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'भारत-पाक सीमा होगी सील,' दावे में कितना दम?
केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने शुक्रवार को कहा कि वर्ष 2018 तक भारत-पाकिस्तान की सीमा को पूरी तरह से सील कर दिया जाएगा.
गृहमंत्री ने यह बात राजस्थान, पंजाब, जम्मू-कश्मीर और गुजरात में ताज़ा सुरक्षा प्रबंधों की समीक्षा बैठक के बाद कही.
राजनाथ सिंह के दावे की हक़ीकत जानने के लिए बीबीसी ने रक्षा विशेषज्ञ राहुल बेदी से बातचीत की, पेश है इसी ख़ास बातचीत के प्रमुख अंश.
मुझे उनकी यह बात समझ में नहीं आयी क्योंकि पंजाब, राजस्थान और जम्मू-कश्मीर में तो बाड़ काफी पहले से ही लगी हुई है.
इन तीन राज्यों में मेरी जानकारी में बाड़ आज से नहीं काफी वर्षों से मौजूद है.
गुजरात की सीमा की तरफ़ मेरे ख्याल से यह बाड़ पूरी तरह से नहीं लगाई गई है. लेकिन इन तीनों राज्यों में तो पूरी तरह से सीमा बाड़ से पहले ही सील हो चुकी है.
इन तीनों राज्यों में पूरी बाड़ का विद्युतिकरण भी किया जा चुका है. नुकीले तारों सें बनी इस बाड़ में हर वक़्त हर वक़्त करंट दौड़ता रहता है.
जम्मू-कश्मीर में तो सेंसर और सीसीटीवी भी लगे हुए हैं.
पंजाब में तो अस्सी और नब्बे के दशक में जब चरमपंथी गतिविधियां काफी तेज़ थी उसी दौरान पूरी सीमा को बाड़ लगाकर सील किया जा चुका है. यही नहीं राजस्थान सीमा की ओर से भी इन चरमपंथियों की आवाजाही रहती थी, इसलिए उसकी सीमा को सुरक्षित करने के लिए वहां भी बाड़ लगा दी गई थी.
इसीलिए उन्हें गृहमंत्री दो वर्षों में किस सीमा को सील करने वाली बात समझ में नहीं आ रही है.
भारत पाकिस्तान सीमा के कुछ इलाक़े ऐसे हैं जहां के भूभाग की जटिल प्राकृतिक और दुर्गम संरचना के कारण बाड़ नहीं लगाई जा सकती है.
भारत बांग्लादेश सीमा पर भी बाड़ लगाने के बात उठने पर इसी तरह की समस्याओं का सामना करना पड़ता है. कई इलाक़े ऐसे हैं जहां से नदियां गुज़रती हैं, वहां दलदल है, पहाड़ हैं ऐसे इलाक़ों में चाहकर भी स्थायी बाड़ लगाई नहीं जा सकती है.
'जम्मू-कश्मीर में 740 किलोमीटर की लाइन ऑफ कंट्रोल के इलाक़ो में बाड़ नहीं लगाई जा सकती है. इस इलाक़ो में घने जंगल, ग्लेशियर और पहाड़ हैं.
फिर यह काफी मंहगी प्रक्रिया है. कई लिहाज़ से यह व्यवहारिक योजना भी नहीं है.
मुझे ये समझ में नहीं आ रहा कि इस बाड़बंदी से हासिल क्या होगा क्योंकि कारगिल के दौरान हम देख चुके हैं कि चरमपंथियों के सहयोगियों को बाड़ का तोड़ पता होता है.
हालांकि भारतीय सेना इन विपरीत परिस्थितियों का सामना करना जानती है. लेकिन फिर भी यह सवाल तो बना रहेगा कि इस बाड़ से हमें कितना फायदा होगा.
(राहुल बेदी से बीबीसी संवाददाता निखिल रंजन की बातचीत पर आधारित)
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