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नज़रिया: 'जयललिता होने के रास्ते पर हैं अखिलेश यादव'
- Author, अनिल यादव
- पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए
परिवार में भारी कलह, संगठन में दो फाड़ और प्रत्याशियों में भ्रम के बावजूद यूपी के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव का आत्मविश्वास इन दिनों छलक रहा है.
पार्टी पर पकड़ उनके विरोधी और चाचा शिवपाल सिंह यादव की है इसलिए वे जयाललिता के रास्ते पर चल पड़े हैं. उनके आत्मविश्वास का कारण पार्टी का सबसे विश्वसनीय चेहरा होना है और इकलौती चुनावी रणनीति छवि का प्रबंधन है.
वे हर दिन फीता काटते और खैरात बांटते हुए यकीन दिलाने में लगे हुए हैं कि यदि उन्हें दोबारा मौका दिया गया तो वे जनता पर खजाना लुटा सकते हैं.
हाल ही तमिलनाडु की नेता जयाललिता का निधन हो गया जिन्होंने गरीबपरवर मातृछवि बनाकर लंबे समय तक राज किया था.
पार्टी सूत्रों का कहना है, चुनाव से पहले मुलायम सिंह यादव के कुनबे के गुटों की लड़ाई का एक निर्णायक दौर बाकी है. समांतर बैठकें चल रही हैं.
चुनाव अखिलेश के चेहरे पर लड़ा जाना है लेकिन टिकट पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष होने के नाते शिवपाल सिंह यादव बांट रहे हैं. पहली खेप में आपराधिक पृष्ठभूमि के ऐसे लोगों को जानबूझकर टिकट दिए गए हैं जिनका विरोध अखिलेश यादव करते आए हैं.
समाजवादी पार्टी के प्रमुख मुलायम सिंह यादव की सारी उर्जा पार्टी को टूटने से बचाने में लग रही है जबकि उन्हें इस वक्त वोटरों से मुखातिब होना चाहिए था. अखिलेश जानते हैं कि संगठन पर उनका अख्तियार नहीं इसलिए उन्होंने अपना रास्ता चुन लिया है.
अखिलेश का करोड़ों के बजट वाला भारी भरकम प्रचार तंत्र सिर्फ यह नहीं बता रहा कि उन्होंने लखनऊ-आगरा एक्सप्रेस वे, मेट्रो रेल और राज्यकर्मचारियों के लिए सातवां वेतन आयोग देने जैसे वादे पूरे किए हैं बल्कि जोर ऐसे आधुनिक सोच वाले नेता की छवि प्रचारित करने पर है जिसके दिल में गरीबों के लिए दर्द है.
इसलिए विज्ञापनों में मुख्यमंत्री की पत्नी और बच्चों को दिखाया जा रहा है, एक बार फिर लैपटाप बांटने की तैयारी है, नोटबंदी के बाद लग रही बैंक की लाइनों में मरने वालों के परिजनों को मुआवजा दिया जा रहा है, इस साल चौथी बार यशभारती पुरस्कार बांटे जा रहे हैं, अगर अगली सरकार बनी तो जनता को स्मार्ट फोन बांटने का वादा है.
दिक्कत यह है कि यूपी में चुनाव विकास के मुद्दे पर नहीं होता, अंतिम नतीजा जाति और मजहब की गोलबंदी से तय होता आया है इसलिए अखलेश यादव कांग्रेस के साथ गठबंधन की बात भी कर रहे हैं जो अभी तक दूर की कौड़ी है.
क्योंकि कांग्रेस को लगने लगा है कि उसने शीला दीक्षित को मुख्यमंत्री की तरह पेश करके गलती कर दी है. यूपी में शीला को ब्राह्मण से अधिक पंजाबी समझा जाता है, दूसरे सभाओं में पहुंचने में उनकी उम्र आड़े आ रही है.
अब तक वे कई कार्यक्रमों में वे नहीं पहुंच पाईं हैं. संकेत हैं कि कांग्रेस अब पहले अपना घर दुरूस्त करेगी फिर गठबंधन की बात होगी.
मुलायम के कुनबे में कलह के बावजूद यादव समाजवादी पार्टी को छोड़ने नहीं जा रहे हैं लेकिन सबसे बड़ा पेंच मुसलमानों के रूख को लेकर फंसा हुआ है जो अस्पष्ट राजनीतिक परिदृश्य में भाजपा को हराने की क्षमता वाले उम्मीदवार के पक्ष में टैक्टिकल वोटिंग करते हैं.
इसे भांप कर बसपा नेता मायावती ने मुसलमान उम्मीदवारों की संख्या बढ़ा दी है और अखिलेश यादव के मामूली बयानों का भी जवाब मुस्तैदी से रिटर्न कर रही हैं ताकि अपने को मुख्य मुकाबले में दिखा सकें. चुनाव तक के लिए मायावती ने अखिलेश के लिए एक नया नाम बबुआ ब्राडकास्टिंग कार्पोरेशन (बीबीसी) रख दिया है.
दूसरी तरफ भाजपा जो अखिलेश सरकार पर लगातार आक्रामक दिख रही थी उसका आत्मविश्वास नोटबंदी के बाद हिला लग रहा है. यूपी के सांसदों ने प्रधानमंत्री मोदी को रिपोर्ट दी है कि अगर मध्य जनवरी तक बैंकों में पर्याप्त कैश न आया तो चुनाव पर बुरा असर पड़ सकता है.
अखिलेश यादव ने आशंका जाहिर की है कि नोटबंदी की मुश्किलों और कालाधन पकड़ने की विफलता से ध्यान हटाने के लिए भाजपा सांप्रदायिक उन्माद फैला सकती है ताकि हिंदू-मुस्लिम ध्रुवीकरण हो सके.
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