नजरिया : नोटबंदी के बैकफ़ायर करने की पूरी संभावना है
- Author, अजय सिंह
- पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार
नोटबंदी का फ़ैसला दरअसल एक बहुत बड़ा जुआ है और इसके "बैकफ़ायर" करने की पूरी संभावना है.
लोगों को जिस तरह की दिक्कतें हो रही हैं, उनसे साफ है कि जो राजनेता इस तरह के फ़ैसला लेता है, उसमें जोखिम उठाने की बहुत अधिक क्षमता है. भविष्य में इसका क्या राजनीतिक असर होगा, यह अभी किसी को नहीं मालूम.

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यदि विपक्ष का भारत बंद कामयाब होता और कोई जन आक्रोश वाकई होता तो उसका एक मतलब भी था. लेकिन ऐसा लगता है कि विपक्ष जान बूझ कर जन आक्रोश का एक माहौल बनाना चाहता है, जिसका कोई राजनीतिक मतलब नहीं है न ही उसका कोई सियासी फ़ायदा है.
ऐसा लगता है कि विपक्ष सही तरीके से जन आक्रोश भी नहीं दिखा पाया और एक बात जो वह लगातार कह रहा है, उसका कोई असर भी नहीं है.
ऐसा नहीं दिख रहा है कि विपक्ष कोई ऐसी बात सामने रख रहा है, जिसका आम जनता पर कोई असर हो. विपक्ष एक अजीब रूप में दिख रहा है, जिसमें हठधर्मिता है.
इसमें कोई शक नहीं कि आम जनता को नोटबंदी से दिक्क़ते हुई हैं, लेकिन विपक्ष उन दिक्कतों को सही ढंग से उठा नहीं पया, न ही लोगों को लगा कि विपक्ष के ज़रिए इस मुद्दे को कारगर तरीके से उठाया जा सकता है.

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भारत में अब तक किसी सरकार का कोई क़दम इतना दूरगामी और व्यापक प्रभाव छोड़ने वाला नहीं हुआ है, जितना नोटबंदी. इसका असर भिखारी से लेकर सबसे धनी आदमी तक हुआ है, भारत में मुझे ऐसा कोई फैसला याद नहीं आता जिसका असर इतना व्यापक हुआ हो.
सत्ताधारी पार्टी ने इस फ़ैसले के राजनीतिक लाभ के बारे में तो सोचा ही होगा, पर क्या उसका कोई आर्थिक या वित्तीय चिंतन भी इसके पीछे था, अहम यह है.
मोदी शायद भारत की आंतरिक ताक़त भी इस फ़ैसले के ज़रिए दिखाना चाहते थे.

उन्होंने मुझे एक बार एक इंटरव्यू में कहा था कि कुंभ में पूरे ऑस्ट्रेलिया की आबादी जितने लोग आते हैं और फिर चुपचाप अपने अपने घर भी लौट जाते हैं और यह राज्य के हस्तक्षेप के बग़ैर ही होता है.
उन्हें शायद लगा कि इस फ़ैसले का आने वाले समय में भारत के लिए अच्छा होगा और देश को आर्थिक फ़ायदा होगा.
(बीबीसी संवाददाता रेहान फ़ज़ल से हुई बातचीत पर आधारित)















