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सुकमा जैसे बड़े नक्सली हमले क्यों हो जाते हैं ?
- Author, प्रकाश सिंह
- पदनाम, बीएसएफ़ के पूर्व डीजी
छत्तीसगढ़ के सुकमा में जैसे हमले होने के कई कारण हो सकते हैं. दो-तीन बातें ध्यान देने की हैं.
पहली बात तो ये कि भारत सरकार की तरफ़ से जो ये संदेश देने की कोशिश की जा रही है कि नक्सली समस्या लगभग ख़त्म होने की कगार पर है और पांच साल में इसका पूरा उन्मूलन हो जाएगा- ये ग़लत है.
जब इस तरह की बात सरकार के तरफ़ से की जाती है तो इसकी प्रतिक्रिया नक्सलियों में होती है और वो कुछ ऐसा करके दिखाने की कोशिश करते हैं कि वो अभी ख़त्म नहीं हुए हैं.
वो ये जता देना चाहते हैं कि, "हमारे में अभी भी शक्ति बची हुई है और हम आपके अर्धसैनिक बलों पर हमला कर सकते हैं और उन्हें नुकसान पहुंचा सकते हैं." ये उन्होंने संदेश देने की कोशिश की है.
दूसरी महत्वपूर्ण बात ये है कि राज्य पुलिस के एक जवान के घायल होने की भी ख़बर नहीं है, मरने की बात तो दूर रही.
हमारे ऑपरेशंस में एक बहुत बड़ी कमी ये है कि केंद्रीय बलों और राज्य पुलिस में जो समन्वय होना चाहिए वो नहीं है. राज्य पुलिस को केंद्रीय बलों के साथ जितना मिल-जुलकर काम करना चाहिए वो भी वो नहीं कर रहे हैं.
समन्वय की कमी
ऐसी लड़ाई में सफलता तभी मिलती है जब राज्य पुलिस लड़ाई में आगे रहे और उसे केंद्रीय बलों का समर्थन हासिल हो.
लेकिन छत्तीसगढ़ में एकदम उल्टा हो रहा है. केंद्रीय बल मोर्चे में आगे हैं और राज्य पुलिस पीछे से थोड़ा-बहुत सहायता करती है.
जैसी ख़बरें आ रही हैं कि 200-300 माओवादियों ने हमले को अंजाम दिया. तो मैं कहना चाहता हूं कि राज्य पुलिस के पास और केंद्रीय बलों के पास भी इंटेलिजेंस नेटवर्क है जहां से सूचनाएं आती हैं. अगर राज्य पुलिस सीआरपीएफ़ को कवर दे रही होती तो हालत कुछ दूसरी हो सकती थी.
राज्य पुलिस को थानों से ख़ुफ़िया जानकारी मिलती रहती है. ऐसा तो है नहीं कि 200-300 लोग अचानक आसमान से टपक पड़ेंगे.
ये लोग कहीं कैंप कर रहे होंगे, कहीं से कहीं गए होंगे, कहीं योजना बनाई होगी.
केंद्रीय बल ऐसी जगहों पर काम ज़रूर कर रहे हैं, लेकिन लोकल पुलिस की पूरी मदद और इंटेलिजेंस सूचनाएं नहीं मिलने के कारण ये कहीं न कहीं कमज़ोर पड़ जाते हैं.
सबक नहीं ली जाती
सरकार भी ऐसे हमलों से सबक नहीं लेती. वो सेफ़ प्ले करना चाहती है. वो सोचती है कि कौन इस लड़ाई में पड़े, केंद्रीय बल इसमें लगाए गए हैं, उन्हें लड़ने दिया जाए. सरकारी अफ़सर सोचते हैं कि डेवलपमेंट का पैसा आ रहा है और वो उसे खाने-पीने में लगे रहते हैं.
10 से 15 प्रतिशत अफ़सर अभी भी ऐसे हैं जो ईमानदारी से काम कर रहे हैं, लेकिन एक बड़ी तादाद ऐसे अफ़सरों की है जिन पर सख़्ती करने की ज़रूरत है.
ऐसे अफ़सर अपनी जान बचा लेते हैं और जवानों को मरवा देते हैं.
ये बड़े दुर्भाग्य की बात है कि अभी तक माओवादियों से निपटने की नीति को परिभाषित करने का कोई प्रयास नहीं हुआ.
अपनी डफली-अपना राग
मैंने ये बात मनमोहन सिंहजी के सामने उठाई थी. उन्होंने मेरे सामने राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार को कहा था कि माओवादियों से लड़ने की क्या नीति होनी चाहिए उसको कोडीफ़ाई कीजिए. और मैंने जब कोडीफ़ाई करने की पहल की तो मुझे कह दिया गया कि अभी कोई ज़रूरत नहीं है, जब ज़रूरत होगी तो आपको बताया जाएगा.
अभी हालात ये हैं कि अलग-अलग सरकारें हैं और सबकी अपनी डफली अपना राग वाली कहानी है. कोई ऐसी नीति नहीं है जिसे हम कह सकें कि यही नीति छत्तीसगढ़ की है और यही महाराष्ट्र सरकार की है.
जिस राज्य सरकार का जैसा आकलन है उसी के हिसाब से वो पॉलिसी बनाती है.
ममता बनर्जी की कुछ नीति है, रमन सिंह की कुछ है, बिहार की कुछ और झारखंड की कुछ है.
और केंद्र सरकार कहती है कि क़ानून व्यवस्था राज्य सरकार के अंतर्गत आता है. हम तो केवल संसाधन दे सकते हैं, फ़ोर्स दे सकते हैं और नीति संबंधी कुछ मशविरा दे सकते हैं.
हालत बहुत चिंताजनक है. आज मुझे नहीं दिखता कि कोई ऐसी नीति हो जिसके आधार पर भारत भर में माओवादियों के ख़िलाफ़ कोई अभियान चल रहा हो.
सबकुछ अपनी-अपनी डफली और अपना-अपना राग के सिद्धांत पर चल रहा है.
(बीबीसी संवाददाता नितिन श्रीवास्तव से बातचीत पर आधारित)
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