जजों से लड़ते जस्टिस करनन: क्या है मामला?

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भारत में पिछले कुछ महीनों से न्यायपालिका एक अजीबोग़रीब संकट से जूझ रही है, जहाँ एक न्यायाधीश ने न्यायाधीशों के ख़िलाफ़ ही मोर्चा खोल दिया है.
1 मई को मामला यहाँ तक पहुँच गया कि सुप्रीम कोर्ट की सात न्यायाधीशों की खंडपीठ ने कोलकाता हाईकोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस चिन्नास्वामी स्वामीनाथन करनन की मानसिक स्थिति की जाँच करवाने का आदेश दिया.
ग़ुस्से में न्यायाधीश करनन ने भी सातों न्यायाधीशों का ऐसा ही टेस्ट करवाने का आदेश दे डाला.
और अब उन्होंने मुख्य न्यायाधीश जस्टिस जेएस खेहर समेत सातों न्यायाधीशों के ख़िलाफ़, उनके सामने पेश नहीं होने के लिए, ग़ैर-ज़मानती वारंट जारी कर दिया है.
आइए समझते हैं कि न्यायालय के भीतर जारी इस नाटकीय संघर्ष की शुरुआत कैसे हुई, यै है किस स्थिति में, और ये जा किधर रहा है?

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शुरूआत कैसे हुई
23 जनवरी को जस्टिस करनन ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को एक चिट्ठी लिखी जिसमें उन्होंने 20 "भ्रष्ट जजों" और तीन वरिष्ठ क़ानूनी अधिकारियों के नाम लिखे, और उनसे इन लोगों के ख़िलाफ़ कार्रवाई करने का अनुरोध किया.
8 फ़रवरी को सात न्यायाधीशों की पीठ ने कहा कि उनकी ये चिट्ठी और ऐसी ही और कई चिट्ठियाँ जो वो पहले लिख चुके हैं, जिनमें उन्होंने साथी जजों पर भ्रष्टाचार और पक्षपात के आरोप लगाए थे, वे "अदालत की अवमानना" हैं, और उन्होंने उनसे स्पष्टीकरण माँगा.
जस्टिट कर्नन को 13 फ़रवरी को अदालत में पेश होना था, मगर वो नहीं आए. सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें एक और मौक़ा दिया, और 10 मार्च को आने के लिए कहा.
लेकिन वो जब उस दिन भी पेश नहीं हुए, तो सुप्रीम कोर्ट ने उनके ख़िलाफ़ "ज़मानती वारंट" जारी कर दिया और पश्चिम बंगाल पुलिस को उन्हें 31 मार्च को पेश करने के लिए कहा.
उनपर अगले आदेश तक कोई भी न्यायिक या प्रशासनिक काम करने पर भी रोक लगा दी गई.

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आदेशोंके जवाब में आदेश
मगर इसी दिन बाग़ी जज ने भी एक आदेश जारी कर दिया और सातों न्यायाधीशों पर जाति के आधार पर भेदभाव करने का आरोप लगाते हुए उनके ख़िलाफ़ आरोप दायर करने का आदेश दिया.
उन्होंने इन न्यायाधीशों को 14 करोड़ रुपए का हर्ज़ाना भरने का भी "आदेश" दिया.
कुछ दिनों बाद, जब उनके सामने गिरफ़्तारी वारंट आया, तो उन्होंने इसे ये कहते हुए "ख़ारिज" कर दिया कि ये "अवैध" और "असंवैधानिक" है.

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घर से ही अदालत
पिछले शुक्रवार को जस्टिस करनन ने एक आदेश जारी कर भारत के मुख्य न्यायाधीस और छह अन्य जजों के भारत छोड़ने पर पाबंदी लगा दी.
हाईकोर्ट जाने पर रोक लगाए जाने के बाद अपने घर से ही अदालत चलानेवाले जस्टिस करनन ने दिल्ली स्थित एयर कंट्रोल अथॉरिटी के अधिकारियों को निर्देश दिया कि वे जब तक इन न्यायाधीशों के ख़िलाफ़ जाति के नाम पर भेदभाव करने का मुक़दमा पूरा नहीं होता, तब तक उन्हें विदेश जाने से रोकें.
उन्होंने इन न्यायाधीशों को अपने "घर में लगी अदालत" में 1 मई को पेश होने का हुक्म दिया, ठीक उसी दिन जिस दिन इन न्यायाधीशों ने उनसे सुप्रीम कोर्ट में आने के लिए कहा था.

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मानसिक सेहत की जाँच
इसके बाद सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों ने आदेश दिया कि डॉक्टरों की एक टीम 4 मई को जस्टिस करनन की दिमाग़ी हालत की जाँच करे.
पश्चिम बंगाल के पुलिस महानिदेशक को आदेश दिया गया कि वो जाँच के लिए मेडिकल बोर्ड को मदद उपलब्ध करवाएँ, और बोर्ड को 8 मई को अपनी रिपोर्ट सौंपने के लिए कहा गया.
लेकिन जस्टिस करनन ने कहा कि उनकी "सेहत और मानसिक हालत" बिल्कुल ठीक है, और उनकी पत्नी और दोनों बेटे उनकी सेहत से काफ़ी संतुष्ट हैं, और अदालत का आदेश "एक दलित न्यायाधीश का अपमान" है, और वो मेडिकल टेस्ट नहीं करवाएँगे.
कुछ ही घंटे बाद उन्होंने अपना "आदेश" जारी किया, और दिल्ली के पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) को एक चिकित्सकीय दल के समक्ष पेश करने और उनकी मानसिक स्थिति जाँच कर 7 मई तक रिपोर्ट पेश करने का आदेश दिया.
मगर दिल्ली में कोई डीजीपी नहीं होता, वहाँ पुलिस का मुखिया कमिश्नर होता है.
पहले से ही बाग़ी तेवर
जस्टिस कर्नन शुरू से ही बाग़ी स्वभाव के रहे हैं.
वे चेन्नई में 2009 से सात साल तक हाईकोर्ट के न्यायाधीश रहे, जहाँ उन्होंने कम-से-कम दो मुख्य न्यायाधीशों पर उनकी जाति के कारण भेदभाव करने का आरोप लगाया.
उन्होंने वहाँ एक सत्र न्यायाधीश पर एक इंटर्न के साथ बलात्कार करने का भी आरोप लगाया, जिसे अभी तक सिद्ध नहीं किया जा सका है.

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मीडिया में ऐसी भी रिपोर्टें आईं, कि वो कभी-कभी दूसरे न्यायाधीशों की अदालत में घुस जाते थे और अपने साथियों पर धौंस जमाते थे. बात इतनी गंभीर हो गई कि 2014 के अंत में उनके कई साथी न्यायाधीशों ने भारत के मुख्य न्यायाधीश को अर्ज़ी दी कि उनका तबादला किया जाए, क्योंकि वे उनके साथ काम नहीं कर सकते.
एक साल पहले, जब सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें कोलकाता ट्रांसफ़र किया, तो उन्होंने अपने ही ट्रांसफ़र पर रोक लगाने का आदेश जारी कर दिया.
इसके बाद एक बंद कमरे में उनकी भारत के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश टीएस ठाकुर से बात हुई, जिसके बाद ही वो चेन्नई से हटे.

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तो आगे क्या होगा
कोई नहीं जानता आगे क्या होगा, भारत में ये पहली बार है जब सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के एक न्यायाधीश के ख़िलाफ़ अवमानना का आदेश जारी किया है.
अब अगली तारीख़ 4 मई है, जब जस्टिस करनन की मानसिक स्थिति की जाँच होनी है. मगर इस बात की संभावना कम ही है उन्हें उनकी इच्छा के विरूद्ध जाँच के लिए मजबूर करवाया जाएगा.
क़ानूनी विशेषज्ञों का कहना है उन्हें लगता है ये मामला कम-से-कम 12 जून तक खिंचेगा, जिस दिन वो 62 साल के होंगे और रिटायर हो जाएँगे.
सुप्रीम कोर्ट तब शायद उनके ख़िलाफ़ कार्रवाई कर सकेगा.
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