मीडिया को क्यों नहीं दिखता दलितों का संघर्ष?
- Author, मुकेश कुमार
- पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार
सहारनपुर में दलितों पर हो रहे अत्याचारों के ख़िलाफ़ दिल्ली में जंतर-मंतर पर प्रदर्शन में कितने लोग जुटे थे? पाँच हज़ार, दस हज़ार, पचास हज़ार या एक लाख?
मीडिया के महाविस्तार के इस युग में इस सवाल का जवाब आसानी से मिल जाना चाहिए, मगर नहीं मिलेगा.
वज़ह यही है कि सच को देखने के मीडिया में चश्मे अलग-अलग हैं.
ख़ास तौर पर अगर वह सच दलितों, आदिवासियों और अल्पसंख्यकों के पक्ष में और सवर्णों तथा उग्र हिंदुओं के ख़िलाफ.
हुआ तब तो उसे बताने की कृपा मीडिया नहीं ही करेगा. यही वजह है कि मीडिया के बड़े हिस्से ने जंतर-मंतर के प्रदर्शनकारियों की संख्या को कम करके बताया.
भीम आर्मी
उनकी नज़र में पाँच-दस हज़ार लोग थे, जबकि भीड़ के दृश्यों को देखकर कोई भी बता सकता है कि संख्या इससे कहीं ज़्यादा रही होगी.
लेकिन मीडिया ने यही नहीं किया बल्कि इस प्रदर्शन को अंडरप्ले भी किया. अधिकांश चैनलों पर ये विशाल प्रदर्शन बड़ी ख़बर नहीं बनी, जबकि इसमें पूरी गुंज़ाइश थी.
पुलिस द्वारा पचीस से अधिक मामले दर्ज़ किए जाने के बाद फरार चल रहे भीम आर्मी के नेता चंद्रशेखर ने इसमें शामिल होने की घोषणा की थी और ये अपने आप में एक दिलचस्प घटना थी.
लेकिन मीडिया को उसमें कुछ भी ख़ास नहीं दिखा. उन्होंने इसे आम ख़बर की तरह लिया और हल्के-फुल्के ढंग से दिखाकर निपटा दिया.
न तो इस ख़बर पर कोई बड़ी बहस करवाई और न ही दलितों की हालत पर चिंता जताई.
आईपीएल फ़ाइनल
ये भी नहीं बताया कि चंद्रशेखर ने दलितों को जागने और फासीवाद से लड़ने के बारे में क्या कहा. अख़बारों का रवैया भी कुछ अलग नहीं था.
उन्होंने भी उसे अंदर के पन्नों में फेंक दिया. उनकी दिलचस्पी राजनाथ सिंह के घिसे-पिटे बयान या आईपीएल के फाइनल में अधिक थी.
एक अख़बार की सुर्खी तो ये बता रही थी कि दलित अपने फरार नेता के साथ खड़ा होने के लिए इकट्ठी हुई थी.
लेकिन ये पहला मौक़ा नहीं है जब दलितों के प्रदर्शन को मीडिया ने अनदेखा किया या फिर उसे बहुत ही कम कवरेज दिया. लोग इसके कारण भी जानते हैं.
मीडिया के स्वामियों और उसमें काम करने वालों की सामाजिक-जातीय पृष्ठभूमि में इसकी सचाई छिपी हुई है.

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ऊंची जातियों का वर्चस्व
ये तो सर्वविदित है कि मीडिया में तथाकथित ऊंची जातियों का वर्चस्व है और वे कमज़ोर जातियों से जुड़ी ख़बरों को हमेशा से नज़रअंदाज़ करती हैं.
पत्रकारों की जातिगत निष्ठा भी उसी तरह से पक्की है जैसी कि दूसरे पेशों में.
पाँच मई को सहारनपुर मे दलितों पर ठाकुर बिरादरी के लोगों ने हमला बोला था और पचासों घरों को फूँक डाला था. उसके बाद भी उन्हें धमकाने की हरकतें जारी हैं.
उत्तरप्रदेश पुलिस और प्रशासन भी उनके पक्ष में खड़ा है. मगर इस सबकी बहुत कम रिपोर्टिंग मीडिया में हो रही है.
सच तो ये है कि योगी आदित्यनाथ के मुख्यमंत्री बनने के बाद से दलितों पर अत्याचारों में तेज़ी से बढोतरी आई है, मगर मीडिया इसको लेकर चुप है.

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केंद्र सरकार
क्या इसलिए कि वह यूपी में सवर्ण के नेतृत्व और सोच वाली सरकार के साथ है?
मानने वाले तो ये भी मानते हैं कि मीडिया दलितों के मामलों को दफ़नाने में जुटा हुआ है ताकि केंद्र सरकार के लिए कोई धर्मसंकट न खड़ा हो.
रोहित वेमुला और उना के मामले में उसकी पहले ही काफी छीछालेदर हो चुकी है. फिर आशंका ये भी है कि दलितों का उभार उसकी राजनीति को पटरी से उतार सकता है.
वह हिंदुत्व के छाते के तले सभी जातियों को जोड़ना चाहती है मगर सवर्णों को नाराज़ किए बगैर.
यानी हिंदू एकता के नाम पर दलित अपनी जगह पर बने रहें, अत्याचार सहते रहें.

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सोशल मीडिया
दलित भी मीडिया के इस चरित्र से परिचित हैं इसलिए वे इसे मनुवादी मीडिया या मनुस्ट्रीम मीडिया कहते हैं. वे अब उससे कोई अपेक्षा भी शायद नहीं रखते.
इसलिए मीडिया के जातिवादी चरित्र पर प्रहार तो करते हैं मगर उससे कोई माँग नहीं करते.
यही नहीं, दलित आंदोलनकारियों ने सोशल मीडिया को अपना हथियार बना लिया है.
यही वजह है कि सोशल मीडिया में दलितों की पीड़ा और दमन को ज़्यादा जगह मिलती है. वे वहाँ अपनी आवाज़ भी जमकर बुलंद कर रहे हैं.
उन्होंने अपनी कई वेबसाइट शुरू कर दी हैं, जो दलितों के मसलों को बढ़-चढ़कर प्रस्तुत कर रही हैं. सोशल मीडिया का विमर्श भी जंतर-मंतर के साथ अधिक दिखता है.
मुख्यधारा का मीडिया
हालांकि सवर्ण मानसिकता को लोगों की वहाँ भी कमी नहीं है और वे दलितों एवं उनके समर्थकों के ख़िलाफ़ जमकर विष-वमन करते रहते हैं.
मगर कम से कम दलित यहां स्वतंत्रता के साथ अपना पक्ष तो रख पा रहे हैं.
इसका सबसे बड़ा असर ये पड़ा है कि मुख्यधारा का मीडिया बुरी तरह बेनकाब हुआ है और लगातार हो रहा है.
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