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तीस्ता सीतलवाड़: 'मोदी से लड़ाई जारी रहेगी'
- Author, ज़ुबैर अहमद
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, दिल्ली
वो भारत के सबसे शक्तिशाली व्यक्ति के ख़िलाफ़ कई साल से अदालतों में लड़ रही हैं. वो दंगा पीड़ितों को न्याय दिलाने में सालों से जुटी हैं.
वो 'भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए ख़तरा' और ग़बन जैसे आरोपों का सामना कर रही हैं. उनके ख़िलाफ़ नौ मुक़दमे दर्ज हैं और उन्हें नौ बार अदालत से ज़मानत मिल चुकी है.
गुजरात में 2002 के दंगों के अभियुक्तों को अदालत तक ले जाने में उनका नाम सब से ऊपर आता है. ये हैं बहुचर्चित मानवाधिकार कार्यकर्ता तीस्ता सीतलवाड़.
उनकी नई किताब 'फ़ुट सोल्जर ऑफ़ कंस्टीच्यूशन' उनके क़ानूनी संघर्ष, कोर्ट केसेज़, गुजरात दंगों और उनके ख़िलाफ़ लगे आरोपों की सफाई पर आधारित है.
पिछले हफ्ते वो एक बार फिर सुर्ख़ियों में आईं. उनकी किताब पर दिल्ली के ऑक्सफ़ोर्ड बुक स्टोर में एक कार्यक्रम होने वाला था, जिसे आखिरी समय में रद्द कर दिया गया.
'सीएम मोदी'
कहा गया कि किताब पर प्रस्तावित चर्चा 'बाहरी तत्वों की ओर से तोड़फोड़ की आशंका के मद्देनज़र रद्द' कर दी गई है. तीस्ता के अनुसार ये 'सेल्फ सेंसरशिप' की एक मिसाल है.
तीस्ता सीतलवाड़ ने जब गुजरात दंगा पीड़ितों को इंसाफ़ दिलाने का बीड़ा उठाया था तो उस समय नरेंद्र मोदी राज्य के मुख्यमंत्री थे. अब वो भारत के प्रधानमंत्री हैं और 130 करोड़ आबादी वाले देश के सबसे शक्तिशाली नेता.
नरेंद्र मोदी के समर्थकों के बीच आम राय ये है कि उनके ख़िलाफ़ मुक़दमा ख़ारिज हो चुका है और उन्हें गुजरात दंगों के आरोपों से क्लीन चिट मिल गई है.
लेकिन 54 वर्षीय तीस्ता ने मोदी के ख़िलाफ़ अपना 'संघर्ष' जारी रखा हुआ है. वो कहती हैं, "मोदी के ख़िलाफ़ मुक़दमा बंद नहीं हुआ है. ये आज भी जारी है."
शायद इसीलिए प्रधानमंत्री के प्रशंसक और समर्थक तीस्ता को पसंद नहीं करते और कहते हैं कि वो बेकार में 'मोदी जी के पीछे पड़ी हैं'. इस पर उन्हें अक्सर बुरा-भला भी कहा जाता है.
एहसान जाफरी
लेकिन तीस्ता के अनुसार, "मुक़दमा शुरू होने के समय तो मोदीजी ने प्रधानमंत्री बनने का सपना भी नहीं देखा था. ज़ाकिया आपा ने मोदी के ख़िलाफ़ 2006 में याचिका दर्ज कराई थी, तब उन्होंने प्रधानमंत्री बनने का सपना दूर-दूर तक नहीं देखा था."
ज़ाकिया जाफरी दंगों में मारे गए पूर्व कांग्रेसी सांसद एहसान जाफरी की विधवा हैं.
ज़ाकिया जाफरी का केस एक अनोखा मुक़दमा है, जैसा कि तीस्ता बताती हैं, "ये एक अकेला मुक़दमा है जो दंगों की 300 घटनाओं को क़ानूनी तौर पर एक साथ ग़ौर कर रहा है, जिसमे ये देखने की कोशिश की जा रही है कि क्या दंगों में प्रशासन, पुलिस और राज्य सरकार की सहभागिता थी. क्या ये सही मायने में पूर्वनियोजित था या फिर अचानक हो गया?"
वो आगे कहती हैं, "उस समय प्रशासन और सरकार की कमान नरेंद्र मोदी के हाथ में थी."
सुप्रीम कोर्ट के ज़रिए गठित जांच दल 'एसआईटी' और निचली अदालत ने नरेंद्र मोदी को क्लीन चिट दे दी है. लेकिन ज़ाकिया जाफरी ने तीस्ता की मदद से इस फैसले को गुजरात हाई कोर्ट में चैलेंज कर रखा है.
गुजरात दंगे
तीस्ता कहती हैं कि उनके पास 26,000 पन्नों के दस्तावेज पर आधारित सबूत हैं. सब अदालत में जमा है. पिछले कुछ सालों से मामला अदालत में अटका हुआ है.
गुजरात दंगों के मुक़दमों में उन्हें जितनी सफलता मिली है उतनी ही असफलता भी. वो कहती हैं, "कामयाबी भी मिली है और नाकामी भी. सवाल है कि पानी से भरे एक गिलास को आधा भरा कहें या आधा ख़ाली?"
तीस्ता सीतलवाड़ और उनकी संस्था 'सिटीज़न्स फॉर जस्टिस एंड पीस' ने गुजरात दंगा पीड़ितों को 'इंसाफ़' दिलवाने के लिए 68 मुक़दमे लड़े हैं और 170 से अधिक लोगों को सजा दिलवाई है जिनमें 1000 से अधिक लोग मारे गए थे, तो इससे कुछ समय पहले नरेंद्र मोदी मुख्यमंत्री बने थे.
इंसाफ़ की मुहिम
लगभग 60 हिंदू तीर्थयात्रियों की गोधरा में एक ट्रेन में हत्या के बाद अगले दिन गुजरात में शुरू हुई हिंसा की ज़िम्मेदारी मोदी सरकार और खुद उन पर डाली गई.
तीस्ता की लड़ाई जारी है, लेकिन उन्हें हिम्मत और प्रेरणा कहाँ से मिलती है? वो कहती हैं कि पीड़ितों को 'इंसाफ़ दिलाने की कोशिश' उनके लिए सबसे बड़ी प्रेरणा है.
वह कहती हैं, "पीड़ित केवल एक पीड़ित नहीं होता वो एक सर्वाइवर भी होता है. उसे समाज में दोबारा उसी समय बसाया जा सकता है जब उसे इंसाफ़ मिलने की संतुष्टि होगी."
तीस्ता का जन्म 1962 में मुंबई के एक वरिष्ठ वकील परिवार में हुआ था. उनके दादा एमसी सीतलवाड़ भारत के पहले अटॉर्नी-जनरल थे. वो इस पद पर 1950 से 1963 तक रहे.
तीस्ता ने स्वीकार किया कि इंसाफ़ दिलाने की उनकी मुहिम के पीछे उनपर उनके परिवार का असर भी है. तीस्ता ने मुंबई में पढ़ाई की और पत्रकार बन गईं. उनकी मुलाक़ात पत्रकार जावेद आनंद से हुई जो आज उनके पति हैं. उनके दो बच्चे हैं.
दूसरों को इंसाफ़ दिलाने की कोशिश करने वाली तीस्ता और उनके पति जावेद आनंद आज अपने ऊपर लगे कई आरोपों से घिरे हैं.
तीस्ता का एजेंडा
विदेशों से आए धन के दुरुपयोग से लेकर धोखाधड़ी के आरोपों के कारण गुजरात पुलिस और सीबीआई उनके ख़िलाफ़ जाँच कर रही है.
उन्हें 'भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा' भी घोषित किया जा चुका है. उनके ख़िलाफ़ नौ मुक़दमे दर्ज हैं. तीस्ता कहती हैं कि ये बदले की कार्रवाई है, "ये हमारी आवाज़ को दबाने की एक हरकत है."
तीस्ता कहती हैं कि वो चुप होने वाली नहीं हैं. वो नरेंद्र मोदी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाती रहेंगी.
तीस्ता के आलोचक आरोप लगाते हैं कि वो अपने स्वार्थ के लिए एक एजेंडे पर काम कर रही हैं.
आरएसएस के एक प्रवक्ता संदीप महापात्र कहते हैं कि तीस्ता को दूसरों को कटघरे पर खड़ा करने के बजाय अपने ख़िलाफ़ लगे इल्ज़ामों के बारे में बात करनी चाहिए.
उनके अनुसार तीस्ता एक एजेंडे के तहत काम कर रही हैं.
संदीप महापात्र कहते हैं, "मुझे जहाँ तक समझ में आया है कि उनका एक ही एजेंडा है और वो ये कि संघ जैसी संस्था को हिंसा का ज़िम्मेदार ठहराएं और ग़लत तत्व देकर संघ के ख़िलाफ़ जनमत तैयार करें."
इसी तरह के विचार उनके विरोधी अक्सर उनके ख़िलाफ़ सोशल मीडिया पर भी करते रहते हैं.
पीड़ित मुसलमान
तीस्ता अपने खिलाफ लगे आरोपों के बारे में कहती हैं कि सीबीआई के छापे 2014 में मोदी सरकार के बनने के बाद पहली बार शुरू हुए.
उनके अनुसार वो अपने ख़िलाफ़ लगे सभी इल्ज़ामों को ग़लत साबित करने के लिए दस्तवेज़ अदालत में जमा कर चुकी हैं.
तीस्ता के खिलाफ ये भी आरोप है कि वो मुसलमान पीड़ितों के पक्ष में तो बोलती हैं लेकिन हिन्दू पीड़ितों की उन्हें परवाह नहीं. मुसलमानों में कट्टरपंथों को नज़रअंदाज़ करती हैं.
लेकिन तीस्ता इसका खंडन करते हुए कहती हैं कि उनकी संस्था ने मुस्लिम समुदाय में तीन तलाक़ का मामला सालों पहले उठाया था. बांग्लादेशी लेखक तसलीमा नसरीन पर एक मुस्लिम संस्था के प्रहार के ख़िलाफ़ उन्होंने आवाज़ उठाई थी. कश्मीरी पंडितों की सुरक्षा के लिए सालों पहले आवाज़ उठाई थी.
उनके अनुसार 1984 में सिखों के खिलाफ हिंसा के समय अगर वो दिल्ली में होतीं तो सिख पीड़ितों के लिए भी काम करतीं.
तीस्ता कहती हैं कि पीड़ितों का कोई मज़हब नहीं होता. वो सभी पीड़ितों के साथ हैं.
वो आगे कहती हैं कि बलवाइयों के ज़रिये हुई हिंसा के पीड़ित और बम धमाकों के पीड़ितों के बीच कोई फ़र्क़ नहीं और वो दोनों के लिए काम करती हैं, "एक बार हम लोगों ने 2002 के मुस्लिम पीड़ितों और 2008 में अहमदाबाद में हुए बम धमाकों के हिन्दू पीड़ितों को एक मंच पर लाकर उनके बीच दिनभर वार्ता कराई जिसका नतीजा काफी सकारात्मक था."
तीस्ता जानती हैं कि उनका संघर्ष ख़त्म नहीं हुआ है और वो अपनी लड़ाई जारी रखने के लिए तैयार हैं, "अभी काम अधूरा है."