You’re viewing a text-only version of this website that uses less data. View the main version of the website including all images and videos.
नज़रिया: क्यों फूटा महाराष्ट्र में किसानों का गुस्सा?
- Author, जयदीप हर्दिकर
- पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार
क़रीब ढाई महीने पहले महाराष्ट्र के अहमदनगर जिले के पुणतांबा गांव की ग्राम सभा ने निर्णय लिया कि वहां के किसान हड़ताल करेंगे.
पुणतांबा अहमदनगर और नासिक ज़िलों के ठीक सीमा पर बसा बड़ा गाँव है. उस इलाके की वह एक बड़ी मंडी भी है. वहां किसान वो सब पैदा करते हैं जो आस-पास के छोटे-बड़े शहरों में रहने वाले मध्यम वर्ग की रोज़ की ज़रूरत की चीज़ें हैं, जैसे- सब्ज़ी, दूध, फल, वगैरह...
किसानों ने तय किया कि हड़ताल एक जून से शुरू होगी, ठीक बरसात आने से पहले.
उन्होंने तय किया कि 2017 में ख़रीफ़ की फ़सल में वे खेतों में बस अपनी ज़रूरत भर के लिए फ़सल उगाएंगे. शहरवासी अपनी ज़रूरतें ख़ुद देख लें.
इतने बड़े राज्य का एक गाँव अगर अपने खेतों में उत्पादन रोक भी दे तो शहरी बाज़ारों पर इसका क्या असर पड़ेगा?
हड़ताल
उस लिहाज़ से पुणतांबा का इरादा उनके अपने लिए ही नुकसानदेह था. लेकिन, हड़ताल पर जाने के उस निर्णय को सोशल और परंपरागत मीडिया के ज़रिए व्यक्त करने का मकसद व्यापक था.
मोदी सरकार मई में अपनी तीसरी सालगिरह मनाने जा रही थी. महाराष्ट्र में देवेंद्र फड़नवीस सरकार भी लगभग ढाई बरस पुरानी - यानी अपना आधा रास्ता तय कर चुकी थी.
लेकिन दोनों सरकारें 2014 में किसानों को दिए हुए अपने वादों से मुकर-सी गई थीं, ऐसा वहां के किसान और खेतिहर मज़दूरों का कहना था.
कई सालों बाद पिछले साल बरसात अच्छी हुई तो खेतों में उपज भी भरपूर हुई, लेकिन, आमदनी?
दीवाली का पर्व था. अभी नई पैदावार मंडी में बस पहुँचने ही वाली थी कि नवंबर में नोटबंदी ने सारे मंसूबों पर पानी फेर दिया.
इलाके में हरी सब्जी, टमाटर, सबके भाव इतने गिरे की लागत भी वसूल करना मुश्किल हो गया. सारी फसलों का और देशभर के सारे किसानों का यही हाल था. किसी भी उपज का उचित दाम नहीं मिला.
धान, गेहूं, अरहर, मिर्ची, गन्ना, चना, हरी सब्ज़ी, टमाटर, आलू - खेतों में बंपर फ़सल हुई, लेकिन मंडियों में मंदी छाई रही.
कर्ज़
पिछले दस साल में किसानों की हालत बद से बदतर होती गई है.
न्यूनतम समर्थन मूल्य में नाम मात्र की बढ़ोतरी हुई पर लागत मूल्य कई गुना बढ़ गया. किसान फिर एक बार क़र्ज़ में डूब गया.
उधर सातवें वेतन आयोग की सिफ़ारिशें लागू होने के बाद इस साल सरकारी कर्मचारियों की पगार बेतहाशा बढ़ी.
किसान देख पा रहा था कि उसकी आमदनी और एक छोटे सरकारी कर्मचारी के वेतन में कितना ज़्यादा अंतर है.
उत्तर प्रदेश में सरकार बनते ही योगी आदित्यनाथ ने किसानों का ऋण माफ़ करने की घोषणा कर दी. इधर महाराष्ट्र में मुख्यमंत्री का कहना है कि ऋण माफ़ कर देने से मामला नहीं सुलझेगा.
दो राज्य. दोनों में भाजपा की सरकार. लेकिन किसानों को लेकर अलग-अलग फ़ैसले.
पुणतांबा के किसानों ने तय किया वे चुप नहीं बैठेंगे.
सोशल मीडिया
किसान हड़ताल पर जा रहे हैं, यह बात सोशल मीडिया पर फैली. आस-पास के कुछ गाँव भी इसमें जुड़ते चले गए.
शेतकरी संघटना, अखिल भारतीय किसान संघ, मराठा क्रांति मोर्चा जैसे राज्य के 32 किसान संगठनों को लगा कि किसानों की बात में दम है और सरकार के ख़िलाफ़ मुहिम छेड़ने यह अच्छा मौका है.
ऐसा सोचकर उन्होंने भी इस हड़ताल को समर्थन दिया.
15 मई तक यह बात राज्य भर में फ़ैल गई. छोटे-मोटे कई नेता इससे जुड़ गए.
किसान क्रांति मोर्चा के नाम से ये सारे संगठन एकजुट हो गए. इनकी कई मांगें हैं. सबसे बड़ी मांग है पूर्ण कर्ज़ माफ़ी और न्यूनतम समर्थन मूल्य में बढ़ोतरी.
किसानों की हड़ताल का दूसरा लक्ष्य यह भी था कि शहरों में जाने वाले कृषि उपज को वहां न पहुंचने दिया जाए. किसानों ने एक तरह से नाकेबंदी और अपनी ताकत के प्रदर्शन का फ़ैसला ले लिया.
विरोधी दल कांग्रेस और शरद पवार की राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी राज्य सरकार के ख़िलाफ़ किसानों की इस मुहिम से दूर नहीं रह पाए.
शिवसेना जो कि भाजपा सरकार के साथ है, वह भी हड़ताल के समर्थन में उतर गई.
विदर्भ और मराठवाड़ा तो वैसे ही बदहाल हैं. यहाँ किसानों को मनाने की ज़रूरत नहीं पड़ी.
यहाँ के किसान दो दशक से कृषि संकट का सामना कर रहे हैं. मंदी क्या होती है, यहाँ का किसान जानता है.
मामला इतना बड़ा हो गया कि तीन साल का धैर्य और बरसों से इकट्ठा हो रहा किसानों का गुस्सा फूट पड़ा. देश की आर्थिक प्रगति में हम बहुत पीछे रह गए हैं - यह इस आंदोलन को देखकर समझा जा सकता है.
चेहरा विहीन नेतृत्व
इस आंदोलन की दो प्रमुख बातें हैं. एक तो इसका कोई चेहरा नहीं. इसका नेतृत्व कई किसान कर रहे हैं. दूसरे, यह आंदोलन उत्तर और पश्चिम महाराष्ट्र के किसानों ने शुरू किया है न कि विदर्भ या मराठवाड़ा के अकाल और पानी के संकट से जूझते सीमांत किसानों ने.
ये इस बात का भी संकेत है कि कृषि संकट अब गन्ना, सब्ज़ी, फल और दूध पैदा करने वाले किसानों पर भी मंडराने लगा है.
पिछले दो दिन तक चली हड़ताल कहीं-कहीं हिंसक हो गई. कई जगह तो रास्तों पर दूध फेंका गया. नासिक जो प्याज़ की उपज के लिए देश भर में जाना जाता है, वहां प्याज़ सड़कों पर बिखरा नज़र आया. इस हड़ताल का राज्य की मंडियों पर खासा असर पड़ा.
गांवों से शहरों में आने वाला माल रुक गया. मुंबई, पुणे और नासिक जैसी बड़ी मंडियां प्रभावित हुईं. दो जून को दूध के टैंकर पुलिस बंदोबस्त में नासिक और कोल्हापुर से मुंबई लाए गए.
शनिवार सुबह मुख्यमंत्री देवेंद्र फ़ड़नवीस के साथ देर रात तक चली बातचीत के बाद किसान क्रांति मोर्चा की कोर टीम ने आंदोलन स्थगित करने का फ़ैसला लिया है. उनका कहना था कि सरकार ने उनकी अधिकतर मांगें मान ली हैं और उन्हें एक निश्चित समय-सीमा में पूरी करने का आश्वासन दिया है.
उसमें राज्य के सारे सीमान्त किसानों की ऋण माफ़ी की बात कही गई है.
हड़ताल निलंबित
किसान मोर्चा ने अब पांच जून, 2017 को राज्यव्यापी हड़ताल की कॉल वापस ले ली है. हालांकि कुछ संगठन इस मुद्दे पर सहमत नहीं हैं.
मामला इतना नहीं बढ़ता अगर भाजपा सरकार और उसके नेता अपनी ज़बान पर काबू रखते.
पार्टी के एक बड़े नेता ने अभी हाल में कह दिया कि, ''किसान हड़ताल पर जाते हैं तो इससे हमें कोई फर्क नहीं पड़ता. यहाँ से नहीं तो दूसरे देशों से कृषि उपज आ जाएगी.''
मुख्यमंत्री फ़ड़नवीस का कहना है कि उनकी सरकार कर्ज़ माफ़ी की संभावनाओं का अध्ययन कर रही है और उचित समय पर निर्णय ले लिया जाएगा. हालांकि पूरी ऋण माफ़ी संभव नहीं है.
महाराष्ट्र में इस साल अरहर की भारी पैदावार हुई है, लेकिन किसानों को इसका न्यूनतम मूल्य नहीं मिल पा रहा है. अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में दाम गिरे हैं.
सरकार अरहर खरीदने के लिए बहुत देर से बाज़ार में उतरी. तब तक कम मूल्य में किसान अपनी आधी फ़सल व्यापारियों को बेच चुके थे.
आज भी हज़ारों टन माल बाज़ारों में पड़ा हुआ है. जहां सरकार द्वारा खरीदारी कर चुकी है वहां किसानों को पैसे कब मिल पाएंगे इसे बारे में पक्की जानकारी नहीं.
राजनीतिक पहलू
इस आंदोलन के पीछे एक राजनीतिक पहलू भी है. भाजपा सरकार में एक छोटा दल 'स्वाभिमानी शेतकरी संघटना' शामिल है.
उसकी अगुवाई लोकसभा सांसद राजू शेट्टी करते हैं. भाजपा ने अब उसमें फूट डाल दी है.
शेट्टी के साथी सदाभाऊ खोत जो सोलापुर ज़िले के हैं, वो महाराष्ट्र की देवेंद्र फड़नवीस सरकार में कृषि राज्य मंत्री हैं.
ऐसी अटकलें हैं कि सदाभाऊ जल्द ही भाजपा में शामिल हो जाएंगे. शेट्टी आहत इस बात से भी हैं कि उनकी 'आत्म-क्लेश' पैदल यात्रा में सदाभाऊ शामिल नहीं हुए.
शेट्टी दोनों सरकार के वादाख़िलाफ़ी आंदोलन में भी शामिल हैं और धीरे-धीरे शिवसेना के क़रीब जाते दिख रहे हैं.
भाजपा और शिवसेना का प्रेम दुनिया को पता है. शरद जोशी का शेतकरी संगठन अब छोटे-छोटे गुट में बंट गया है. वे सारे अब धीरे-धीरे सरकार के ख़िलाफ़ होते जा रहे हैं. 2014 में लोकसभा और विधानसभा चुनावों में छोटे-बड़े सभी किसान संगठनों ने भाजपा को भारी समर्थन दिया था, इस आशा में कि मोदी फ़सलों के न्यूनतम मूल्य में बढ़ोतरी करेंगे.
साल 2007 में 'एम एस स्वामीनाथन किसान आयोग' ने सिफारिश की थी कि - फ़सल उत्पादन मूल्य से पचास प्रतिशत ज़्यादा दाम किसानों को मिले. इस अहम सिफ़ारिश को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने वादे के मुताबिक ही लागू करेंगे.
(जयदीप हर्डीकर नागपुर स्थित पत्रकार हैं. वो 'यहाँ एक गाँव था' (पेंग्विन, 2013) किताब के लेखक हैं.)
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)