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ब्लॉग- 'जब दिलीप कुमार ने नवाज़ शरीफ़ से लड़ाई रोकने को कहा'
- Author, वुसतुल्लाह ख़ान
- पदनाम, पाकिस्तान से बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए
(विख्यात वॉलीवुड अभिनेता दिलीप कुमार का 98 वर्ष की उम्र में, बुधवार को मुंबई में निधन हो गया. पढ़िए उनके बारे में वुसतुल्लाह ख़ान का दिसंबर 2018 में छपा ये लेख)
कुछ चीज़ों का शायद कभी बंटवारा न हो सकें, जैसे ताजमहल, टीपू सुल्तान, भगत सिंह, मोहनजोदड़ो, तक्षशिला, भारतीय शास्त्रीय संगीत, उर्दू, ग़ालिब और दिलीप कुमार.
ये सब जितना हमारे, उतना ही आपके और बाकी संसार के भी हैं. इन सौगातों में एक थे दिलीप साहब.
मैं उन खुशकिस्मत लोगों में से हूं, जिन्होंने दिलीप कुमार को छू कर देखा है. वे 1997 में आख़िरी बार पाकिस्तान आए तो वहां की सरकार ने उन्हें सबसे बड़ा नागरिक तमगा निशान-ए-इम्तियाज़ पहनाया. एक दिन के लिए कराची के सरकारी गेस्ट हाउस में भी उन्हें ठहराया गया था.
मैं और दो तीन पत्रकार सरकारी अमले के हाथ पांव जोड़ कर किसी तरह दिलीप साहब के कमरे के बरामदे तक पंहुच ही गए. हम अपने साथ सवाल भी ले गए थे.
जब सफ़ेद थ्री-पीस सूट में दिलीप साहब सीढ़ियों से उतरने लगे, सवाल जवाब तो एक तरफ, हमारे तो तोते ही उड़ गए. दिलीप कुमार के सामने किस मुंह से मुंह खोलते? उन्होंने ख़ुद हमारी फटी-फटी आंखों पर रहम खा कर दो चार अच्छी-अच्छी बातें कह दीं और हम उनसे हाथ मिला कर खुशी से फूले मुर्गे की तरह रुख़सत हो गए.
मुझ जैसे करोड़ों लोगों के लिए यह फ़ैसला करना मुश्किल होता है कि दिलीप कुमार को देखा जाए या उन्हें सुना जाए. एक वक़्त में एक ही काम हो सकता है.
ख़ुर्शीद महमूद कसूरी ने लिखा है कि जिस वक़्त करगिल की ऊंचाइयों पर लड़ाई हो रही थी, वाजेपयी जी ने नवाज़ शरीफ़ को फ़ोन मिलाया. दिलीप कुमार भी साथ ही बैठे हुए थे. वाजपेयी जी ने फ़ोन उन्हें थमा दिया.
उन्होंने कहा, "नवाज़ शरीफ़ साहब! आप क्या कर रहे हैं? कुछ नहीं तो हिंदुस्तान में रहने वाले करोड़ों मुसलमानों का ही कुछ ख्याल कर लीजिए." और फिर लड़ाई का पासा पलटना शुरू हो गया.
1988 में जब दिलीप कुमार पाकिस्तान आए, पेशावर के किस्साख़ानी बाज़ार के मुहल्ला ख़ुदादाद में अपना घर भी देखा, जहां उनका जन्म हुआ था.
दिलीप कुमार जब दूसरी बार पेशावर गए, उन्हें देखने के लिए पेशावरी इतने पागल हो गए कि दिलीप कुमार के लिए अपने ही मोहल्ले में कदम रखना नामुमकिन हो गया और उन्हें सिक्योरिटी की वजह से वापस लौटना पड़ा.
अब से तीन साल पहले ख़ुद नवाज़ शरीफ़ ने ऐलान किया कि दिलीप कुमार साहब का पुश्तैनी घर सरकारी जायदाद है और उसे म्यूज़ियम बनाया जाएगा.
शायद इसकी ज़रूरत अब नहीं है. यह घर शर्म से ख़ुद ही आधे से ज़्यादा गिर चुका है.
कुछ यही हाल पेशावर के 40 कमरों वाली छह मंजिली कपूर हवेली का भी हुआ है. विशेश्वर नाथ कपूर की इस हवेली में पृथ्वीराज कपूर और फिर राज कपूर का जन्म हुआ था. पाकिस्तान सरकार ने इसे भी म्यूज़ियम बनाने का एलान किया, पर अब तक इसकी दो मंजिलें गिर चुकी हैं.
हमरी पीढ़ी ने गंगा- जमुनी तहज़ीब का तस्करा तो बहुत पढ़ा और सुना है, लेकिन उसे देखा नहीं. हमारे लिए तो दिलीप कुमार ही गंगा-जमुनी तहज़ीब के आख़िरी गवाह हैं.
खुश रहें तुझको देखने वाले, वर्ना किसने ख़ुदा को देखा है...