उत्तराखंड: चुनाव से पहले 19 अपराधी पेरोल पर रिहा

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- Author, राजेश डोबरियाल
- पदनाम, देहरादून से बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए
चुनावों में राजनीति के अपराधीकरण और बाहुबल के इस्तेमाल की बात तो अक्सर होती है लेकिन उत्तराखंड में ये आजकल जिस वजह से वह हो रहा है वह कुछ अलग सा मामला लगता है.
दरअसल राज्य सरकार ने पिछले एक महीने में हत्या की मामलों में सज़ा काट रहे 19 अपराधियों को पेरोल पर रिहा कर दिया है. इसके ख़िलाफ़ भाजपा ने राज्य निर्वाचन आयोग की शिकायत की है जिसने राज्य के गृह सचिव से इस पर स्पष्टीकरण मांग लिया है.
राज्य निर्वाचन अधिकारी राधा रतूड़ी ने बीबीसी को बताया कि भाजपा की शिकायत के बाद गृह सचिव से इन सभी मामलों की समीक्षा करने को कहा गया है लेकिन यह भी साफ़ कर दिया कि निर्वाचन आयोग इस मामले में कोई दखल नहीं देगा.
इससे पहले रुड़की निवासी लक्कड़ पाला उर्फ़ पाल सिंह को पेरोल पर रिहा किए जाने की शिकायत पूर्व मुख्यमंत्री और अब बीजेपी नेता विजय बहुगुणा ने दिल्ली में चुनाव आयोग को की थी.
इसके बाद राज्य सरकार ने लक्कड़पाला की पेरोल निरस्त कर दी थी और 11 जनवरी को उन्हें गिरफ़्तार कर हरिद्वार जेल भेज दिया गया. लक्कड़पाला विधायक महेंद्र सिंह भाटी हत्याकांड में सज़ा काट रहे हैं और 23 दिसंबर को उन्हें दो महीने का पेरोल दिया गया था.

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बीजेपी का कहना है कि विधानसभा चुनावों के ठीक पहले राज्य सरकार इतने सारे अपराधियों को छोड़कर भय का माहौल बनाना चाहती है.
बीजेपी के प्रदेश प्रवक्ता मुन्ना सिंह चौहान कहते हैं, "ऐसा कभी नहीं हुआ कि दो दर्जन लोगों को एक साथ छोड़ दिया गया हो. आखिरकार जिन्हें रिहा किया गया है वे हत्यारे हैं और उनका समाज में डर तो होगा ही. एक ओर तो चुनाव के दौरान लाइसेंसी हथियारों को जमा करवाया जा रहा है और दूसरी ओर दुर्दांत अपराधियों को छोड़ा जा रहा है."
लेकिन क्या इससे चुनावी माहौल पर कोई असर पड़ेगा?
इस सवाल के जवाब में राज्य के पुलिस महानिदेशक एमए गणपति इसे एक राजनीतिक मुद्दा बताते हुए इस पर कोई टिप्पणी करने से इनकार कर देते हैं लेकिन कहते हैं कि चुनाव को देखते हुए पुलिस किसी भी तरह की घटना के लिए पूरी तरह तैयार है.
कांग्रेस इसे कैदियों के अधिकार से जोड़कर देखने की बात करती है. मुख्यमंत्री के मीडिया सलाहकार सुरेंद्र कुमार अग्रवाल कहते हैं, "भाजपा बेवजह इस मामले को तूल दे रही है क्योंकि उसके पास कोई मुद्दा नहीं है. ये सभी फ़ैसले (पेरोल देने के) गुण-दोष के आधार पर मेरिट पर लिए गए हैं. इनमें पूरी तरह निर्धारित प्रक्रिया का पालन हुआ है."

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इस मामले की ख़ास बात ये भी है कि शनिवार को एक स्थानीय अख़बार में छपी ख़बर के आधार पर भाजपा ने राज्य निर्वाचन आयोग को जो शिकायत की वह लिखित नहीं मौखिक थी.
पूर्व मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा ने जिस विशेष मामले की शिकायत की थी उसमें पेरोल रद्द कर, गिरफ़्तारी भी हो चुकी है. कहीं इसका अर्थ ये तो नहीं कि भाजपा इस मामले को सिर्फ़ राजनीतिक बयानबाज़ी तक ही सीमित रखना चाहती है.
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