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नज़रिया- मुलायम चुनाव तक अखिलेश, शिवपाल को एक तंबू में रख पाएंगे?
- Author, रामदत्त त्रिपाठी
- पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार
पुराने अखाड़ों के गुरुओं के बारे में एक बात कही जाती थी कि गुरु अपने सारे दांव 'चेले को नहीं सिखाते, एक दो बचाकर रखते हैं.'
लगता है कि मुलायम सिंह यादव ने यही किया. उन्होंने 2012 के उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनाव में बहुमत मिलने के बाद सरकार की बागडोर तो बेटे अखिलेश यादव को सौंप दी, मगर संगठन की बागडोर अपने हाथ में रखी.
इसलिए जब उन्हें लगा कि अखिलेश यादव उनसे बगावत कर अपनी स्वतंत्र राजनीति कर सकते हैं, तो उन्होंने फौरन अखिलेश यादव से समाजवादी पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष का पद लेकर छोटे भाई शिवपाल सिंह यादव को दे दिया.
इस तरह मुलायम ने शिवपाल को भी पार्टी से अलग होने से रोक लिया.
इतना ही नहीं, उन्होंने एक ही झटके में अपने चचेरे भाई और राष्ट्रीय महासचिव प्रोफेसर राम गोपाल यादव को पार्टी से निकाल दिया और जैसे ही राम गोपाल यादव ने समाजवादी पार्टी पर कब्जा करने के लिए कदम बढाया, उनका निष्कासन वापस ले लिया.
राम गोपाल यादव सामाजवादी पार्टी के संस्थापकों में से एक हैं और वह पार्टी का दिल्ली दफ्तर संभालते थे. एक तरह से वह मुलायम के दाहिने हाथ माने जाते थे और उनके निष्कासन की बात कोई सोच भी नहीं सकता था.
लेकिन अब माना जाता है कि रामगोपाल ही अखिलेश यादव के मुख्य राजनीतिक सलाहकार हैं , इसलिए मुलायम सिंह को जैसे ही लगा कि राम गोपाल की अटूट निष्ठा उनके साथ नहीं है, उन्होंने एक झटके में उन्हें बाहर का रास्ता दिखा दिया.
मुलायम ने यह सब यह साबित करने के लिए किया कि समाजवादी पार्टी के सर्वेसर्वा वही हैं.
उधर अखिलेश यादव ने मुख्यमंत्री के रूप में अपने विशेषाधिकार का इस्तेमाल करते हुए शिवपाल यादव और उनके कई घनिष्ठ सहयोगियों को मंत्रिपरिषद से बाहर ही रखा, बावजूद इसके कि मुलायम उन्हें वापस सरकार में लेने का दबाव डालते रहे.
बड़े-बड़े अनुभवी राजनेता भी चार पांच साल सत्ता में रहने के बाद चुनाव आते-आते जनता में अलोकप्रिय हो जाते हैं, पर अखिलेश यादव की यह एक बड़ी उपलब्धि है कि सरकार की अनेक कमियों के बावजूद , राजनीतिक प्रेक्षकों की निगाह में उनकी लोकप्रियता बढ़ी है.
पूरे पांच साल अखिलेश यादव कुछ न कुछ सकारात्मक करते दिखे , चाहे वह लाखों छात्रों को लैपटॉप बांटना हो या तरह -तरह की पेंशन बांटना या फिर सड़कों, स्कूलों, अस्पतालों, पुलों का निर्माण और लखनऊ में मेट्रो का संचालन.
संतुलित वाणी और व्यक्तिगत व्यवहार में शिष्टाचार भी उनकी छवि बनाने में मददगार रही. इस तरह की छवि बनाने में उनकी सांसद पत्नी डिम्पल यादव का भी योगदान माना जाता है.
राजकाज चलाने में अखिलेश यादव ने मोटे तौर पर पिता और पार्टी मुखिया मुलायम सिंह यादव की ही बात मानी, लेकिन अनेक मामलों में अपनी असहमति भी दर्ज कराते रहे .
माना जाता है कि अखिलेश यादव समाजवादी पार्टी के परम्परागत मतदाताओं से ज्यादा युवा और शहरी मध्यम वर्ग को रिझाने में लगे रहे.
उधर शिवपाल यादव ने अनेक महत्वपूर्ण विभागों के मंत्री के रूप में अपनी अलग पहचान बनाने की कोशिश की, पूरे प्रदेश का दौरा किया, विधायकों, मंत्रियों और पार्टी कार्यकर्ताओं के जायज नाजायज कामों में मदद कर, उनके बीच अपनी पैठ बढ़ाने की कोशिश की.
कई जानकारों के मुताबिक़ अखिलेश यादव के मन में समा गया है कि शिवपाल यादव अगले विधान सभा चुनाव के बाद उनके नेतृत्व को चुनौती दे सकते हैं, इसलिए वह उन्हें पहले ही निबटा देना चाहते हैं , यानी टिकट वितरण में उनका पत्ता साफ करना...
उधर मुलायम सिंह यादव खुलकर अखिलेश सरकार के कामकाज और उनके तौर तरीकों की आलोचना सार्वजनिक मंच पर उनके मुँह पर करते रहे.
दरअसल मुलायम चूँकि सर्वसुलभ हैं इसलिए पार्टी के तमाम लोग उनसे मिलकर सरकार के कामकाज की शिकायत करते हैं . शिकायत करने वालों में समाजवादी पार्टी के पुराने नेता ज्यादा हैं. कुछ मुस्लिम नेता भी यह शिकायत करते हैं कि सरकार बनवाने में उनके योगदान के अनुपात में उन्हें सरकार का लाभ नहीं मिला.
कई लोगों का कहना है कि बाप बेटे के बीच झगड़ा लगाने में कई उद्योगपतियों, ठेकेदारों और फंड मैनेजर्स का हाथ है. मुख्यमंत्री अमर सिंह की तरफ खुलकर इशारा कर चुके हैं. इसी तरह शिवपाल और मुलायम सिंह को मुख्यमंत्री के कई करीबियों से शिकायत है.
पिछले लोकसभा चुनाव की करारी हार के बाद मुलायम अंदर से हिल गए. मुलायम इस नतीजे पर पहुँचे कि लैपटॉप बांटने , मेट्रो और एक्सप्रेस हाइवे या इस तरह केवल विकास के एजेंडे से विधानसभा चुनाव नहीं जीता जा सकता. उन्हें चुनाव जीतने के लिए सामाजिक समीकरण साधने की जरूरत लगी.
बहुजन समाज पार्टी की नेता मायावती जितने आक्रामक तरीके से दलित मुस्लिम समीकरण बनाने में लगी हैं , उसकी काट के लिए मुलायम ने गाजीपुर के अंसारी बंधुओं और अतीक अहमद को अपने साथ मिलाया.
उधर अखिलेश यादव इस तरह के लोगों से दूरी बनाने का सार्वजनिक संदेश देते रहे. मुख्यमंत्री ने अमरमणि त्रिपाठी जैसे लोगों से भी अपने को दूर रखा.
हालांकि कई लोग सवाल उठा सकते हैं कि फिर वे राजा भैया अथवा गायत्री प्रसाद प्रजापति को मंत्रिमंडल में क्यों बर्दाश्त कर रहे हैं.
मुख्यमंत्री की तरफ से बार-बार यह भी इशारा किया गया कि वह कांग्रेस के साथ मिलकर चुनाव लड़ सकते हैं. लेकिन मुलायम सिंह ने साफ मना कर दिया. दरअसल, मुलायम सिंह नहीं चाहते कि उत्तर प्रदेश में कांग्रेस मजबूत हो और मुसलिम वोट वापस चला जाये.
मुलायम की चिंता यह भी है कि शिवपाल भी चुनाव से पहले पार्टी से बगावत न करें. शिवपाल अपने ज्यादा विधायक भले न जिता पायें , मगर वह मुलायम के प्रभाव क्षेत्र में तोड़ फोड़ करके समाजवादी पार्टी का नुकसान करने की हैसियत तो रखते ही हैं.
लगता है कि मुलायम सिंह की रणनीति फिलहाल यही है कि किसी तरह अखिलेश और शिवपाल को अपने तंबू से बाहर न जाने दें .
चुनाव सिर पर हैं , ऐसे में अखिलेश यादव के पास विकल्प सीमित हैं. पार्टी की अंदरूनी कलह से पहले ही काफी नुकसान हो चुका है.
उत्तर प्रदेश में बीजेपी को सत्ता में वापस लाने के लिए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी कोई कसर नहीं छोड़ेंगे और न ही मायावती आसानी से हार मानेंगी. परिणाम बहुत कुछ इस पर निर्भर करेगा कि सपा में चुनाव तक कामचलाऊ एकता रहेगी या नहीं.
सभी राजनीतिक टीकाकार मानते हैं कि पब्लिक की निगाह में मुख्यमंत्री के चेहरे के तौर पर समाजवादी पार्टी के पास अखिलेश यादव से बेहतर कोई उम्मीदवार नहीं है . ऐसे में प्रेक्षकों को इस बात पर आश्चर्य है कि समाजवादी पार्टी का नेतृत्व जनता में उनका महत्व कम करने का संकेत क्यों दे रहा है?
एक कारण तो यह हो सकता है कि अखिलेश यादव ने मुख्यमंत्री के तौर पर पार्टी या परिवार के अंदर सत्ता की हिस्सेदारी का कोई कारगर फार्मूला नहीं ढूँढा.
दूसरे मुलायम सिंह यादव ने पार्टी के अंदर कोई ऐसा तंत्र या मंच नहीं विकसित किया, जहाँ परिवार और उसके बाहर के बड़े नेता आमने सामने बैठकर बड़े मुद्दों पर एक आम राय बना सकें.
इसीलिए यह बाप बेटे या चाचा भतीजे की लड़ाई हो गयी है, जिसमें परिवार के बाहर के नेता मूकदर्शक बनकर रह गये हैं .
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