगा.

इसी गांव की कुछ लड़कियों ने बताया कि कपड़े सुखाने के डर से वे माहवारी के दिनों में दो अंडरपैंट पहन कर ही समय बिताती थीं.

उन्हें इस बात का डर रहता है कि बाहर कपड़ा सुखाने से घर के मर्दों को इसके बारे में पता लग सकता है.

कुछ लड़कियां कपड़ें इस्तेमाल करने की जगह तौलिए का इस्तेमाल करती हैं. जिसके कारण उन्हें चलने में बहुत दिक्कत होती है.

चूंकि तौलिये को मोड़ कर इस्तेमाल करने से पूरे दिन एक ही कपड़े से काम चल जाता है और नहाने के दौरान वे तौलिया धो लेती हैं.

वो सोचती हैं कि इससे किसी को भी ख़बर नहीं हो सकती है.

(समेकित जन विकास केंद्र का स्वयंसेवी संगठन जमशेदपुर के आस-पास के साठ गांवों में माहवारी के दौरान साफ-सफाई पर जागरूकता कार्यक्रम चलाता है.संगठन के लिए काम कर रहीं दर्शना सिंह ने इन किशोरवय लड़कियों के अनुभव बीबीसी हिंदी को भेजे हैं.)

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