You’re viewing a text-only version of this website that uses less data. View the main version of the website including all images and videos.
मुलायम की सपा में गुटबाज़ी का नया फ्रंट
- Author, समीरात्मज मिश्र
- पदनाम, लखनऊ से बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए
समाजवादी पार्टी में जारी सत्ता संघर्ष में नई और पहली पीढ़ी के नेता अब लीडर अखिलेश के पीछे क़तारबद्ध होते दिख रहे हैं.
बीते सोमवार को जब लखनऊ में मुलायम सिंह और शिवपाल यादव के चहेते मंत्री गायत्री प्रजापति को शपथ दिलाई जा रही थी तो रामगोपाल यादव दिल्ली से सैफ़ई तक सैकड़ों गाड़ियों के काफ़िले के साथ 'रोड शो' कर रहे थे.
हालांकि रामगोपाल ने कहा कि ये शक्ति प्रदशन नहीं था, बल्कि मामला 'लोग आते गए और कारवां बनता गया' जैसा था, लेकिन जिस तरह से पार्टी से निकाले गए उनके एमएलसी भांजे अरविंद यादव समेत सैकड़ों युवा नेताओं ने जगह जगह उनका स्वागत किया, उससे ये समझा जा रहा है कि ये रोड शो महज़ इत्तिफ़ाक़ नहीं था.
यही नहीं, रामगोपाल यादव ने अपने भाषण में पार्टी से निकाले गए युवा नेताओं की वापसी की मांग भी की.
जानकार उनकी इस मांग में सियासी मक़सद तलाश कर रहे हैं.
शिवपाल यादव ने प्रदेश अध्यक्ष की कुर्सी सँभालने के बाद कुछ युवा नेताओं को निकाल दिया था. दूसरी तरफ़ बड़ी संख्या में युवा नेताओं ने ख़ुद ही इस्तीफ़े दे दिए थे.
ये लोग युवा मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के समर्थक माने जाते हैं और रामगोपाल इनके कथित 'मेंटर'.
इसके अलावा इस पूरे प्रकरण में एक बात और सामने आई कि अब पार्टी और परिवार में दूसरी पीढ़ी के नेता भी होश सँभाल चुके हैं.
यूं तो कहा जाता है और यादव परिवार का जो भी सदस्य उम्र की योग्यता पूरी करता है वो किसी न किसी राजनीतिक पद पर विराजमान है.
हालांकि युवा नेताओं में अभी तक अखिलेश यादव के अलावा बदायूं सांसद धर्मेंद्र यादव की ही सक्रियता खुले तौर पर दिखाई और सुनाई पड़ती थी.
शिवपाल के इस्तीफ़े के बाद उनके बेटे और पीसीएफ़ के चेयरमैन आदित्य यादव पिता के साथ साए की तरह खड़े रहे और उन्हें सलाह देते रहे.
वो बहुत मुखर नहीं हुए और न ही उन्होंने इस बारे में मीडिया से कभी कुछ बात की.
दूसरी ओर पार्टी महासचिव प्रोफ़ेसर रामगोपाल यादव के बेटे और सांसद अक्षय यादव ने न सिर्फ़ अरविंद यादव की बर्ख़ास्तगी का विरोध किया बल्कि उनके साथ डटे हैं.
बीबीसी से बातचीत में अक्षय यादव ने साफ़ तौर पर कहा कि अरविंद यादव समेत जिन भी युवा नेताओं को निकाला गया है, वो मानने को ही तैयार नहीं है कि उन्हें निकाल दिया गया है.
युवाओं को अनुशासनहीनता के आरोप में निकाले जाने का विरोध करते हुए अक्षय यादव कहते हैं कि युवाओं को जब लगा कि उनके नेता और मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के साथ नाइंसाफ़ी हो रही है तो वो उनके समर्थन में आ गया. युवाओं ने कोई अनुशासनहीनता नहीं की.
अरविंद यादव को निकाले जाने को साज़िश करार देते हुए अक्षय कहते हैं कि जिन लोगों ने अरविंद के पिता की हत्या कराई थी, आज वही पार्टी में शामिल होकर उनके ख़िलाफ़ बड़े नेताओं को भड़का रहे हैं. हालांकि वो कौन लोग हैं जो ये कर रहे हैं इसपर अक्षय कुछ बताना नहीं चाहते हैं.
यादव परिवार को क़रीब से जानने वाले इटावा के वरिष्ठ पत्रकार दिनेश शाक्य पिछले दिनों जो कुछ भी हुआ उसे कुर्सी का खेल बताते हैं.
शाक्य के मुताबिक़, अमर सिंह पार्टी में बग़ावत कराकर शिवपाल यादव को मुख्यमंत्री बनाना चाहते थे ताकि वे पार्टी और सरकार दोनों पर अपनी पकड़ मज़बूत कर सकें.
वो कहते हैं कि युवा पीढ़ी अभी तक राजनीति में सक्रिय ज़रूर थी, लेकिन अभी तक अपने ताऊ, पिता, चाचा जैसे रिश्तों के ख़िलाफ़ या समर्थन में उसे बहुत कुछ करने की ज़रूरत नहीं थी.
लेकिन अब जबकि गुट आमने-सामने दिख रहे हैं, युवाओं ने भी मोर्चा सँभाल लिया है.
दरअसल, यह बात समाजवादी पार्टी में सिर्फ़ यादव परिवार तक ही सीमित नहीं है बल्कि अन्य नेताओं के बेटे भी इसमें शामिल हो चुके हैं.
मुख़्तार अंसारी की पार्टी क़ौमी एकता दल का विलय समाजवादी पार्टी में कराने के सवाल पर जब बलराम सिंह यादव को मंत्रिमंडल से निकाला गया था तो उनके विधायक बेटे संग्राम यादव ने कथित तौर पर मंत्री पद की पेशकश को ख़ारिज कर दिया.
वे अपने पिता को 'न्याय' दिलाने के लिए लॉबिंग करने लगे. बाद में बलराम यादव की मंत्रिमंडल में फिर वापसी हुई.
ठीक इसी तरह मंत्री महबूब अली के बेटे परवेज़ अली भी महत्वपूर्ण विभाग छिनने के बाद पिता के समर्थन में उतर गए थे.
जानकारों का कहना है कि पार्टी में खेमेबाज़ी का असर अब अगली पीढ़ी तक पहुंच गया है और इसका असर चुनाव के दौरान, ख़ासकर टिकट बँटवारे के समय नज़र आनेवाला है.