You’re viewing a text-only version of this website that uses less data. View the main version of the website including all images and videos.
नज़रिया: जब सिखों को उंगलियों के निशान देने को मजबूर किया गया
- Author, राजेश जोशी
- पदनाम, रेडियो संपादक, बीबीसी हिंदी
1984 के दंगों के कुछ बरस बाद दिल्ली पुलिस की स्पेशल ब्रांच ने बहुत ही ख़ामोशी से एक अभियान शुरू किया जिसके तहत ढेरों सिख नौजवानों को मजबूर करके उनकी उंगलियों और हथेलियों के निशान इकट्ठा करके पुलिस रिकॉर्ड में रखे जाते थे.
मामूली झगड़े या मारपीट के मामलों में पुलिस की निगाह में आए कई सिख लड़कों को मजबूरन इस प्रक्रिया से गुज़रना पड़ा था. वो ख़ालिस्तानी अलगाववाद का हिंसक दौर था और कुछ ही बरस पहले प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी की हत्या के बाद दिल्ली शहर में फैले दंगों में सैकड़ों सिख मर्दों, औरतों और बच्चों को मार डाला गया था.
शहर में शक और दहशत का माहौल रहता था. नीली या पीली पगड़ी वाले सिखों को देखते ही उन पर ख़ालिस्तानी होने का शक किया जाता था. शाम छह बजे के बाद कनॉट प्लेस जैसे इलाक़े में दुकानें बंद हो जाती थीं, दिन और रात शहर की सड़कों पर पुलिस नाक़े लगाकर रखती थी.
वो चौरासी के दंगे
इसके बावजूद कभी भीड़ भरी बसों में बम विस्फोट होते रहते थे, कभी साइकिल बम तो कभी रेडियो बम की चपेट में आकर मारे गए लोगों या घायलों की तस्वीरों से अख़बार भरे रहते थे.
चौरासी के दंगों में हुई क़त्लो-गारत और उसके बाद बरसों तक चले घोर अन्याय ने ऐसे कई सिख नौजवानों को चरमपंथियों में बदल दिया जो उससे पहले आम तौर पर छोटा मोटा धंधा करके कमाई किया करते थे, खिलाड़ी बनने, फ़ौज में जाने या कोई दूसरी नौकरी करने के सपने देखते थे.
सुरजीत सिंह पेंटा, टायरवाला, कराटेवाला और ऐसे ही कई नाम उस दौर में उभरे थे. ये सिख नौजवान चौरासी के दंगों के बाद हिंसा और आतंक की अंधी सुरंगों में फँस गए. पेंटा एक होनहार खिलाड़ी और सौ मीटर की रेस का चैंपियन था.
चौरासी के दंगों में दिल्ली की सड़कों पर हुए हिंसा के तांडव को उसने भी देखा और भुगता था. बाद में वो भिंडराँवाला टाइगर्स फ़ोर्स में शामिल हो गया और एक रात क्रिकेट का बैट रखने वाले बैग में एके-47 राइफ़ल लेकर दिल्ली आया और एक भीड़ भरे इलाके में ताबड़तोड़ गोलियाँ चलाकर 14 निर्दोष लोगों की हत्या कर दी और फ़रार हो गया. फिर 1988 में अमृतसर के स्वर्ण मंदिर में पुलिस और राष्ट्रीय सुरक्षा गार्ड्स के एक ऑपरेशन में घिर जाने पर उसने पोटैशियम साइनायड का कैपसूल निगल कर जान दे दी.
ये सिलसिला नब्बे के दशक के शुरुआती दौर तक चलता रहा और इसी में हमारा एक क़रीबी दोस्त और सहकर्मी रिपोर्टर अनंत डबराल भी मारा गया. अनंत किसी ख़बर के सिलसिले में तीसहज़ारी अदालत पहुँचा था कि वहाँ एक बम विस्फोट हो गया और उससे निकला लोहे का एक तीखा टुकड़ा अनंत के माथे को छेदता हुआ उसके दिमाग़ के दूसरे हिस्से में जाकर अटक गया. चंद दिनों बाद उसकी जान चली गई.
दिल्ली पुलिस सिख किशोरों और नौजवानों की हथेलियों की छाप इसलिए ले रही थी ताकि अगर उनमें से कोई चरमपंथी संगठनों में शामिल हो तो उसके बारे में पूरी जानकारी रिकॉर्ड में मौजूद रहे. क़ानून की हिफ़ाज़त करने वाली एक एजेंसी पूरे सिख समुदाय को शक की नज़र से देख रही थी और मान कर चल रही थी कि उनमें से कोई भी आतंकवादी बन सकता है.
निशानदेही का अभियान
क़ानून की नज़र से बचकर चलाए जा रहे इस अभियान में 1930 के दशक में जर्मनी के यहूदियों की पहचान और निशानदेही के लिए चलाए गए अभियानों की झलक थी. ये बहुत मेहनत का काम था और इसमें कई तरह के ख़तरे शामिल थे — नागरिक अधिकार संगठन इसका विरोध कर सकते थे, सिख समुदाय इसके ख़िलाफ़ आवाज़ उठा सकता था और तब पुलिस को बदनामी का थोड़ा बहुत डर भी हुआ करता था.
फिर भी पुलिस को ये मेहनत इसलिए करनी पड़ रही थी क्योंकि उस दौर में आधार कार्ड नहीं था. अब पुलिस और ख़ुफ़िया एजेंसियों को ऐसा गुप्त अभियान चलाने की कोई ज़रूरत नहीं है.
अब बाक़ायदा क़ानून के ज़रिए वोट के ज़रिए चुनी गई केंद्र सरकार इस देश में रहने वाले हर नागरिक की हथेलियों के निशान और आँखों की पुतलियों की तस्वीरें अपने रिकॉर्ड में रख रही है. और नागरिकों की ये प्रोफ़ाइलिंग ग़रीबों को सरकारी योजनाओं का फ़ायदा पहुँचाने के नाम पर हो रही है.
आधार कार्ड को हर मर्ज़ की दवा के तौर पर पेश करने का काम काँग्रेस की मनमोहन सिंह सरकार ने शुरू किया था और अब नरेंद्र मोदी सरकार इसे दोगुने उत्साह के साथ क़ानूनी आधार देकर लागू करने पर आमादा है.
केंद्र सरकार के वकील मुकुल रोहतगी ने सुप्रीम कोर्ट में आधार को चुनौती देने वाली याचिकाओं की सुनवाई के दौरान जो तर्क दिए वो ख़तरनाक हैं.
रोहतगी ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि नागरिकों को अपने शरीर पर मुकम्मल अधिकार है ही नहीं. यानी विशेष परिस्थितियों में नागरिकों से ये अधिकार छीना जा सकता है और अगर सरकार चाहे तो कभी भी आपसे आपके शरीर पर हक़ को छीन सकती है. मसलन, हत्या के अपराधी को राज्य फाँसी पर चढ़ा सकता है या गर्भपात करवाना चाह रही महिला को अदालत ऐसा न करने का आदेश दे सकती है.
आधार से होने वाली मुश्किलें
यूपीए सरकार के दौरान आधार कार्ड का विचार लाने वाले नंदन निलेकणी कहते हैं कि हाथ के निशान और आँखों की पुतलियों की छाप लिए जाने को निजता का उल्लंघन बताने वाले बोगस तर्क दे रहे हैं क्योंकि सबसे पहले आपकी प्राइवेसी या निजता का दुश्मन आपका स्मार्ट फ़ोन है जिसके ज़रिए आपके हर क़दम, हर गतिविधि की टोह ली जा सकती है.
जब आप उसके प्रति चिंतित नहीं हैं तो आधार कार्ड को लेकर आशंका कैसी?
एक तर्क ये भी दिया गया है कि वीज़ा लेने या पासपोर्ट के लिए अंगुलियों के निशान देने में जब कोई एतराज़ नहीं होता तो फिर आधार कार्ड पर एतराज़ कैसा?
रोहतगी और निलेकणी ये नहीं बताते कि पासपोर्ट और वीज़ा के लिए अपनी उंगलियों के निशान देना या स्मार्ट फ़ोन ख़रीदना एक स्वतंत्र नागरिक की स्वतंत्र इच्छा पर निर्भर है. अगर किसी को अपनी उंगलियों के निशान देना गवारा नहीं तो उसे पासपोर्ट या वीज़ा लेने के लिए कोई मजबूर नहीं कर सकता.
अगर एक नागरिक अपनी हर हरकत या गतिविधि के बारे में जानकारी सार्वजनिक नहीं करना चाहता तो उसे स्मार्ट फ़ोन न ख़रीदने की आज़ादी है. मेरी राय में इसके लिए कोई सरकार, कोई संविधान, कोई अदालत, कोई पुलिस या कोई हाकिम उसे मजबूर नहीं कर सकता.
क्या है सरकार का इरादा?
मजबूरी में और अपनी इच्छा से किए गए काम में बहुत साफ़ साफ़ अंतर है. आधार कार्ड को इनकम टैक्स और पैन कार्ड से जोड़कर भारत सरकार इस अंतर को मिटाना चाहती है और इसके ज़रिए हर एक नागरिक पर एक अदृश्य, लेकिन क़ानूनी नज़र रखना चाहती है.
इसे सख़्ती से लागू करने में उसे किसी बड़ी रुकावट का सामना भी नहीं करना पड़ रहा है क्योंकि 'निजता' या प्राइवेसी के मुद्दों पर आम भारतीय नागरिक में आम तौर पर उदासीनता का रवैया रहता है. यहाँ तक कि पढ़े लिखे, खाते पीते शहरी मध्यवर्ग में भी ये उदासीनता गहरे पैठी हुई है.
मेरे बहुत से परिचितों ने आधार पर हुई बातचीत के दौरान मुझसे बार बार कहा है कि 'आँखों की पुतलियों की छाप और उंगलियों के निशान लेकर सरकार हमारा क्या कर लेगी?' जब आधार कार्ड संबंधी जानकारी के लीक होने पर भी 'क्या फ़र्क़ पड़ता है' वाला भाव ज़्यादा रहता है.
पर क्या अपने शरीर का अधिकार सरकार को सौंप देने से वाक़ई कुछ फ़र्क़ नहीं पड़ता? एक नागरिक के तौर पर क़ुदरतन जो अधिकार आपको मिले होते हैं, उन्हें एक एक करके राज्य को सौंप देने से कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता?
अगर अस्सी के दशक में दिल्ली पुलिस ग़ैरक़ानूनी तौर पर आम सिख नौजवानों की प्रोफ़ाइलिंग कर सकती थी तो ये कैसे माना जा सकता है कि इक्कीसवीं सदी के दूसरे दशक में मुसलमानों, ईसाइयों, दलितों, कश्मीरियों, आदिवासियों, उत्तर-पूर्वी प्रदेश के लोगों की प्रोफ़ाइलिंग नहीं की जा सकती है?
और ये भी कि इन समुदायों के बारे में सरकारी डेटाबेस में रखी जानकारी का कभी किसी तरह का दुरुपयोग नहीं होगा?
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)