'टैबलेट दीदी' से मिलिए जो झारखंड की तस्वीर बदलने में जुटी हैं

    • Author, रवि प्रकाश
    • पदनाम, रांची से, बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए

बबली करमाली को अंग्रेजी नहीं आती थी. 'स्मार्ट फोन' उनके लिए सपना था. अब वे टैबलेट पर काम करती हैं. डेटा अपलोड करती हैं.

उनका फेसबुक प्रोफाइल भी है. उनकी जिंदगी 'स्मार्ट' बन गई है. लोग उनसे अदब से पेश आते हैं. वे रांची जिले के अनगड़ा प्रखंड के सुदूर हेसल गांव की रहने वाली हैं.

बबली झारखंड की उन 700 महिलाओं में शामिल हैं, जिन्हें लोग 'टैबलेट दीदी' पुकारते हैं. उन्हें झारखंड स्टेट लाइवलीहुड प्रमोशनल सोसाइटी (जेएसएलपीएस) ने यह नाम दिया है.

यह ग्रामीण विकास विभाग की एक इकाई है. जो महिलाओं के सशक्तीकरण के लिए काम करती है.

जेएसएलपीएस के प्रोजेक्ट एग्जीक्यूटिव अभिनव बख्शी ने बताया कि राज्य के करीब 45000 स्वयं सहायता समूहों की बैठकों का हिसाब-किताब इन टैबलेट दीदीयों के जिम्मे है.

इन्हें टैबलेट के जरिए एमआइएस डेटा अपलोड करने की ट्रेनिंग दी गई है. इसके लिए स्वलेखा नामक विशेष एप्लीकेशन तैयार कराया गया है. इसमें हिंदी और अंग्रेजी दोनों के विकल्प हैं.

ज्यादातर टैबलेट दीदियां अपना डेटा हिंदी में अपलोड करती हैं. इनमें से कई आठवीं पास भी नहीं हैं. वे सामान्य आदिवासी गृहिणियां हैं. टैबलेट दीदी बनने के लिए उनका किसी न किसी स्वयं सहायता समूह (एसएचजी) की सदस्य होना जरूरी है.

बदल गई है ज़िंदगी

बबली करमाली कल्याणी महिला स्वयं सहायता समूह से जुड़ी हैं. उन्हें डेढ़ साल पहले टैबलेट चलाने की ट्रेनिंग दी गयी. बकौल बबली, उन्हें पहले दिन टैबलेट आन-आफ करना सिखाया गया.

फिर गेम खेलना, नाम लिखना, फोटो खींचना, वीडियो बनाना और आखिरकार डेटा अपलोड करना. अब वे टैबलेट फ्रेंडली हैं.

बबली करमाली ने बीबीसी से कहा, "जब जेएसएलपीएस वाले भैया ने मुझे 'टैबलेट' देने की बात कही तो मैं हैरत में पड़ गई. क्योंकि, मैं बीमार नहीं थी. लगा कि आखिर किस बीमारी के लिए 'टैबलेट' देंगे. बाद में मैं इस 'टैबलेट' के बारे में जान पाई. अब लोग मुझे 'टैबलेट दीदी' कहते हैं, तो अच्छा लगता है."

हेसल 1200 घरों का बड़ा गांव है. यहां 24 एसएचजी हैं. लिहाजा, 2 ग्राम संगठन बनाए गए हैं. अमूमन एक गांव में एक ही ग्राम संगठन का प्रावधान है.

इनकी जिम्मेवारी है कि वे गांव में चलने वाले सभी एचएचजी के आय-व्यय का हिसाब रखें. इन एसएचजी को सरकार एक कोरपस फंड देकर शुरू करवाती है.

फिर ग्रामीण महिलाएं आपसी योगदान से इसे चलाती हैं.

3000 महिलाओं तक पहुंचने का लक्ष्य

हेसल के एक ग्राम संगठन की अध्यक्ष लीला देवी ने बताया कि पहले यह काम मैन्युअली होता था. इसके लिए छह अलग-अलग फार्म थे.

इन्हें भरकर जेएसएलपीएस के दफ्तर तक भेजने में काफी वक्त और पैसे का खर्च होता था. पहले बुककीपर महिलाएं यह काम करती थीं.

जेएसएलपीएस के प्रोग्राम मैनेजर अमित जैन ने बताया कि मैन्युअल सिस्टम के कारण दफ्तर में कागजों का बड़ा बंडल जमा हो रहा था.

हमारे पास राजस्थान जैसे कुछ राज्यों के उदाहरण थे, जहां एसएमएस आधारित रिपोर्टिंग थी. फिर हमने सोचा कि क्यों नहीं बुककीपर महिलाओं को कंप्यूटर की जरूरी ट्रेनिंग देकर हम ऑनलाइन रिपोर्टिंग सिस्टम पर काम करें.

अमित जैन बताते हैं, "यह मुश्किल काम था. क्योंकि, 99 फीसदी महिलाओं ने कभी कंप्यूटर, लैपटॉप या टैबलेट नहीं देखा था. इनके पास स्मार्ट फोन भी नहीं थे. लेकिन, इन महिलाओं ने रुचि दिखाई. हमारा प्रयोग सफल रहा. अभी झारखंड के रांची, पाकुड़ और पश्चिमी सिंहभूम जिलों में हमने सिर्फ 700 महिलाओं को टैबलेट चलाने की ट्रेनिंग दी है. इस साल हमने 3000 और महिलाओं को टैबलेट दीदी बनाने का लक्ष्य रखा है."

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)