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25 साल में मुलायम से अखिलेश तक का सफ़र
- Author, शरद गुप्ता
- पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए
इतिहास खुद को दोहराता है. समाजवादी पार्टी अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव को यह बार बार याद आ रहा होगा.
वो भी तब, जब हाल ही में राष्ट्रीय लोकदल के अध्यक्ष अजित सिंह से मुख्यमंत्री अखिलेश यादव से मतभेदों का जिक्र करते हुए कहा - जो अपने बाप का नहीं हुआ, उसकी बात का भरोसा क्या?
दरअसल अखिलेश भी अजित सिंह से तालमेल की बात कर रहे थे.
25 साल पहले समाजवादी जनता पार्टी से अलग होकर उन्होंने नई पार्टी बनाई थी तो सजपा अध्यक्ष चंद्रशेखर ने उन पर अपनी महत्वाकांक्षा के चलते धोखा देने का आरोप लगाया था.
मुलायम का कहना थी कि वे चंद्रशेखर की कांग्रेस के साथ बढ़ती नज़दीकियों से परेशान थे. इन 25 सालों में उत्तर प्रदेश में उनकी पार्टी ने तीन बार सरकार बनाई और केंद्र की राजनीति के केंद्र में लगातार बने रहे. किसी नई पार्टी के लिए यह छोटी उपलब्धि नहीं है.
1989 से 1992 तक चले राजनीतिक झंझावातों से मुलायम उलझन में थे. मंडल और मंदिर मामलों में उन्होंने सख्त रुख़ अपनाया था. साथ ही नित नई साज़िशें रची जा रही थीं.
पहले वो वीपी सिंह की जनता दल से नाता तोड़ कर चंद्रशेखर की सजपा में शामिल हुए. कांग्रेस का समर्थन ले उत्तर प्रदेश में सरकार बचाई.
लेकिन चंद्रशेखर से मतभेदों का पहला संकेत तब मिला जब तत्कालीन संचार मंत्री जनेश्वर मिश्र ने चंद्रशेखर के मंत्रिमंडल से इस्तीफा दे दिया. जनेश्वर छोटे लोहिया के नाम से जाने जाते थे और मुलायम से नज़दीकियों के लिए भी.
मुलायम इस बात से भी बेचैन थे कि राजीव गांधी बार-बार कहते थे कि चंद्रशेखर पुराने कांग्रेसी हैं, वे कभी भी कांग्रेस में शामिल हो जाएंगे.
राजीव की मृत्यु के बाद चंद्रशेखर तत्कालीन प्रधानमंत्री पी वी नरसिंह राव के करीब हो गए.
राव के घर अक्सर चाय पीने जाने लगे. राव सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पर उनके चार में से तीन सांसदों ने वोट ही नहीं दिया.
राव के हिमायती चंद्रशेखर अकेले पड़ गए. मुलायम ने अपना अलग रास्ता ढूंढ़ने का फैसला किया.
वे दारुलशफा स्थित अपने मित्र भगवती सिंह के विधायक आवास पर जाकर साथियों के साथ लंबी बैठकें करते और भविष्य की रूपरेखा तैयार करते. साथियों ने डराया - अकेले पार्टी बनाना आसान नहीं है. बन भी गई तो चलाना आसान नहीं होगा.
मुलायम का कहना था, "भीड़ हम उन्हें जुटाकर देते हैं और पैसा भी. फिर वे (देवीलाल, चंद्रशेखर, वीपी सिंह आदि) हमें बताते हैं कि क्या करना है, क्या बोलना है. हम अपना रास्ता खुद बनाएंगे."
आख़िर सितंबर 1992 में मुलायम ने सजपा से नाता तोड़ ही दिया. चार अक्टूबर को लखनऊ में उन्होंने समाजवादी पार्टी बनाने की घोषणा कर दी.
चार और पांच नवंबर को बेगम हजरत महल पार्क में उन्होंने पार्टी का पहला राष्ट्रीय अधिवेशन आयोजित किया.
मुलायम सपा के अध्यक्ष, जनेश्वर मिश्र उपाध्यक्ष, कपिल देव सिंह और मोहम्मद आज़म खान पार्टी के महामंत्री बने. मोहन सिंह को प्रवक्ता नियुक्त किया गया.
लेकिन बेनी प्रसाद वर्मा कोई पद न मिलने की वजह से रूठकर घर बैठ गए. सम्मेलन में नहीं आए. मुलायम सिंह ने उन्हें घर जाकर मनाया और सम्मेलन में लेकर आए.
लेकिन पार्टी बनने के ठीक एक महीने बाद देश की सबसे बडी राजनीतिक घटना घट गई. कारसेवकों ने बाबरी मस्जिद गिरा दी. पूरा देश भाजपा-मय हो गया.
इसी दौरान मुलायम के पैर की हड्डी टूट गई. वे जनवरी-फ़रवरी में अपने घर के लॉन में बैठे-बैठे पार्टी के भविष्य के बारे में सोचते. नित नई रणनीति बनाते. इसी बीच उनके गृह जिले इटावा में लोकसभा का उपचुनाव हुआ.
बहुजन समाज पार्टी अध्यक्ष कांशीराम ने पर्चा दाखिल किया. सपा के उम्मीदवार थे मुलायम के पुराने सहयोगी- राम सिंह शाक्य. इस चुनाव में मुलायम ने अपनी ही पार्टी के उम्मीदवार शाक्य के ख़िलाफ़ गुपचुप प्रचार कराया और कांशीराम को जिताया. वहीं से दोनों को लगा कि कांग्रेस और भाजपा का मुक़ाबला करने के लिए पिछड़ों और दलितों के साथ आना पड़ेगा. और सपा-बसपा गठबंधन की नींव पड़ी.
बसपा इससे पहले यूपी में आठ से दस सीटें जीतती थी. 1993 में सपा के साथ गठबंधन करने से बसपा ने 67 सीटों पर विजय प्राप्त की.
कांशीराम ने पार्टी उपाध्यक्ष मायावती को उत्तर प्रदेश की प्रभारी क्या बनाया, वे पूरा शासन ही परोक्ष रूप से चलाने लगीं.
मुलायम पर हुक्म चलाती. मुलायम को यह क़तई स्वीकार नहीं था. उन्होंने पहले जनता दल, सीपीएम और सीपीआई के विधायकों को तोड़ा और फिर अपना खुद का बहुमत करने के लिए बसपा पर डोरे डाले.
मायावती ने समर्थन वापस ले लिया. कहा जाता है कि मायावती को 'डराने' के लिए दो जून, 1995 को स्टेट गेस्ट हाउस कांड करवाया गया.
कथित तौर पर सपा के लोगों ने मायावती पर हमला कर दिया और 12 बसपा विधायकों के जबरन उठा कर ले गए.
उसके बाद बीजेपी के सहयोग से बसपा ने सरकार बनाई.
सपा को करीब से देख चुके 'द हिंदू' के पूर्व पत्रकार जे पी शुक्ल कहते हैं, "मुलायम को यह हमला कराने की क़तई ज़रूरत नहीं थी. लेकिन स्वभाव से मजबूर थे. उनके आधे दिमाग में समाजवाद, राजनीति आदि है और बाक़ी में सिर्फ अपराध. यही वजह है कि राजनीति में अपराधियों का वे न सिर्फ लाए बल्कि उन्हें मान्यता भी दिलाई."
इस बीच मुलायम सांसद हो गए. केंद्र में रक्षामंत्री बन गए और अगर लालू यादव ने विरोध न किया होता तो बहुत संभव है कि देवगौड़ा की सरकार गिरने के बाद इंद्र कुमार गुजराल की जगह मुलायम ही प्रधानमंत्री होते.
इसी दौरान मुलायम को अमर सिंह का साथ मिला. पैसा और ग्लैमर सपा का अभिन्न हिस्सा बन गया. 1999 में चुनाव प्रचार के दौरान मुलायम का अपने उम्मीदवारों को एक ही नसीहत होती - यह लो पाँच लाख रुपया. कल से प्रचार की बीस गाड़ी बढ़ा देना. इसमें से पैसा बचाना नहीं क्योंकि अगर कम प्रचार की वजह से हार गए तो कोई दो पैसे को भी नहीं पूछेगा. और जीत जाओगे तो जिंदगी भर पैसे की कमी नहीं रहेगी.
इसी तरह से 2003 में सपा की यूपी में एक बार फिर सरकार बनी जबकि उसका न तो बहुमत था न ही किसी पार्टी का समर्थन. मुलायम ने बसपा को एक बार फिर तोड़ दिया. रही सही कसर बीजेपी के साथ डील से पूरी हो गई.
प्रमोद महाजन के साथ अमर सिंह के समझौते के तहत बीजेपी ने विश्वास प्रस्ताव पर वाक आउट किया. महाजन को लगा था कि मुलायम के अल्पसंख्यकवाद से बहुसंख्यक बीजेपी के साथ आ जाएंगे. लेकिन 2006 में महाजन की हत्या के बाद यूपी में बीजेपी की हालत बहुत ख़राब हो गई.
2007 के चुनाव में सपा के ख़िलाफ़ जबरदस्त लहर थी. लेकिन उसका लाभ बीजेपी की जगह बसपा को मिला और मायावती एक बार फिर मुख्यमंत्री बनीं.
अमर सिंह ही एक बार फिर सपा के दूत बने और 2009 में मनमोहन सिंह सरकार से वाम दलों की समर्थन वापसी के बाद उन्होंने अमरीका के साथ सिविल न्यूक्लियर डील पर अविश्वास प्रस्ताव के दौरान सपा के समर्थन के जरिए यूपीए सरकार को बचा लिया.
लेकिन तब अमर सिंह के सपा में बढ़ते प्रभुत्व के खिलाफ राम गोपाल यादव से लेकर अखिलेश तक सभी खड़े हो गए. मुलायम को न चाहते हुए भी अमर को पार्टी ने निकालना पड़ा.
इस बीच अखिलेश को समाजवादी युवजन सभा का अध्यक्ष बनाकर 2012 का विधानसभा चुनाव उनके नेतृत्व में लड़ा और जीता गया. चाचा शिवपाल की आपत्तियों को ख़ारिज कर अखिलेश मुख्यमंत्री बने. लेकिन आधे अधूरे.
उनके पिता, चाचा और दूसरे वरिष्ठ नेता प्रशासन में दख़ल देते रहे. वे चुपचाप काम करते रहे. कन्या विद्याधन योजना से लेकर लैपटॉप बांटने तक की कई स्कीमें और एक्सप्रेसवे से लेकर मेट्रो तक विकास की योजनाएँ भी.
फिर छह महीने पहले अमर सिंह की पार्टी में वापसी हुई और उसके बाद जो कुछ भी हुआ, वह समाजवादी पार्टी के इतिहास में एक काले अध्याय के रूप में याद रखा जाएगा.
(ये लेखक के निजी विचार हैं)
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