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आपके मन में भी हैं सपा में 'दंगल' के ये सवाल?
- Author, संदीप सोनी
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, दिल्ली
उत्तर प्रदेश में आगामी विधानसभा चुनावों से पहले टिकट बांटने के मुद्दे पर मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के अपने पिता मुलायम सिंह यादव और चाचा शिवपाल यादव के साथ मतभेद एक बार फिर खुलकर सामने आ गए हैं.
इन मतभेदों और ताक़त की ज़ोर-आज़माइश के बीच कुछ बुनियादी सवाल उठते हैं और इन्हीं सवालों के जवाब में यूपी के इस परिवार की राजनीतिक दांव पेंच की कहानी भी साफ़ होती है.
पहला सवाल: अखिलेश यादव समाजवादी पार्टी क्यों नहीं छोड़ते/ अपनी अलग पार्टी क्यूं नहीं बना लेते?
अखिलेश यादव ने एक युवा नेता और अच्छे मुख्यमंत्री के रूप में अपनी छवि बना तो ली है, लेकिन शायद वो पार्टी के स्तर पर संगठन नहीं बना पाए हैं.
वरिष्ठ पत्रकार रामदत्त त्रिपाठी कहते हैं, ''अखिलेश यादव पार्टी नहीं छोड़ सकते क्योंकि वो जानते हैं कि ज़मीनी स्तर पर संगठन अभी भी मुलायम सिंह के प्रति निष्ठावान है. पार्टी के परंपरागत मतदाता जैसे अल्पसंख्यक, यादव और दूसरी पिछड़ी जातियों की निष्ठा भी मुलायम सिंह यादव के प्रति ज्यादा है. अखिलेश जानते हैं कि वो इस बेस को छोड़कर नए युवा मध्यवर्ग के बूते उत्तर प्रदेश में कोई बाज़ी नहीं जीत सकते हैं.''
हालांकि वरिष्ठ पत्रकार शरद प्रधान का मानना है कि अखिलेश के लिए नई पार्टी बनाना आज की तारीख़ में संभव नहीं है.
वो कहते हैं कि अखिलेश का ऐसा करना पार्टी के लिए त्रासदी होगी. हालांकि वो ये भी साफ करते हैं कि ''अखिलेश ये कदम पहले उठा सकते थे. परंतु उनमें इतनी हिम्मत नहीं थी. वो मुख्यमंत्री तो बन गए लेकिन नेता नहीं बन पाए, पिता और चाचा की छांव से बाहर नहीं निकल पाए.''
वहीं वरिष्ठ पत्रकार नवीन जोशी कहते हैं कि अखिलेश की लड़ाई पार्टी से नहीं बल्कि अपने पिता और अपने चाचा से है.
नवीन जोशी कहते हैं, ''वो अपने चाचा को तो दरकिनार कर सकते हैं लेकिन पिता को दरकिनार नहीं कर सकते. अखिलेश ये आभास दे रहे हैं कि अलग पार्टी बना सकते हैं लेकिन वो ऐसा करेंगे नहीं क्योंकि इससे आगामी चुनाव में समाजवादी पार्टी को नुकसान हो सकता है.''
मुलायम सिंह यादव अखिलेश को बाहर का रास्ता क्यों नहीं दिखा देते?
हालांकि अपने पुत्र के खिलाफ़ कार्रवाई करने की कम ही मिसालें भारतीय राजनीति में होंगी. रामदत्त त्रिपाठी कहते हैं कि अखिलेश मुलायम की कमज़ोरी हैं.
वे कहते हैं, ''इतना ही नहीं मुलायम अब ये बात समझते होंगे कि अखिलेश ने बीते चार-साढ़े चार साल में अपनी एक अलग पहचान भी बना ली है. अगर वो अखिलेश को पार्टी से बाहर निकालते हैं तो इससे उनका नुकसान होगा क्योंकि समाज में लोग ये मानते हैं कि मुलायम सिंह, अखिलेश की सौतेली मां के दबाव में हैं. इससे समाजिक और राजनीतिक दोनों तरह से नुकसान होगा.''
शरद प्रधान भी मानते हैं कि बाप बेटे का रिश्ता बहुत कुछ कहता है.
वो कहते हैं, ''कुछ भी हो, बात बाप-बेटे के रिश्ते की है. इस साल सितम्बर-अक्तूबर में जब झगड़ा शुरू हुआ, तब बाप-बेटे ने एक दूसरे के ख़िलाफ़ कुछ नहीं किया. तब मुलायम चाहते तो अखिलेश को बाहर कर सकते थे. इसी तरह बेटे ने भी तब बाप के ख़िलाफ़ कुछ नहीं किया. लोग कितना भी उन्हें भड़काएं, लेकिन दोनों ने बाप-बेटे का रिश्ता बनाकर रखा है.''
वहीं नवीन जोशी के अनुसार, अब मुलायम ही अखिलेश को बाहर का रास्ता दिखाएंगे तो पार्टी की छवि ख़राब होती है. मुलायम जानते हैं कि अखिलेश मुख्यमंत्री के तौर पर अच्छा काम कर रहे हैं, इसलिए अखिलेश को हटाते हैं तो इसका दाग़ मुलायम पर लगेगा. इसका नुकसान चुनाव में होगा जो मुलायम सिंह कभी नहीं चाहेंगे.
मुलायम, शिवपाल यादव को क्यों नहीं हटा देते?
अब ये झगड़ा ख़ून का है. बेटे का ख़ून उबाल मारता है या भाई का. सगा भाई बेटे के बराबर नहीं तो बेटे से कम भी नहीं होता. मुलायम और शिवपाल के बारे में ये कहा जा सकता है.
रामदत्त त्रिपाठी बताते हैं कि जिस ज़माने में मुलायम ने संघर्ष किया, इटावा मैनपुरी, फर्रूख़ाबाद, चंबल का इलाका, वहां राजनीति में बहुत बल प्रयोग होता था, गोलीबारी होती थी, मुलायम पर कई बार हमले हुए. उस ज़माने में शिवपाल ने गांव-गांव जाकर काम किया. सरकार में रहते हुए भी शिवपाल ने ज़मीनी कार्यकर्ताओं की वफ़ादारी हासिल की है. मुलायम जानते हैं कि शिवपाल अगर अब अलग जाते हैं तो अपना कुछ भले ही न कर पाएं लेकिन समाजवादी पार्टी को नुकसान ज़रूर पहुंचा सकते हैं.
दूसरी ओर शरद प्रधान मानते हैं कि मुलायम को अपने भाई से बेइंतहा प्रेम है, फिर उम्र का तकाज़ा उन्हें बेटे की तरफ झुका देता है.
शरद प्रधान कहते हैं, ''कई लोग इसे नाटक समझते हैं लेकिन ऐसा नहीं है. मुलायम बड़े माहिर खिलाड़ी रहे हैं राजनीति के, लेकिन अब उम्र का असर उन पर नज़र आ रहा है. वो कभी बेटे की तरफ़ झुकते हैं कभी भाई की तरफ़. इसलिए सारी दिक्कत हो रही है.''
नवीन जोशी भी मानते हैं कि पार्टी चलाने के लिए शिवपाल एक अहम कड़ी हैं. वो कहते हैं, ''मुलायम शिवपाल को लगातार पूरा समर्थन देते रहे हैं. शिवपाल पार्टी चलाने और परिवार के भीतर शुरू से ही मुलायम के बड़े ख़ास रहे हैं. पिछले कई वर्षों से शिवपाल पार्टी संगठन पर छाए हुए हैं और संगठन पर उनकी पकड़ बड़ी मज़बूत है. ऐसे में शिवपाल को पार्टी से बाहर करने का मतलब होगा पार्टी संगठन को छिन्न-भिन्न करना.''
विधायक और काडर किसके साथ हैं?
इस सवाल पर मीडिया और सत्ता के गलियारों में भ्रम की स्थिति रही है. कुछ लोगों को लगता है कि विधायक अखिलेश के साथ हैं और संगठन शिवपाल के साथ.
रामदत्त त्रिपाठी कहते हैं कि सारे विधायक भी अखिलेश के साथ नहीं है. मामला बंटा हुआ है. उनके अनुसार दिक्कत ये है कि ''जिस विधायक की सिफ़ारिश नहीं चलती सरकारी कामों में उसकी राजनीति भी ठीक से नहीं चलती. विधायक मुलायम के प्रति भी निष्ठावान हैं लेकिन चूंकि अखिलेश सरकार में हैं, इसलिए अखिलेश के प्रति उनका झुकाव ज्यादा है.''
वहीं शरद प्रधान कहते हैं, ''आजकल राजनीति सिर्फ सत्ता केंद्रित है. अगर मुलायम ने अखिलेश को हटा दिया होता तो काडर मुलायम के पक्ष में होता, लेकिन चूंकि सत्ता पर अखिलेश काबिज़ हैं, इसलिए मुझे लगता है कि काडर मुलायम के बदले अखिलेश के पक्ष में जाएगा.''
जबकि नवीन जोशी के अनुसार युवा अखिलेश को चाहते हैं लेकिन साथ ही पार्टी की टूट भी उन्हें गवारा नहीं. ऐसे में ''भविष्य निश्चित तौर पर अखिलेश यादव हैं. पार्टी का भविष्य मुलायम सिंह नहीं हैं. यही वजह है कि मंत्री और विधायकों का एक बड़ा हिस्सा मुख्यमंत्री अखिलेश के साथ है. लेकिन कई लोग सामने नहीं आ रहे क्योंकि उन्हें मुलायम या शिवपाल ने ही आगे बढ़ाया था. लेकिन वो भी मन से अखिलेश के ही साथ हैं.''
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