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#UnseenKashmir: 'क्या पत्थरबाज़ लड़कियों के साथ ज़्यादती हो रही है'?
प्रिय दुआ
मुझे तुम्हारा पत्र मिला. कैसी हो तुम? अवीन कैसा है?
दिल्ली में अभी गर्मियों की छुट्टियां चल रही हैं और मैं अभी दस दिन के लिए दिल्ली से बाहर मधुबनी, बिहार गयी थी जहां मेरे फूफेरे भाई की शादी थी.
बिहार में न ज़्यादा गर्मी थी और न ज़्यादा ठंड. वहां बस बिजली की दिक्कत होती थी.
श्रीनगर से दुआ का दूसरा ख़त
फिर भी मुझे दिल्ली की भागदौड़ से हट कर कुछ दिन बिताना अच्छा लगा.
क्या तुम्हारा भी कोई गांव है और वहां जाने का अवसर तुम्हें प्राप्त हुआ है? मैं यह जानना चाहूंगी कि तुम्हें अपने गांव जाकर कैसा महसूस होता है?
तुमने दसवीं में विषय चुनने के बारे में मेरी राय पूछी थी. वैसे तो दिल्ली में विषय दसवीं के बाद चुना जाता है और मैं विज्ञान पढ़ना चाहती हूं.
तुम जो चाहो वह विषय ले सकती हो, लेकिन मेरे हिसाब से विज्ञान पढ़ने से अवसर ज़्यादा मिलते हैं. मेरी राय में विषय वही लेना चाहिए जिसमें अपनी रूचि हो.
आजकल कश्मीर काफी सुर्खियों में है 'पत्थरबाज़ लड़कियों' के कारण.
क्या इसके बारे में तुम बता सकती हो कि ऐसा लड़कियां क्यों कर रही हैं? क्या सही मायने में उनके साथ ज़्यादती हो रही है?
यह भी अक्सर सुनने में आता है कि स्कूल कॉलेज बंद कर दिए जाते हैं और इंटरनेट सेवा भी बंद कर दी जाती है.
जब स्कूल-कॉलेज बंद हो जाते हैं तो पढ़ाई कैसे पूरी होती है? और जब इंटरनेट सेवा बंद कर दी जाती है तो तुम अपने दोस्तों से कैसे संपर्क में रहती हो और सोशल मीडिया से कैसे जुड़ी रहती हो?
मैं तो यहां अपने दोस्तों के संपर्क में रह सकती हूं और कहीं भी घूमने-फिरने जा सकती हूं और वह भी बिना किसी रोक-टोक के. सामान्य रूप से यहां लड़के-लड़कियां साथ साथ घूम फिर सकते हैं.
जब पिछले पत्र में तुमने अपने दोस्तों के बारे में बताया था तभी मेरे दिमाग़ में यह बात आई थी कि तुम्हारी मित्र-मंडली में कोई लड़का क्यों नहीं है?
तो मेरी यह जिज्ञासा है कि क्या वहां लड़के-लड़कियां अलग-अलग ही रहते हैं या यह तुम्हारी अपनी पसंद है?
तुम्हारे जवाब के इंतज़ार में
तुम्हारी दोस्त
सौम्या
क्या आपने कभी सोचा है कि दशकों से तनाव और हिंसा का केंद्र रही कश्मीर घाटी में बड़ी हो रहीं लड़कियों और बाक़ी भारत में रहनेवाली लड़कियों की ज़िंदगी कितनी एक जैसी और कितनी अलग होगी?
यही समझने के लिए हमने वादी में रह रही दुआ और दिल्ली में रह रही सौम्या को एक दूसरे से ख़त लिखने को कहा. सौम्या और दुआ कभी एक दूसरे से नहीं मिले.
उन्होंने एक-दूसरे की ज़िंदगी को पिछले डेढ़ महीने में इन ख़तों से ही जाना. आपने श्रीनगर से दुआ का पहला ख़त, उस पर सौम्या का जवाब और फिर दुआ का दूसरा ख़त पढ़ा, अब पढ़ें दिल्ली से सौम्या का दूसरा ख़त.
(ख़तों की ये विशेष कड़ी इस हफ़्ते जारी रहेगी)
(रिपोर्टर/प्रोड्यूसर - बीबीसी संवाददाता दिव्या आर्य)
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