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नज़रिया: क्या डोनल्ड ट्रंप पर चल पाएगा नरेंद्र मोदी का जादू?
- Author, रुद्र चौधरी
- पदनाम, बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए
भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप के बीच 26 जून को वाशिंगटन डीसी में वार्ता होगी. ये पहली बार है जब दोनों नेताओं की मुलाकात होगी.
मोदी भारत के प्रधानमंत्री बनने के बाद जब सितंबर 2014 में अमरीका पहुंचे थे. तब न्यूयॉर्क का मैडिसन स्कवॉयर गार्डन 'मोदी-मोदी' के नारों से गूंज उठा था. लेकिन अब ये वो अमरीका नहीं है.
उस समय मोदी अमरीका में रहने वाले बीस लाख भारतीय मूल के लोगों के लिए किसी रॉकस्टार से कम नहीं थे. वो अब भी अमरीका और दुनिया के अन्य देशों में रह रहे बहुत से भारतीयों के लिए रॉक्स्टार ही हैं.
लेकिन अब वक़्त बहुत बदल गया है. अब अमरीका राष्ट्रपति ट्रंप के नेतृत्व में है और अब यहां वैश्विक राजनीतिक स्टारडम के लिए बहुत ज़्यादा जगह नहीं है.
ओबामा का दौर अलग था
प्रधानमंत्री मोदी से कई बार मिलने और दो बार भारत की यात्रा करने वाले राष्ट्रपति ओबामा हर तरह से अंतरराष्ट्रीय थे. भारतीय मूल के लोगों से मोदी के संवाद को न सिर्फ़ बढ़ावा दिया गया था बल्कि व्हाइट हाउस के अधिकारियों की ओर से प्रोत्साहित किया गया था.
ओबामा के शासनकाल में भारत और अमरीका के बीच व्यापारिक रिश्ते बेहतर हुए. ख़ासकर दोनों देशों के बीच रक्षा रिश्ते मज़बूत हुए और भारत-अमरीका परमाणु समझौते का रास्ता साफ़ हुआ.
ओबामा ने अपने शासनकाल में कार्बन उत्सर्जन को कम करने का स्पष्ट उद्देश्य भी निर्धारित किया था. दो अक्तूबर 2016 यानी महात्मा गांधी के जन्म दिवस के मौक़े पर भारत जलवायु परिवर्तन पर हुए पेरिस समझौते में शामिल हो गया था.
ओबामा ने तुरंत भारत की तारीफ़ करते हुए ट्वीट किया था, "गांधी जी ऐसी दुनिया में विश्वास रखते थे जो हमारे बच्चों के रहने के लायक हो. मोदी और भारतीय लोगों ने गांधी की उस विरासत को आगे बढ़ाया है."
अमरीका के लिए भारत एक दांव है?
भारत ने जब पेरिस समझौते पर हस्ताक्षर किए तो उसकी प्रतिबद्धता सिर्फ़ जलवायु परिवर्तन के लिए नहीं थी बल्कि उस अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था के प्रति भी निष्ठा थी, जो सामूहिक ज़िम्मेदारी पर भरोसा करती है.
1952 में राष्ट्रपति ड्वाइट आइज़नहॉवर के चुनाव के बाद से अमरीका भारत पर इस व्यवस्था में शामिल होकर और इसके साथ मिलकर काम करने का दबाव बनाता रहा है. लेकिन कई कारणों से ये संभव नहीं था.
भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के शब्दों में कहें तो 'भारत गुटनिरपेक्ष रहना चाहता था.' बावजूद इसके जब भी मतभेद पैदा हुए उन्हें संभाल लिया गया, क्योंकि दोनों ही देश एक दूसरे की स्थिति को समझते थे.
21वीं शताब्दी में, ख़ासकर 2001 में जॉर्ज डब्ल्यू बुश के राष्ट्रपति बनने के बाद से, भारत और अमरीका के रिश्तों में वादे ही वादे थे.
अमरीकी रणनीतिकारों के लिए भारत से रिश्ते भविष्य में नतीजे देने वाले दांव थे. ये मान लिया गया कि भारत की बढ़ती हुई आर्थिक और सैन्य शक्ति से अंततः अमरीका को ही फ़ायदा होगा.
भारत से ट्रंप की बेरुखी
एक मज़बूत भारत से उम्मीद थी कि वो तेज़ी से बढ़ते हुए चीन के प्रभाव को संतुलित कर सकता है. और इसके बदले में भारत को तुरंत कुछ नहीं लौटाना था.
ये दरअसल भविष्य में फ़ायदा उठाने के लिए अमरीका का वर्तमान में किया गया निवेश था.
60 सालों में पहली बार ट्रंप के राष्ट्रपति बनने से अमरीका की भारत को लेकर ये नीति पटरी से उतरती दिख रही है. अमरीका अब भारत से रिश्तों के बदले में स्पष्ट और त्वरित फ़ायदे चाहता है.
और इसके लिए मोदी समेत भारत के किसी भी राष्ट्रीय नेता को छोड़ा नहीं जाएगा. उदाहरण के तौर पर, जब अमरीका ने पेरिस समझौते से अलग होने का ऐलान किया तो राष्ट्रपति ट्रंप ने भारत पर तीखा निशाना साधा था.
ट्रंप ने कहा कि भारत विकसित देशों से अरबों डॉलर की मदद ले रहा है, लेकिन बदले में कुछ नहीं कर रहा है.
यही नहीं अमरीका ने स्पष्ट कर दिया कि वह एच1बी वीज़ा से संबंधित नियमों में सुधार कर रहा है. भारत से हज़ारों इंजीनियर यही वीज़ा लेकर अमरीका जाते रहे हैं.
मोदी सरकार की कोशिशें
ट्रंप के गुस्से से बचने के लिए अमरीका में काम कर रहीं भारतीय कंपनियों ने तुरतफुरत में अमरीकी कर्मचारियों को रखने की इच्छा ज़ाहिर की.
लेकिन कारपोरेट अमरीका भारत की आर्थिक प्रगति को लेकर बहुत आश्वस्त नहीं है. भारत सरकार ने हाल ही में कई दवाइयों की क़ीमत निर्धारित कर दी, जिससे उन विदेशी कंपनियों के फ़ायदे पर असर होगा, जो ये विशेष दवाएं बनाती हैं.
25 तारीख को मोदी की अमरीकी कंपनियों के सीईओ से मुलाक़ात के दौरान ये मुद्दा उठा भी. मोदी सरकार ने अमरीका की राजनीति से भारत को जोड़ने के जितने प्रयास किए हैं इतने शायद पहले कभी किसी भारतीय सरकार ने किए हों.
भारत ने अमरीका के साथ रक्षा समझौता किया, अंतरराष्ट्रीय समझौतों में शामिल हुआ जिससे कि अमरीकी कंपनियों को भारत के परमाणु क्षेत्र में निवेश के अवसर मिल जाएं.
समझौते तय करेंगे रिश्तों की दिशा
यदि मोदी ट्रंप से व्यक्गित रिश्ता बना पाते हैं तो वो पेरिस समझौते या एच1बी वीज़ा जैसे विवादित मुद्दों पर भारत का पक्ष रखने का मौका पा सकते हैं.
प्रधानमंत्री मोदी भारत को न्यूक्लियर सप्लायर्स ग्रुप (एनएसजी) में शामिल कराना चाहते हैं और इसके लिए हो सकता है भारत को अमरीका के साथ ऐसे समझौते करने पड़ें जिनसे भारत ट्रंप से पहले के वादों के दौर में बचता रहा है.
मोदी ट्रंप के साथ कैसे समझौते करते हैं ये भारत-अमरीका के रिश्तों का कुछ हद तक भविष्य तय करेगा.
साथ ही, अमरीका के वैश्वीकरण से अलग होने के इस दौर में, मोदी के एक स्टेट्समैन के तौर पर उनकी साख़ के बारे में भी ये मुलाक़ात बहुत कुछ कहेगी, जो उन्होंने 2014 में अपनी चुनावी जीत के बाद ख़ुद को अंतरराष्ट्रीय जगत में स्थापित कर हासिल किया है.
(राजनीतिक विश्लेषक रुद्र चौधरी किंग्स कॉलेज, लंदन में दक्षिण एशियाई मामलों के सीनियर लेक्चरर हैं.)