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'गांधी के साथ मोदी की सेल्फ़ी का इंतज़ार है'
- Author, वुसतुल्लाह ख़ान
- पदनाम, पाकिस्तान से बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए
हबीब जालिब पाकिस्तान के सबसे जाने माने अवामी इंकलाबी शायर थे.
उन्होंने पूरी ज़िंदगी अयूब ख़ान से लेकर भुट्टो और फिर ज़िया उल हक तक फ़ौजी और सिविलियन तानाशाहों से लड़ते गुज़ारी. जेल गए और मारें खाईं.
यही हबीब जालिब, मार्च 1993 में शरीफ़ परिवार के शहर लाहौर में मरे तो उनके बैंक एकाउंट में 150 रुपए भी नहीं थी, उस वक्त नवाज़ शरीफ़ प्रधानमंत्री थे.
आज इन्हीं हबीब जालिब के सबसे बड़े भक्त, ज़ियाउल हक के मुंह बोले बेटे, हमारे प्रधानमंत्री के छोटे भाई और पंजाब के मुख्यमंत्री शाहबाज़ शरीफ़ हैं.
उनकी हर तक़रीर हबीब जालिब के इस शेर पर ख़त्म होती है- ऐसे दस्तूर को, सुबहे बेनूर को, मैं नहीं मानता, मैं नहीं जानता.
पाकिस्तान का हर राष्ट्रपति भले सिविलियन हो या फ़ौजी, हर प्रधानमंत्री और मंत्री, भले राइट का हो या लेफ़्ट का, जब शपथ लेता है तो उस वक़्त जिन्ना कैप और जिन्ना की तरह शेरवानी ज़रूर पहनता है.
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ ने पूरी ज़िंदगी सोशलिस्ट विचारों के साथ गुज़ारी लेकिन आज हाफ़िज़ सईद और जमाते इस्लामी वाले भी अपने जलसों में फ़ैज़ साहब के नज़्म पढ़ने से नहीं चूकते- क़त्लगाहों से चुनकर हमारे अलम, और निकलेंगे उश्शाक़ के क़ाफिले.
ऐसे में जब सीमा पार से ऐसी ख़बरे आती हैं तब हंसने को जी चाहता है कि खादी और ग्रामोद्योग के कर्मचारी इस बात से ख़ुश नहीं कि उनके कैलेंडर और वेबसाइट पर गांधी जी की जगह मोदी जी क्यों चरखा कात रहे हैं.
क्योंकि मोदी जी का ताल्लुक़ आरएसएस से है और आरएसएस का गांधी और उनके दर्शन जी से वही ताल्लुक़ है जो सऊदी अरब का मार्क्सवाद से है.
मगर मुझ जैसों का मानना है कि अगर शाहबाज़ हबीब जालिब के आशिक हो सकते हैं, हाफ़िज़ सईद को फ़ैज़ साब पसंद आ सकते हैं. बिल क्लिंटन नेल्सन मंडेला को गुरू मान सकते हैं तो मोदी साब के गांधी स्टाइल में चप्पा चप्पा चरखा चलाने में क्या आपत्ति है?
अब आप मुझे ये ना बताइएगा कि अगर वाकई मोदी को गांधी जी के विचारों से इतना प्यार है तो उन्होंने ओबामा का इस्तकबाल करते हुए एक हज़ार रुपए की खादी की जगह दस लाख रुपए का सूट क्यों पहना और उस पर गोल्डेन कढ़ाई में अपना नाम सौ बार क्यों लिखवाया.
फिर यही सूट 43 करोड़ रुपए में नीलाम हो कर गिनीज़ बुक में कैसे आ गया. अगर आ ही गया तो ये 43 करोड़ रुपए गांधीगीरी फैलाने में क्यों इस्तेमाल नहीं हुए.
गांधी जी अपनी जिंदगी में 43 करोड़ क्या 43 लाख रुपए भी कभी इक्ट्ठे नहीं देखे होंगे. ऐसे लोगों से मैं बहुत तंग हूं जो बात बात में कीड़े निकालते हैं.
मगर हम मोदी जी के साथ हैं. और उम्मीद करते हैं कि जल्द ही वे गांधी जी के साथ ली गई सेल्फ़ी अपने ट्विटर पर डालकर सभी जलने वालों के मुंह पर ताला लगा देंगे.
यस यू कैन डू इट ब्रो. सब बिकता है. फ़ैज़ हो या जालिब, मंडेला हों या गांधी. जो चाहे ख़रीद ले और फिर आगे बेच दे.
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