'ओबामाकेयर' ख़त्म होने से भारत को नुकसान?

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    • Author, प्रशान्त चाहल
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, नई दिल्ली

अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने 'ओबामाकेयर' को ख़त्म कर दिया है.

वही 'ओबामाकेयर' जिसे एक समय भारत और अमरीका के रिश्तों के लिए 'अच्छा' माना गया था. साथ ही कहा गया था कि अमरीका की यह हेल्थकेयर पॉलिसी भारत में रोज़गार और व्यापार के नए अवसर लेकर आएगी.

लेकिन अमरीकी राष्ट्रपति ट्रंप 'ओबामाकेयर' को ख़त्म करके नया हेल्थकेयर बिल लाना चाहते हैं. इसी सिलसिले में प्रतिनिधि सभा में गुरूवार को 217 वोट पाकर उन्होंने अमरीकन हेल्थ केयर एक्ट बिल के लिए पर्याप्त समर्थन भी जुटा लिया है.

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क्या 'ओबामाकेयर' का ख़त्म होना भारत के लिए झटका है?

कुछ पुरानी मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक़, अमरीका की फ़ूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन (एफ़डीए) ने ओबामाकेयर के तहत भारत में दवाईयों के 150 प्लांट्स लगाने की अनुमति दी थी.

ब्रूकिंग्स इंस्टीट्यूट की कविता पटेल ने 'ओबामाकेयर' की शुरुआत पर बीबीसी को बताया था कि जेनेरिक दवाईयां सस्ती होती हैं. इनके ज़रिए इलाज कराना हर तबके के आदमी के लिए संभव होता है. जबकि ब्रांडेड दवाईयां जेनेरिक दवाईयों से सात गुना तक महंगी होती हैं.

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इमेज कैप्शन, 'ओबामाकेयर' पूर्व अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा की सबसे महत्वकांक्षी योजनाओं में से एक मानी जाती थी.

इसके बाद भारत में बनकर अमरीका जाने वाली जेनेरिक दवाईयों की सप्लाई में एक स्थायी उछाल देखा गया था.

लेकिन क्या भारतीय दवाईयों की डिमांड अब घट जाएगी? इसके जवाब में इंडियन ड्रग मेनुफ़ेक्चरर एसोसिएशन (आईडीएमए) के महासचिव दारा बी पटेल कहते है कि 'ओबामाकेयर' के ख़त्म होने का भारतीय बाज़ार पर असर ज़रूर पड़ेगा, लेकिन इसका असर लंबे वक़्त तक नहीं रहेगा.

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दारा पटेल आगे बताते हैं, "अमरीका का हेल्थ बजट सीमित है. ओबामाकेयर ख़त्म होने बाद भी वो इस बजट को नहीं बढ़ाने वाले. ऐसे में उन्हें सस्ती दवाईयां चाहिए और भारत से बेहतर कोई और विकल्प उनके पास नहीं है. 40% तक जेनेरिक दवाईयां अमरीका को भारत सप्लाई करता है. कई अमरीकी कंपनियां भारत में तैयार दवाईयां खरीदती हैं और अपनी पैकिंग के साथ उन्हें बेचती हैं."

ट्रंप के हेल्थ केयर बिल का विरोध करते कार्यकर्ता

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आईडीएमए के मुताबिक़, मुनासिब क़ीमत में बढ़िया क्वालिटी की जेनेरिक दवाईयां बनाने के मामले भारत दुनिया भर में तीसरे या चौथे पायदान पर रहता है.

इंडियन ड्रग मेनुफ़ेक्चरर एसोसिएशन के अधिकारी मानते हैं कि मोदी के मेक इन इंडिया प्रोग्राम की तरह यह सिर्फ ट्रंप का एक प्रोग्राम है, जिसके ज़रिए स्थानीय लोगों को 'प्राथमिकता मिलने का अहसास' कराया जा सके.

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