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नज़रिया: किसानों की समस्या मोदी की नोटबंदी की देन?
- Author, राघवन जगन्नाथन
- पदनाम, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए
किसी ख़ास नीति और उसके नतीजों के बीच की कड़ी को अलग करना हमेशा ही बहुत मुश्किल काम होता है.
कारण और प्रभाव को जोड़ने का सबसे ख़राब तरीक़ा ये होगा कि हम पहले प्रभाव को देखें और फिर उसके नजदीकी कारणों से जोड़ने की कोशिश करें.
8 नवंबर, 2016 को जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 500 रुपये और 1000 रुपये के नोट इकॉनमी में चलन से हटाने का फैसला किया था तो लोगों के पास मौजूद 86 फ़ीसदी करेंसी बेमानी हो गई.
ये बताने के लिए जीनियस होना ज़रूरी नहीं था कि फैसले का असर इकॉनमी पर पड़ेगा.
ख़ास तौर पर नकदी से चलने वाला असंगठित क्षेत्र और खेती-बारी भी इसकी जद में आएंगे. कुछ बातें हैं जिन पर ध्यान दिए जाने की ज़रूरत है.
जब नकदी का संकट था खेती-बारी के काम पर ज़्यादा फर्क नहीं पड़ा. चाहे वो बुआई हो या कटाई. लेकिन तकलीफ़ देने वाली खबरें देर से आईं.
बर्बादी की भविष्यवाणी
जब अच्छी फसल लेकर किसान मंडी की तरफ गए तो पता चला कि क़ीमतें धड़ाम से गिर गई हैं.
जिन लोगों ने फसल काटने से पहले बर्बादी की भविष्यवाणी की थी, वे ग़लत साबित हुए.
वे लोग जो कह रहे थे कि रबी की बुआई के समय नोटबंदी के फैसले से उत्पादन पर असर पड़ेगा, अब ये मानते हैं कि नतीजे देर से सामने आ रहे हैं.
नकदी से चलने वाली अनाज मंडियों में जब किसान अपनी बंपर फसल लेकर पहुंचे तो उन्होंने गोता लगाते बाज़ार में खुद को बेसहारा पाया.
नतीजा किसानों की नाराजगी के तौर पर सामने आया. ये सबकुछ अकेले नोटबंदी की वजह से नहीं हुआ.
हां, नोटबंदी इसका नजदीकी कारण ज़रूर था और बाज़ार की बर्बादी का सारा ठीकरा इसी के सिर फोड़ा गया.
नोटबंदी के पहले
तो सवाल उठता है कि फसलों की गिरी हुई क़ीमतों में अकेले नोटबंदी का कितना योगदान रहा?
इस सवाल का जवाब खोजने के लिए हमें नकदी के संकट के अलावा कई और वजहों की पड़ताल करनी होगी.
पहली वजह तो ये है कि नोटबंदी के ठीक पहले इकॉनमी की गाड़ी लड़खड़ाई हुई थी.
साल 2015-16 की आख़िरी तिमाही में इकॉनमी की ग्रॉस वैल्यू (जीवीए) के आंकड़ें 8.7 फीसदी के साथ शीर्ष पर थे, लेकिन इसके बाद से इसमें गिरावट जारी है.
जीवीए किसी इकॉनमी में वस्तुओं और सेवाओं के मूल्य का पैमाना होता है. इसमें प्रोडक्ट टैक्स जोड़ने के बाद सब्सिडी घटाने से जीडीपी के आंकड़े प्राप्त होते हैं.
2016-17 की पहली दो तिमाही में जीवीए गिर कर 7.6 फ़ीसदी और 6.8 फ़ीसदी रह गया.
मोदी सरकार की कोशिशें
नोटबंदी वाली दोनों तिमाही में इसमें और गिरावट देखने को मिली और ये 6.7 फीसदी और 5.6 फीसदी रह गया.
इसलिए ये कहना कि नोटबंदी से इकॉनमी की रफ्तार सुस्त हुई, ग़लत है. बल्कि ये तो 8 नवंबर से पहले ही शुरू हो गया था.
नोटबंदी से पहले आई मंदी कई वजहों से थीं. इनमें दो ख़राब मॉनसून थे. बैंकों का फंसा हुआ कर्ज़ था जो फ़िलहाल सात लाख करोड़ से ज़्यादा है.
कर्ज़ से लदी कंपनियां और स्पेक्ट्रम और कोयला खदानों की नीलामी से आई बड़ी रकम थी, जो मोदी सरकार के पहले दो सालों में 3.5 लाख करोड़ से ज़्यादा थी.
यहां तक कि मॉरिशस, साइप्रस और सिंगापुर के रास्ते अवैध तरीके से आने वाला भारत का ही पैसा भी एक वजह था. इसे दूसरी तरह से भी देखा जा सकता है.
काला धन पर लगाम लगाने और प्राकृतिक संसाधन के आवंटन में करप्शन खत्म करने की मोदी सरकार की कोशिशों ने नोटबंदी के पहले ही इकॉनमी में वैध नकदी की कमी पैदा कर दी थी.
काला धन
इसलिए जब काला धन खत्म करने के लिए नोटबंदी की घोषणा की गई तो इकॉनमी पर कहीं ज़्यादा असर पड़ा.
नई करेंसी के चलन में आने से नकदी का संकट फ़िलहाल खत्म हो गया लगता है, लेकिन इकॉनमी के सामान्य कारोबार के लिए ज़रूरी वैध नकदी की कमी अभी भी महसूस हो रही है.
दूसरी वजह तो ये है कि 2016-17 के पहले मोदी सरकार महंगाई पर लगाम लगाने के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य को बढ़ाती रही. इसमें वो क़ामयाब भी रही.
लेकिन हकीक़त तो ये है कि 2016-17 में दी गई सरकारी रियायतों से पहले भारत ने दो ख़राब मॉनसून सीज़न देखे थे.
इसलिए नोटबंदी से पहले किसानों पर कर्ज़ की रकम बढ़ी हुई थी. इसलिए पिछले बरस जब मौसम मेहरबान था तो किसान बड़े मुनाफे की उम्मीद कर रहे थे.
यही वजह थी कि खरीफ की अच्छी फसल के बाद, उन्होंने रबी की बुआई के समय नकदी के संकट को नज़रअंदाज कर दिया.
किसानों को कर्ज़ माफ़ी
उन्होंने फसल की बुआई के लिए उधार लिया, यहां तक कि महाजनों से भी कर्ज़ भी जुटाया.
किसानों को उम्मीद थी कि खेती का अगला सीज़न भी उनके लिए फ़ायदा लेकर आएगा. लेकिन ये वो ख़्वाब था जिसे नोटबंदी के वार ने चकनाचूर कर दिया.
मोदी सरकार की नाकामी को इस बात से समझा जा सकता है कि उत्तर प्रदेश चुनाव जीतते ही किसान और खेतीबारी के सवालात मोदी सरकार की नज़र से दूर हो गए.
यूपी चुनावों से पहले बीजेपी ने किसानों से कर्ज़ माफ़ी का वादा किया था. इससे अंदाज़ा लगता है कि बीजेपी को नोटबंदी से किसानों पर पड़ने वाले असर का अंदाज़ा था.
उत्तर प्रदेश के किसानों की 36,000 करोड़ रुपये से ज़्यादा की कर्ज़ माफ़ी के बाद महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश में किसानों को गुस्सा भड़क गया और वे सड़कों पर उतर आए.
इसलिए जब मंडी में फसल की क़ीमतें गिरीं तो किसानों के गुस्से का बांध टूट गया.
लोकसभा चुनावों से पहले
उत्तर प्रदेश में कर्ज़ माफ़ी की मांग को स्वीकार कर लेने के बाद बीजेपी के पास दूसरे राज्यों में इसे नज़रअंदाज करने की कोई वजह नहीं रह गई थी.
महाराष्ट्र ने 30,000 करोड़ रुपये से ज़्यादा की कर्ज़ माफ़ी की घोषणा करने में बहुत देरी नहीं की.
छत्तीसगढ़ ब्याज़ पर छूट दे रहा है और केंद्र सरकार चार फ़ीसदी के ब्याज़ पर किसानों को कर्ज़ की पेशकश कर रही है.
दूसरे राज्यों से भी ऐसी मांगें उठ सकती हैं. गुजरात, मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में 2019 के लोकसभा चुनावों से पहले विधानसभा चुनाव हैं.
बैंक ऑफ अमरीका मेरिल लिंच का अनुमान है कि अगले लोकसभा चुनाव से पहले 2.57 लाख करोड़ रुपये की कर्ज़ माफ़ी की जाएगी.
तीसरी वजह ये हकीक़त है कि भारतीय किसानों की स्थिति बहेद ख़राब है क्योंकि फसलों की उत्पादकता बढ़ाने के नाम पर मामूली निवेश ही किया गया है.
कृषि क्षेत्र की समस्याएं
खेतों की जोत इतनी छोटी है कि उनमें बड़ा निवेश मुमकिन भी नहीं लगता है.
पिछली कृषि जनगणना के अनुसार, देश में दो हेक्टेयर से कम ज़मीन जोतने वाले छोटे और सीमांत किसान देश के खेतीहर समाज का 85 फ़ीसदी हिस्सा हैं.
ये तबका ज़्यादा अपने खाने के लिए अनाज पैदा करता है और जब ज़्यादा अनाज उत्पादन होता है और बाज़ार में बड़ी मात्रा में फसल पहुंचती है तो क़ीमतें गिरती हैं.
साल 2017 में कृषि क्षेत्र की समस्याएं एक बार फिर से सतह पर आई हैं और नोटबंदी ने हालात को थोड़ा और नाज़ुक बना दिया है.
भारत में किसानों को ग़रीबी के दलदल में धकेलने के लिए बड़े संकट की जरूरत नहीं होती.
जहां तक नोटबंदी की बात है, इसका असर एक ख़राब सूखे से ज़्यादा नहीं हुआ होगा. दुर्भाग्य से सूखे का दोष ऊपरवाले पर डाला जाता है जबकि नोटबंदी के साथ ऐसा नहीं है.
(ये लेखक के निजी विचार हैं.)
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