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#100Women: मिलिए 'मर्दाना काम' करने वाली महिलाओं से
- Author, दिव्या आर्य
- पदनाम, संवाददाता, दिल्ली
वर्ल्ड बैंक के मुताबिक भारत में अपनी रोज़ी कमाने लायक 15 साल से बड़ी महिलाओं में से एक-तिहाई ही दरअसल काम कर रही हैं.
इसकी बड़ी वजह है कई ऐसी नौकरियां जिन्हें पुरुषों के माफ़िक ही समझा जाता है. पढ़िए ऐसी औरतों के बारे में जो 'पुरुषों वाले काम' कर रही हैं.
सीता खटिक, फ़ायर-फ़ाइटर
सीता ख़टिक राजस्थान की पहली महिला फ़ायर फ़ाइटर हैं. वो कहती हैं, "मुझे आग से डर नहीं लगता, जब कभी आग बुझाने जाती हूं तो बस लगता है कि किसी की जान बचानी है और हिम्मत आ जाती है."
राजस्थान में औरतों के लिए इस पेशे का रास्ता तब खुला जब राज्य में सरकारी नौकरियों का 30 फ़ीसदी औरतों के लिए आरक्षित करने का फ़ैसला लिया गया.
लेकिन इस आदेश के बावजूद, 'फ़ायर-फ़ाइटिंग' के प्रशिक्षण संस्थान में औरतों को दाख़िला नहीं दिया जा रहा था.
सीता के महीनों की कोशिशों और आवेदनों के बाद ही संस्थान ने अपना रुख़ बदला और अब औरतें और मर्द एक साथ प्रशिक्षण लेने लगे हैं.
सीता बताती हैं कि शुरुआत में आम लोग उन्हें मर्द फ़ायर फ़ाइटर्स के बीच पाकर इतने हैरान हो जाते थे कि आग की जगह उन्हें ही देखते रहते थे पर अब ये धीरे-धीरे बदल रहा है.
सेरा गोन्सालविस, गेमर
गेमिंग की दुनिया में ज़्यादातर मर्द ही दिखाई देते हैं. औरतें दिखती हैं तो वीडियो गेम्स के पात्रों में जहां उन्हें अकसर कम कपड़ों और सेक्सी रूप में दिखाया जाता है.
सेरा गोन्साल्विस ने 18 साल की उम्र में गेम्स खेलना शुरू किया. अब पांच साल से इस इंडस्ट्री का केंद्र माने जाने वाले बैंगलोर में सक्रिय होने के बाद भी वो खुद को अकेला ही पाती हैं.
प्रोफ़ेशनल गेमिंग में लाखों रुपए जीते जा सकते हैं जिसके लिए तेज़ गति और फ़टाफ़ट पेंतरे बदलना अहम होता है. खेलने के लिए गेमर अपना एक अलग नाम रखते हैं.
एंजेला के मुताबिक, "जैसे ही सामनेवाले खिलाड़ी या टीम के सदस्य को ये अंदाज़ा होता है कि गेमर औरत है तो मेरी काबिलियत पर सवाल उठाते हैं और कई बार, 'गेम छोड़ो, जाओ किचन में काम करो' जैसे सेक्सिस्ट कमेंट भी दे देते हैं".
मंजू देवी, कुली
मंजू देवी की ज़िंदगी में एक दर्दनाक घटना ने नए विकल्प और उम्मीद का रास्ता खोल दिया. लंबी बीमारी से उनके पति की मौत के बाद उनकी कुली की नौकरी मंजू को दे दी गई.
मंजू से पहले जयपुर के रेलवे स्टेशन पर कभी किसी औरत ने कुली का काम नहीं किया था. कुली यूनियन के मन में भी शंकाएं थीं, पर मंजू की ग़रीबी को देखते हुए ये फ़ैसला लिया गया.
मंजू बताती हैं, "पहले तो एक बैग से ज़्यादा सर पर रखा ही नहीं जाता था, लोग भी मेरी जगह मर्द कुली को ही बुलाते थे, पर समय के साथ मेरी ताकत बढ़ी है और अब मैं मर्दों की ही तरह काम कर पाती हूं."
शांति देवी, ट्रक मेकैनिक
स्कूटर, कार, बस हो या ट्रक, इनके कलपुर्ज़े ठीक करने से जुड़े काम को शारीरिक तौर पर मुश्किल माना जाता है. जिस वजह से मैकेनिक ज़्यादातर मर्द ही होते हैं.
भोपाल से अपने पति के साथ दिल्ली आईं शांति देवी भी पहले चाय की दुकान चलाती थीं पर समय के साथ उन दोनों को लगा कि मैकेनिक के काम में ज़्यादा आमदनी है.
दिल्ली में एशिया का सबसे बड़ा ट्रांसपोर्ट सेंटर माने जाने वाले 'संजय गांधी ट्रांसपोर्ट नगर' में शांति और उनके पति क़रीब 20 साल से ट्रक के टायर बदलने और रिपेयर का काम कर रहे हैं.
शांति देवी के मुताबिक, "औरतें अब हर तरह का काम करने लगी हैं, तो ये क्यों नहीं? मुझे धूल-मिट्टी में काम करने में कोई परेशानी नहीं और पति हर व़क्त साथ होते हैं तो ग़ैर मर्दों से कोई डर भी नहीं है."
पिस्ता बाई, सोलर इंजीनियर
झारखंड के एक आदीवासी गांव की पिस्ता बाई ना सिर्फ़ ख़ुद 'सोलर इंजीनियरिंग' सीख गई हैं बल्कि अब इसकी ट्रेनिंग भी देने लगी हैं.
वो अपने गांव में लोगों के घरों में 'सोलर पैनल' लगा चुकी हैं और लाइट या मोबाइल चार्जर चलाने के लिए सौर ऊर्जा से चलने वाले सर्केट बोर्ड बनाती हैं.
पिस्ता अनपढ़ हैं. वो बताती हैं कि ये सीखने के लिए उन्होंने अक्षरों की जगह अलग रंगों से पहचान करने का तरीका समझा. राजस्थान के तिलोनिया गांव के 'बेयरफ़ुट कॉलेज' में प्रशिक्षण लेने के बाद अब वो वहां ट्रेनर हैं.
पिस्ता कहती हैं, "मैंने पहले कभी नहीं सोचा था कि मैं इतनी कठिन पढ़ाई कर सकूंगी पर ये सीखकर मुझे तो रोज़गार मिला ही है, मेरे गांव में बिजली ना होने के बावजूद रौशनी आ गई है."
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