You’re viewing a text-only version of this website that uses less data. View the main version of the website including all images and videos.
#100Women: लड़की का 'नहीं', मतलब 'नहीं'
- Author, विनीत खरे
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
कुछ दिन पहले जब मैं फ़िल्म 'पिंक' देख रहा था, मुझे लगा कि सभी लड़कों को यह फ़िल्म देखनी चाहिए.
मैंने तय किया कि मेरा बेटा विहान जब बड़ा होगा, मैं उसे यह फ़िल्म ज़रूर दिखाऊंगा.
एडिनबरा में 'निर्भया' की याद- यहांदेखें वीडियो
उसका यह जानना ज़रूरी है कि लडकियों के 'नहीं' का मतलब 'नहीं' ही होता है, 'हां' नहीं - जैसा दशकों से बॉलीवुड की कई फ़िल्मों में बताया जाता रहा है.
हमारे समाज में भी बताया जाता रहा है कि लड़की अगर 'नहीं' बोले तो उसका मतलब दरअसल 'हां' होता है.
मैं चाहता हूं कि वो यह भी सीखे कि लड़की का पीछा करना, उसे तंग करना, मोहब्बत का एहसास दिलाने के लिए ज़बरदस्ती करना, कोई अच्छी बात नहीं है.
मैं चाहूंगा कि वह जाने कि एक औरत के अधिकार किसी मर्द के अधिकार से कम नहीं हैं. उनकी जिंदगी को अपनी शर्तों पर जीने की चाहत मर्दों से अलग नही है, और यह ग़लत नही है. यह जानना और समझना बेहद महत्वपूर्ण है.
यह कहना शायद सही नहीं होगा कि अभी तो विहान छोटा है, इसलिए उसको औरत-मर्द की बराबरी की बातें बताने की जरूरत नहीं है.
माता-पिता ही समझ सकते हैं कि बच्चा कितनी तेज़ी से अपने आसपास की चीज़ों की नकल करता है. बाद में वही बातें उसकी सोच का हिस्सा बन जाती हैं.
'निर्भया' को दिल्ली ने दिल से किया याद- यहांदेखें तस्वीरें
नवंबर 29 को विहान तीन साल का हो जाएगा. अप्रैल से वह स्कूल जाने लगेगा. बाहर वो हमउम्र लड़कों से मिलेगा. लड़कियों से मिलेगा.
वो जिस भारत में बड़ा हो रहा है, वहां हर पांच मिनट में एक घरेलू हिंसा का मामला दर्ज होता है और हर 21 मिनट में एक बलात्कार का मामला रिपोर्ट होता है.
सवाल है कि आखिर लाखों मां-बाप कहां गलती कर रहे हैं? क्या यह गलती हमसे भी हो रही है?
जी हां! मुझे लगता है कि महिलाओ के ख़िलाफ़ हिंसा के पीछे मर्दों की परवरिश की बड़ी भूमिका होती है. वो क्या है जो हम अपने लड़कों को नहीं सिखा पा रहे, जो हमें सिखाना चाहिए?
मैं जब बड़ा हुआ और विहान जिस ज़माने में बड़ा हो रहा है, उसमें ज़मीन आसमान का फ़र्क है.
साल 2012 निर्भया सामूहिक बलात्कार कांड के बाद जिस तरह दुनिया का ध्यान भारत में महिलाओं के ख़िलाफ़ यौन हिंसा की तरफ़ गया, उसने आम लोगों की सोच और देश की न्याय व्यवस्था पर गहरा प्रभाव डाला है.
#100Women: आप महिला हैं तो क्या हुआ: गुल पनाग
आपका बेटा किस मानसिकता के साथ बड़ा हो रहा है, वो महिलाओं को लेकर क्या सोचता है, उनसे कैसा व्यवहार करता है, ये लापरवाही या टालने के विषय नहीं हैं.
ज़्यादा जागरूक होते समाज में माता-पिता का रोल बेहद अहम हो जाता है. आप मानें या न मानें, इनका कारण छोटी छोटी बातें ही होती हैं.
'शक्तिशाली' भी नहीं बचेंगे: निर्भया के पिता. यहां देखें वीडियो
हाल ही में मैंने विनील मैथ्यू निर्देशित बेहतरीन फ़िल्म 'स्टार्ट विद द ब्वायज़' देखी.
इसने मुझे सिखाया कि महिलाओं की एक परिभाषित छवि कैसे हमारे दिमाग में बचपन में ही डाल दी जाती है और कैसे उस छवि को हम सच्चाई, मर्दानगी मान लेते हैं.
इस फ़िल्म में दिखाया गया है कि कैसे एक लड़के को बचपन से ही बताया जाता है कि लड़के रोते नहीं हैं. मां-बाप, दोस्त, दादा-दादी, नाना-नानी, रिश्तेदार, सब सिखाते हैं कि लड़के रोते नहीं हैं.
ऐेसे में बच्चा महिला की रोने वाली छवि को लेकर बड़ा होता है और पत्नी के प्रति हिंसा और उसके रोने को सामान्य मानता है.
फ़िल्म के अंत में संदेश है, "बचपन से ही सिखाते हैं कि लड़के रोते नहीं हैं, शायद बेहतर होगा कि ये सिखाएं कि लड़के रुलाते नहीं हैं."
इस वाक्य ने मेरे ज़हन पर गहरा प्रभाव डाला.
रेप के लिए लड़की भी ज़िम्मेदार: आसाराम बापू- यहां पढ़ें
बचपन में मैंने भी कई बार ऐसे वाक्य सुने: "लड़कियों की तरह डरना बंद करो. तुम तो लड़के हो, हौसला रखो."
ये वाक्य घर, रिश्तेदारों के यहां, फ़िल्मों में, न जाने कहां-कहां सुने लेकिन कभी ध्यान नहीं दिया.
बचपन में सुनें उन वाक्यों के मायने आज समझ में आ रहे हैं.
आज हमारा संघर्ष अलग है, ज़माना अलग है.
मैंने अपना पहला ईमेल एकाउंट 24 साल की उम्र में खोला था.
'ख़ामोशी बलात्कार की माँ है'. यहां पढ़िए ब्लॉग
विहान मास मीडिया, सोशल मीडिया, इंटरनेट क्रांति में बड़े हुए हैं. जब यूट्यूब का आइकन क्लिक करने पर वो ऑफ़लाइन दिखाता है तो विहान की शिकायत होती है कि इंटरनेट क्यों नहीं चल रहा है.
सोचता हूं कि जब विहान बड़ा होगा और अख़बार खोलेगा, या मोबाइल सर्फ़ करेगा, वह महिला से जुड़ी किन बातों या कैसी तस्वीर को आत्मसात करेगा. उस समय मैं किस हद तक विहान की मदद कर पाऊंगा.
हमने अपने बच्चों के लिए जाने अनजाने एक ऐसी दुनिया बनाई है, जिसमें रंग, कपड़े, खेल, कविताएं, काम, सब कुछ जेंडर के आधार पर बटे हुए हैं.
क्या हम विहान को यह सिखा पाऐंगे कि मज़ा बराबरी और भागेदारी की जिंदगी में है?
क्या हम उसे सिखा पाऐंगे कि लड़के-लड़की में फ़र्क़ सिफ़ शरीर के स्तर पर होता है?
क्या हम-आप अपने अपने विहान को सीखा पांएगे कि एक सुंदर दुनिया हम मिलकर ही रच सकते हैं और यह भी कि औरतों के हक़ की बात करना मर्दानगी के ख़िलाफ़ या मर्द की कमजोरी नही है?
मुझे पूरी उम्मीद है और भरोसा भी...