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सीआरपीएफ़ यदि अहम तो मुखिया बगैर क्यों?
- Author, सलमान रावी
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर के दो अस्पतालों में सुकमा हमले में घायल सीआरपीएफ़ के जवानों का इलाज चल रहा है.
मंगलवार को उनका हालचाल लेने गृह मंत्री राजनाथ सिंह पहुंचे. अस्पताल में मौजूद केंद्रीय रिज़र्व पुलिस बल के अधिकारियों ने कथित तौर पर गृह मंत्री को बताया कि जवानों ने भी कई माओवादियों को मार गिराया है.
लेकिन सोमवार को जहां घटना हुई वहां किसी माओवादी छापामार का शव बरामद नहीं हो पाया है.
इस नक्सली हमले में केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल यानी सीआरपीएफ़ के 25 जवान मारे गए थे.
अस्पताल में मौजूद कुछ एक जवान दबी ज़ुबान से सीआरपीएफ़ की अनदेखी का भी आरोप लगा रहे थे. उनका कहना था कि जिस केंद्रीय सुरक्षा बल ने जम्मू-कश्मीर और छत्तीसगढ़ जैसे चुनौतीपूर्ण इलाकों में जमकर काम किया है और कर रहे हैं, उस बल का का कोई स्थायी मुखिया तक नहीं है.
जवानों का कहना है कि सीआरपीएफ़ के महानिदेशक के दुर्गा प्रसाद फ़रवरी में ही रिटायर हुए थे, मगर उनकी जगह किसी महानिदेशक की स्थाई पोस्टिंग अब तक नहीं की गई है.
एक जवान ने कहा, "बस काम चल रहा है. एक अतिरिक्त महानिदेशक को महानिदेशक का प्रभार दिया गया है. इसका मतलब यह है कि सरकार को सीआरपीएफ़ के लिए कोई महानिदेशक ही नहीं मिल रहा है."
सोमवार को ही कुछ घायल जवानों ने टीवी चैनलों को दिए इंटरव्यू में कुछ गंभीर सवाल उठाए थे. इसके बाद मंगलवार को अस्पताल में भरती जवानों से कहा गया कि वो मीडिया को कोई ऐसा बयान ना दें जिससे सीआरपीएफ़ की छवि खराब होती हो.
लेकिन अस्पताल में भरती जवान दबी ज़ुबान से यही पूछते हैं, "अगर सीआरपीएफ़ को गंभीरता से लिया जा रहा है तो फिर यह मुखिया विहीन क्यों है?"
राजनाथ सिंह के अलावा छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमन सिंह भी जवानों से मिलने अस्पताल पहुंचे.
अस्पतालों के गहन चिकित्सा कक्ष में जिन जवानों का इलाज चल रहा है उनमें से सिर्फ़ कुछ के परिवार वाले ही रायपुर पहुंच पाए हैं. उनकी देखभाल राज्य पुलिस के जवान और सीआरपीएफ़ के जवान ही कर रहे हैं.
'जवानों ने दिया मुंहतोड़ जवाब'
लच्छु ओरावं झारखंड में गुमला के रहने वाले हैं और पिछले चार सालों से वो छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित इलाकों में तैनात रहे हैं. छत्तीसगढ़ की पोस्टिंग से पहले वो जम्मू-कश्मीर में भी तैनात रहे हैं.
सोमवार को जब नक्सलियों ने उनकी बटालियन पर ग्रेनेड फेंका था तो लच्छु का एक हाथ पूरी तरह ज़ख़्मी हो गया.
बीबीसी से बात करते हुए उन्होंने कहा, "छत्तीसगढ़ की पोस्टिंग जम्मू-कश्मीर से भी ज़्यादा ख़तरनाक रही है. इस दौरान कई ऐसे मौके आए जब माओवादी छापामारों के साथ मेरी जमकर मुठभेड़ हुई."
इस घटना के बारे में कहते हैं, "इस बार माओवादी पूरी तैयारी के साथ घात लगाकर बैठे थे. हमने मुकाबला भी किया मगर हमें काफ़ी नुकसान उठाना पड़ा."
लच्छु ओरावं कहते हैं कि उनके साथियों ने भी माओवादियों को मुंह तोड़ जवाब दिया.
इनके बीच कई जवान ऐसे हैं जिन्होंने घायल होते हुए भी मोर्चा संभाले रखा.
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