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भारत में कब हुई थी रेप के मामले में आख़िरी फांसी
भारत के सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को निर्भया बलात्कार मामले में चार दोषियों की फांसी बरकरार रखी है.
निचली अदालत ने मुकेश, पवन, विनय शर्मा और अक्षय कुमार सिंह को मौत की सज़ा सुनाई थी जिसे दिल्ली हाई कोर्ट ने बरकरार रखा था.
हालांकि भारत में पिछली फांसी 1993 के मुंबई धमाकों के दोषी याकूब मेमन को जुलाई 2015 में दी गई थी, लेकिन बलात्कार के मामले में आख़िरी बार फांसी 2004 में पश्चिम बंगाल के धनंजय चटर्जी को दी गई थी.
कोलकाता में एक 15 वर्षीय स्कूली छात्रा के साथ बलात्कार और उसकी हत्या के मुजरिम धनंजय चटर्जी को 14 अगस्त 2004 को तड़के साढ़े चार बजे फांसी पर लटका दिया गया था.
14 साल तक चले मुक़दमे और विभिन्न अपीलों और याचिकाओं को ठुकराए जाने के बाद धनंजय को कोलकाता की अलीपुर जेल में फांसी दे दी गई थी.
धनंजय को अलीपुर जेल में फाँसी के फंदे पर क़रीब आधे घंटे तक लटकाए रखा गया जिसके बाद उसे पोस्टमॉर्टम के लिए भेजा गया.
कोलकाता के टॉलीगंज के रहने वाले जल्लाद नाटा मलिक ने धनंजय को फाँसी देने का काम अंजाम दिया था.
धनंजय को जब फांसी की सज़ा सुनाई गई थी, उस समय पश्चिम बंगाल में कोई भी जल्लाद नहीं था, क्योंकि मलिक इससे कुछ महीने पूर्व ही सेवानिवृत्त हो गए थे.
धनंजय को फाँसी देने के लिए राज्य सरकार ने नाटा से संपर्क साधा, लेकिन मलिक ने दोबारा जल्लाद बनने के बदले अपने बेटे को सरकारी नौकरी देने की शर्त रखी. सरकार ने मलिक की शर्त मानी और फिर वह धनंजय को फांसी पर लटकाने के लिए तैयार हुए.
दिसंबर 2009 में नाटा मलिक का कोलकाता में लंबी बीमारी के बाद निधन हो गया था.
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