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चूल्हे ने बदल दी है इनकी ज़िंदगी
- Author, नितिन श्रीवास्तव
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
तपते सूरज में एक दुबला-पतला इंसान कंधों पर लकड़ी की टहनियों का ढेर उठाए घने जंगल से निकल रहा है.
पिछले बीस वर्षों से टीबी यानी तपेदिक की बीमारी से लड़ रहे प्रकाश जानी नाउम्मीद हो चुके थे कि उनका मर्ज़ कभी दूर हो सकेगा.
लेकिन अब 45 साल के प्रकाश की प्रकाश की आँखों में चमक है.
उन्होंने बताया, "20 सालों से टीबी का मरीज़ हूँ. घर के भीतर धुएं से बच ही नहीं सकते थे, लेकिन अब चीज़ें ठीक लग रही हैं और मेरी सेहत में भी सुधार है".
क़रीब दस मील दूर अस्पताल के चक्कर कम हो गए हैं. डॉक्टरों ने प्रकाश को बताया है कि घर में कम हुए धुएं के कारण ऐसा हुआ है.
दुनिया की लगभग आधी आबादी आज भी घरों के भीतर पारंपरिक चूल्हों पर खाना पकाती है जिसमें ईंधन के तौर पर लकड़ी, कोयले या गोबर के कंडे का प्रयोग होता है.
भारत में भी क़रीब 50 करोड़ लोग इन्हीं चूल्हों का प्रयोग करते है और एक साल पहले तक प्रकाश के घर भी यही होता था.
घरों के भीतर धुएं से होने वाले वायु प्रदूषण के चलते टीबी, ब्रॉन्काइटिस और लंग कैंसर की बीमारियां आम रही हैं.
विश्व स्वास्थ्य संगठन ने हाल ही में एक रिपोर्ट में कहा था कि घरेलू वायु प्रदूषण के चलते भारत में हर साल क़रीब पंद्रह लाख मौतें होती हैं.
लेकिन ओडिशा राज्य में प्रकाश जानी के गाँव नोतरपल्ली में कोंध जनजाति के सभी 34 परिवार ऐसे ही ईंधन से अब खाना भी ज़्यादा बना रहे हैं और स्वस्थ भी होते जा रहे हैं.
वजह है नए किस्म के आधुनिक चूल्हों का प्रयोग.
क़रीब एक वर्ष पहले इन्होंने पर्यावरण के अनुकूल चूल्हों का प्रयोग शुरू किया था जिन्हें नेक्सलीफ़ एनालिटिक्स जैसे ग़ैर सरकारी संगठनों की पहल पर शुरू किया गया.
कम ईंधन में ज़्यादा खाना बनाने वाले इन नए क़िस्म के चूल्हों का निर्माण भारत में हो रहा है.
नेक्सलीफ़ एनालिटिक्स की प्रोग्राम डायरेक्टर तारा रामनाथन ने कहा कि इसे काफ़ी रिसर्च के बाद शुरू किया गया.
उन्होंने बताया, "मार्केट प्रणाली वाली इस पहल से गाँव में सभी परिवारों को नए आधुनिक चूल्हे दिए गए. फिर जब उन्होंने खाना बनाना शुरू कर दिया तब इन्हें इसके लिए पैसा या कार्बन क्रेडिट भी दिया जाने लगा. आज महिलाएं खाना बनाने के साथ-साथ इन चूल्हों की लगत भी चुका रही हैं और ज़िंदगियाँ भी बचा रही हैं".
इन चूल्हों की ख़ास बात ये है कि इनके प्रयोग को सेंसर के ज़रिए मॉनीटर किया जाता है.
डाटा को किसी भी इंटरनेट वाले कंप्यूटर, मोबाइल या टैबलेट पर दुनिया के किसी भी कोने में देखा जा सकता है.
गाँव वाले इस बात से बहुत खुश हैं कि हर महीने अगर वे सौ घंटे इन नए चूल्हों पर खाना बनाते हैं तो इस प्रोग्राम को चलाने वाले गैर-लाभकारी संगठनों से उन्हें हर महीने 180 रुपए मिलते हैं.
इन्हीं पैसों से वे धीर-धीरे चूल्हों की क़ीमत वापस चुका देते हैं.
घने जंगलों के बीच नयागढ़ ज़िले के नोतरपल्ली गाँव में इस पहल के लिए पापड़ भी कम नहीं बेलने पड़े.
प्रदेश में पर्यावरण संबंधी कई पहलों पर काम कर चुके गोविंद दलाई सबसे पहले नए चूल्हों के साथ यहाँ पहुंचे थे.
गोविंद के मुताबिक़, "किसी भी नई तकनीक की शुरुआत को पहले तो बहुत संदेह के साथ देखा जाता है, ख़ास तौर से ग्रामीण इलाकों में. विशेष रूप से तब भी जब महिलाओं को सदियों पुराने तरीकों में बदलाव करना हो. हमें भी नोतरपल्ली गाँव के लोगों को समझाने में समय लगा कि ये इनके हित में है".
दोपहर के दो बज चुके हैं. प्रकाश जानी की पड़ोसी रंभा प्रधान झोपड़ी के चबूतरे पर अपने पोते से साथ खेल रही हैं.
झोपड़ी के भीतर की छत और दीवारों पर वर्षों बनाए गए खाने से निकले काले घने धुंए की छाप है.
रंभा ने कहा, "पहले तो लोग हम पर हंसते थे. बाद में समझे कि इन चूल्हों में ईंधन कम लगता है और जंगलों में लकड़ी कम काटनी पड़ेगी. अब पैसे मिलते हैं और पुरुष भी खाना बनाते हैं. बच्चों-बूढ़ों की सेहत में सुधार देखिए".
इस गाँव के डॉक्टर विद्याधर दास ने भी बताया कि 'कैसे नए किस्म के कम प्रदूषण करने वाले चूल्हों के चलते नवजात शिशुओं से लेकर बुज़ुर्गों तक, सभी की सेहत में बेहतरी दिखी है".
तो क्या इन चूल्हों से घरों के भीतर वायु प्रदूषण के कहर से पूरी तरह निजात मिल सकेगी?
पर्यावरण मामलों की संस्था टेरी की बिग्सना गिल को लगता है इस तरह और इसके जैसी दूसरी पहलों से ही चीज़ें बदलेंगी.
बिग्सना गिल ने बताया, "मैं ये तो नहीं कह सकती कि ये चूल्हे आख़िरी उपाय हैं, लेकिन निश्चित तौर पर कम ईंधन प्रयोग करने वाले इस तरह के चूल्हों ने वायु प्रदूषण कम करने की तरफ बड़ी पहल तो की है. जैसे-जैसे दूसरे क्षेत्रों में इनका प्रयोग बढ़ेगा, ज़्यादा फ़र्क दिखेगा.
एक तरफ़ जहाँ इस तकनीक को दूसरे क्षेत्रों में प्रयोग किए जाने की शुरुआत हो रही है, वहीं ओडिशा के नोतरपल्ली गाँव के लोग इसके फ़ायदों पर बात करते नहीं थकते.
जंगलों के बीच रहने वाले आज भी पारंपरिक ईंधन का प्रयोग कर रहे हैं, लेकिन इस भरोसे के साथ कि पर्यावरण बचाने के अलावा इनके स्वास्थ्य में सुधार हो रहा है.