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#UnseenKashmir: 'पत्थरबाज़ लड़कियों पर सेना ने फ़ायरिंग क्यों की?'
प्यारी दुआ,
मैं यहां पर बिल्कुल ठीक हूं और मेरा परिवार भी अच्छा है. अभी मेरे घर में मेरी बुआ आईं हुई हैं.
समर्थ भी बिल्कुल ठीक है, लेकिन उसकी शैतानियां अभी भी कम नहीं हुई हैं.
उम्मीद है तुम और तुम्हारा परिवार भी ठीक होगा.
पिछले पत्र में लिखी तुम्हारी बातों से ये ज़ाहिर होता है कि हमारा समाज, चाहे वो दिल्ली हो या कश्मीर या फिर देश का कोई और हिस्सा, लड़कियों के लिए उतना सुरक्षित नहीं है.
हां, दिल्ली में कुछ लड़कियां 'सेल्फ डिफेंस' की चीज़ें रखती हैं. फिर भी लड़कियों पर अत्याचार कम नहीं होता है.
अभी हाल में हरियाणा में 'निर्भया' की तरह एक घटना दोहराई गई है.
देखा जाए तो भारत का कोई भी शहर सुरक्षित नहीं है.
'पत्थरबाज़ लड़कियों' की कहानी सुनकर मुझे यह समझ नहीं आया कि आर्मी ने उन लड़कियों पर हमला क्यों किया?
आर्मी तो हमारी सुरक्षा के लिए होती है ना?
मैं तुम्हें बताना चाहती हूं कि अगर मैं ऐसी हालत में फंस जाती, तो मैं भी कुछ ऐसा ही करती अपनी सुरक्षा के लिए.
तुमने मुझसे दिल्ली की ज़िंदगी के बारे में पूछा था, तो मैं तुम्हें बताना चाहती हूं कि यहां की ज़िंदगी एकदम मस्त है.
रमज़ान शुरू हो चुका है. इन दिनों पुरानी दिल्ली में काफ़ी रौनक रहती है. वैसे इंडिया गेट भी आधी रात तक गुलज़ार रहता है.
दिल्ली में इंटरनेट और बाकी संचार माध्यमों के बिना ज़िंदगी की कल्पना नहीं कर सकते.
मुझे बहुत दुख है कि कश्मीर में लोगों को इतनी बुरी हालत से गुज़रना पड़ता है.
लेकिन इन हालातों के लिए कुछ दंगा करने वाले लोग ही ज़िम्मेदार हैं या कुछ और बात है?
अगर वहां के लोगों को इतनी परेशानी होती है, तो फिर इंटरनेट और सोशल मीडिया बंद क्यों किया जाता है?
मैंने न्यूज़पेपर में पढ़ा था कि 16 साल के एक लड़के ने 'काशबुक' नाम से सोशल मीडिया 'ऐप' बनाया है.
क्या तुम भी इसे इस्तेमाल करती हो या फिर तुम्हारा कोई जानकार इसे इस्तेमाल करता है?
क्या कश्मीरी अवाम इन हालातों से ऊब नहीं गई है?
तुम्हारे जवाब के इंतज़ार में...
तुम्हारी दोस्त,
सौम्या
क्या आपने कभी सोचा है कि दशकों से तनाव और हिंसा का केंद्र रही कश्मीर घाटी में बड़ी हो रहीं लड़कियों और बाक़ि भारत में रहनेवाली लड़कियों की ज़िंदगी कितनी एक जैसी और कितनी अलग होगी?
यही समझने के लिए हमने वादी में रह रही दुआ और दिल्ली में रह रही सौम्या को एक दूसरे से ख़त लिखने को कहा. सौम्या और दुआ कभी एक दूसरे से नहीं मिले.
उन्होंने एक-दूसरे की ज़िंदगी को पिछले डेढ़ महीने में इन ख़तों से ही जाना.
श्रीनगर से दुआ का तीसरा ख़त आप पढ़ चुके हैं.
ये था उसपर दिल्ली से सौम्या का जवाब.
(ख़तों की यह विशेष कड़ी इस हफ़्ते जारी रहेगी)
(रिपोर्टर/प्रोड्यूसर: बीबीसी संवाददाता दिव्या आर्य)
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