यमला जट्ट: जिनके हुनर ने पंजाब को एक अलग पहचान दिलाई
- Author, सलमान रावी
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, लुधियाना से
पंजाब के लुधियाना में विधानसभा चुनावों का प्रचार ज़ोरों पर है. जगह-जगह चुनावी सभाएं और रैलियाँ. सड़क पर दौड़ती गाड़ियां जिनपर बंधे चोगों से चुनावी गीत और प्रचार के स्लोगन ज़ोर-ज़ोर से बजाए जा रहे हैं.
चाहे आम चुनाव हों या फिर विधानसभा, हमेशा इस शोर-शराबे ने पंजाब की मिट्टी की खुशबू दूर-दूर विदेशों तक बिखेरने वाली आवाज़ों को दबाए रखा.
जी हाँ, बात हो रही है पंजाब के लोक गीतों और लोक संगीत की और यहाँ के लोक कलाकारों की जिनके हुनर ने पंजाब की एक अलग पहचान बनाए रखी.
पीर के मज़ार पर तुंबी का रियाज़
पंजाब की मिट्टी के एक ऐसे ही लोक कलाकार रहे हैं उस्ताद लाल चंद यमला जट्ट जिन्होंने यहाँ की लोक संस्कृति के साथ-साथ पंजाब के पहनावे को भी पूरे विश्व में एक अलग पहचान दिलवाई है.
जिस तुर्रेदार पगड़ी, जूतियां और धोती पहने हुए यमला जट्ट की कल्पना की जाती है उसका श्रेय भी उस्ताद लाल चंद यमला जट्ट को ही जाता है.
लाहौर के पास जन्मे उस्ताद लाल चंद यमला जट्ट भारत के विभाजन के बाद लुधियाना के सरकारी बस अड्डे के सामने बसी रिफ्यूजियों की कालोनी जवाहर नगर में रहने लगे.

वो पाकिस्तान से अपने पीर, कटोरे शाह बाबा के मज़ार की मिट्टी लेते आए थे. उन्होंने अपने घर पर ही अपने पीर का मज़ार बनाया और वहीं पर तुम्बी का रियाज़ भी शुरू किया.
मगर चिमटे पर उनकी संगत करने वाले आलम लोहार उनसे बिछड़ गए क्योंकि वो पकिस्तान में ही रह गए थे. फिर कई सालों तक उस्ताद बिना चिमटे की संगत के ही लोक गीत और तुम्बी वादन प्रस्तुत करते रहे.
उस्ताद के परिवारवालों का कहना है कि पाकिस्तान के मशहूर लोक गायक आरिफ़ लोहार के पिता आलम लोहार से लाल चाँद यमला जट्ट की मुलाक़ात फिर 1978 में कनाडा में हुई जब वो एक कार्यक्रम पेश करने वहां गए हुए थे. फिर एक बार दोनों ने साथ मिलकर कार्यक्रम प्रस्तुत किया जो यादगार लम्हा बन गया.

मगर पंजाब में कला और संस्कृति से जुड़े लोगों को मलाल है कि राज्य में जिसकी भी सरकार आई उसने कभी ना तो उस्ताद लाल चंद यमला जट्ट की परंपरा को आगे बढ़ाने की सोची और ना ही उनके परिवार को सहायता देने की ही सोची.
घर पर फ़ोन तो लगा पर मरने के बाद
उस्ताद की बहु यानी उनके बेटे जसदेव कुमार यमला जट्ट की पत्नी सरबजीत चिमटेवाली कहती हैं कि जब उस्ताद बहुत बीमार थे तो पंजाब के राज्यपाल अपनी पत्नी के साथ उन्हें देखने उनके घर पहुंचे थे.
वो कहती हैं, "राज्यपाल ने उस्ताद से पूछा कि उन्हें क्या चाहिए. उस्ताद लालचंद यमला जट्ट के चारों बेटे विदेश गए हुए थे. इसलिए उन्होंने कहा कि घर में फोन नहीं है और वो किसी के घर फ़ोन पर बात करने नहीं जा सकते. उन्होंने कुछ और नहीं माँगा. अफ़सोस की बात यह है कि फ़ोन तो लगा मगर उस्ताद के मरने के एक महीने के बाद."

सरकारी उदासीनता से दुखी सामाजिक कार्यकर्ताओं और पत्रकारों ने मिलकर खुद ही उस्ताद यमला जट्ट की ना सिर्फ़ मूर्ति बनाई, बल्कि बस अड्डे के सामने उनकी याद में एक पार्क भी बनवाया जहां लोक संगीत के क़द्रदान अक्सर अपना समय बिताने आते हैं.
'लोक गायकी को ज़िंदा रखा जाए'
वरिष्ठ पत्रकार नदीम ने बीबीसी को बताया कि किस तरह सामाजिक संगठनों की पहल पर लुधियाना के बस स्टैंड के पास उस्ताद की याद में पार्क बनाया गया.
नदीम कहते हैं, "अफ़सोस कि जब उस्ताद लालचंद यमला जट्ट नहीं रहे तो उनके नामलेवा भी नहीं रहे. पंजाब की सरकार ने भी इन्हें भुला दिया. कुछ लोगों की पहल पर उस्ताद का एक छोटा सा बुत बस अड्डे के सामने लगाया गया. फिर हमलोगों ने पहल की और एक सामाजिक संगठन और स्थानीय पार्षद कपिल कुमार सोनू ने मिलकर फिर एक पार्क का निर्माण किया जिसमे उस्ताद की एक बड़ी मूर्ति लगाई गई. इस पार्क का नाम यमला पार्क रखा गया."

सामाजिक कार्यकर्ताओं को दुःख है कि उस्ताद की शुरू की गई गायकी और तुम्बी बजाने की परंपरा को सरकार ने आगे बढाने की कोई पहल ही नहीं की. न उन्हें वो सम्मान दिया गया. जबकि उनके शागिर्दों के शागिर्दों को राजकीय गायक का दर्जा दिया गया.
उस्ताद के पोते सुरेश यमला जट्ट जो तुम्बी और लोक गायकी की परंपरा को आगे बढ़ाने के लिए अपने स्तर से संघर्ष कर रहे हैं कहते हैं कि सरकार परिवार की मदद न करे तो ना सही. मगर वो चाहते हैं कि जिस कला ने पंजाब की लोक गायकी को पहचान दिलाई सरकार कम से कम उसको ज़िंदा रखे.
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