You’re viewing a text-only version of this website that uses less data. View the main version of the website including all images and videos.
#100Women: 'कॉलेज पास होता तो हम लड़कियां रोज़ स्कूल जातीं'
महिलाओं की कामयाबी की कहानियां अक्सर सुनाई नहीं जाती हैं. ऐसी कितनी ही कहानियां सुनाई जानी बाक़ी हैं. ऐसी ही कहानियों को सुनाने के लिए पेश है बीबीसी की सिरीज़ #100Women.
इसी सीरीज़ के तहत बीबीसी संवाददाता दिव्या आर्य उत्तर प्रदेश के मोहनलाल गंज के छिबऊखेड़ा गांव पहुंची. दिव्या ने वहां की लड़कियों से बातचीत की.
ये वो इलाक़ा है, जहां से अब तक 16 लोकसभा चुनावों में से आठ बार महिलाएं चुनाव जीती हैं.
मोहनलालगंज में तीन साल पहले 2013 में ही बिजली आई है. तब सांसद थीं सपा की सुशीला सरोज.
प्रियंका और शशि दोनों ही इस गांव की ऐसी दो लड़कियां हैं, जो एमए की पढ़ाई कर रही हैं. शशि कहती हैं, ''मम्मी, पापा तो कहते थे कि अब मत पढ़ो. पर हमने कहा कि हम अभी और पढ़ेंगे. बाहर आने जाने में दिक़्क़त होती है तो हमें मना किया जाता था कि बाहर मत जाओ. लेकिन हमने प्रयास किया तो मम्मी पापा भी भेजने के लिए तैयार हो गए.''
शशि की सहेली प्रियंका उससे क्लास में एक साल जूनियर थी. साथ में पढ़ने की दोनों की ख्वाहिश ऐसी कि शशि ने एक साल इंतज़ार करना मुनासिब समझा. जब शशि की बीए की पढ़ाई पूरी हो गई, तब दोनों ने साथ में दाख़िला लिया.
बातचीत के दौरान प्रियंका की मम्मी पीछे से कहती हैं, ''पैसों की दिक़्क़त हो जाती है... इसलिए बेटियों को नहीं भेज पाते हैं.''
प्रियंका बताती हैं, ''हमारा कॉलेज घर से 16 किलोमीटर दूर है. हफ्ते में कभी-कभार जाते हैं टैम्पो से. 50 रुपए किराया लगता है, इसलिए नहीं जाते हैं. कॉलेज पास होता तो रोज़ जाने में दिक़्क़त ही नहीं थी.''
साथ खड़ी बीए पास लड़की कहती है, अगर मोहनलालगंज में कॉलेज होता तो हम ज़रूर और पढ़ाई करते.
क्या लड़कियों के लिए बेहतर काम करेंगी महिला सांसद?
इस सवाल के जवाब में मोहनलालगंज की लड़कियों ने बताया, ''हां लगता तो है कि काम करेंगी. जो बनेगा हम उससे काम करने के लिए कहेंगे.''
छिबऊखेड़ा गांव की एक महिला कहती हैं, ''लड़कियां तो नौकरी नहीं करती हैं. पर हां औरतें करती हैं. कोई आशाबहू है. कोई आंगनवाड़ी में काम करती है.''
इस भीड़ में एक महिला ऐसी भी रहीं, जिन्होंने अपनी बच्ची को देखते हुए कहा, ''ये जहां तक पढ़ेगी, वहां तक पढ़ाएंगे. उसके बाद अगर नौकरी मिलेगी तो कहां छोड़ेंगे वो तो करेंगे ही करेंगे. यहां लोग प्राइवेट नौकरियां नहीं करते हैं. सरकारी हुई तो कर लेते हैं.''
ये महिलाएं लड़कियों के गांव से बाहर रहकर न पढ़ाए जाने की वजह समाज को बताती हैं.
11वीं क्लास में पढ़ रही एक लड़की से जब पूछा गया कि अगर तुम्हें यहां का प्रधान बना दिया जाए तो लड़कियों के लिए क्या करोगी?'' जवाब में वो कहती है, ''जाओ जो कर सको, कर लो.''
इस दौरान कुछ ऐसी लड़कियां भी रहीं, जो बोलने में सकुचाती रहीं.
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)