बोफ़ोर्स के बाद भारतीय तोपखाने में अमरीकी तोपों में क्या ख़ास

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तीन दशक में पहली बार भारतीय सेना को दो अत्याधुनिक एम 777 अल्ट्रा लाइट हॉविट्ज़र तोपें मिली हैं.
बोफ़ोर्स के बाद ये पहली बार है जब भारतीय सेना के तोपखाने में नई तोपें शामिल की जा रही हैं.
अमरीका के साथ हुए सौदे के मुताबिक एम-777 अल्ट्रा लाइट हॉवित्ज़र तोपें गुरुवार को भारत पहुंच गईं.
रक्षा विशेषज्ञ राहुल बेदी ने बीबीसी संवाददाता संदीप सोनी के साथ बातचीत में बताया कि ये भारत-अमरीका के बीच हुए 145 तोपों के सौदे के तहत भारत को मिली हैं.
इन्हें चीन के पास सीमाई इलाकों में तैनात करने की योजना है.
ये तोप एयर ट्रांसपोर्टेबल हैं, यानी इन्हें हेलिकॉप्टर से सीमा तक ले जाया सकता है.
इन ख़ास हेलिकॉप्टर को भी भारत ने अमरीका से दो साल पहले खरीदा है जो आने वाले डेढ़ साल में भारत को मिल जाएंगे.
अभी फ़िलहाल दो तोपें भारत आई हैं. इन्हें आने वाले एक हफ्ते या दस दिन में पोखरण भेजा जाएगा जहां उनकी टेस्टिंग होगी.
फिर सेना की आर्टिलरी यूनिट्स को प्रशिक्षण दिया जाएगा.
राहुल बेदी कहते हैं कि 2019 में इन तोपों की डिलिवरी शुरू कर दी जाएगी, जिसके बाद 2021 तक 145 तोपें भारतीय सेना में शामिल कर ली जाएंगी.
बोफ़ोर्स की तुलना में कैसी हैं ये तोप ?
भारत ने बोफ़ोर्स तोप 1986-1987 में ली थीं. उसके मुकाबले में ये नई तोप काफ़ी एडवांस्ड है.
इसे लाइटवेट हॉवित्ज़र कहा जाता है. इसकी मारक क्षमता 30-35 किलोमीटर तक की है.

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राहुल बेदी कहते हैं कि चीन के साथ विवादित सीमा जैसे कि उत्तर पूर्व भारत और लद्दाख जैसे इलाकों में इनकी तैनाती की जाएगी.
भारतीय सेना का अनुमान है कि इन तोपों की संख्या 145 तक नहीं रुकेगी, ये 300 से 400 तक जा सकती है लेकिन अभी इस पर कोई फ़ैसला नहीं हुआ है.
भारत की ताकत पाक और चीन के मुकाबले कहां?
भारतीय सेना का तोपखाना काफ़ी पुराना हो चुका है और उसे बदलने में काफ़ी देर हो चुकी है.
आने वाले समय के लिए करीब एक सप्ताह पहले सेल्फ़ प्रोपेल्ड हॉवित्ज़र का समझौता भी किया गया है.
सेल्फ़ प्रोपेल्ड हॉवित्ज़र टैंक जैसी तोप है.

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इसके अलावा लोकल ऑर्डिनेंस फ़ैक्ट्री बोर्ड से 140 तोप ख़रीदने की योजना भी बनाई गई है.
आधुनिकीकरण में देरी
हालांकि भारतीय सेना के तोपखाने के आधुनिकीकरण में दस साल की देरी हो चुकी है लेकिन हथियारों के आधुनिकीकरण का कार्यक्रम धीरे-धीरे ही सही शुरू तो हुआ है.

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राहुल बेदी कहते हैं कि अमरीकी सरकार के विदेशी सैन्य विक्रय कार्यक्रम के तहत ये सौदा किया गया है जिसमें हथियारों की खरीद का सौदा सीधे दोनों देशों की सरकारों के बीच होता है.
उनके मुताबिक इसलिए इसमें विवाद की संभावना न के बराबर होती है.
(बीबीसी संवाददाता संदीप सोनी से रक्षा विशेषज्ञ राहुल बेदी की बातचीत पर आधारित.)
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